Tuesday, 18 August 2015

जहां चूहे लगाते हैं इच्छाधारी नाग की परिक्रमा -

इस बार हम आपको एक ऐसे मंदिर में ले जा रहे हैं, जिसका अपना ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है और जिससे जुड़े हैं कई चमत्कार। यह है राजा गंधर्वसेन की नगरी गंधर्वपुरी का गंधर्वसेन मंदिर। यह सिंहासन बत्तीसी की एक 'कहानी' का स्थान है। 

भारत की प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी गंधर्वपुरी के गंधर्वसेन मंदिर के गुंबद के नीचे एक ऐसा स्थान है, जिसके बीचोबीच बैठता है पीले रंग का एक इच्छाधारी नाग, जिसके चारों ओर दर्जनों चूहे परिक्रमा करते हैं। आखिर क्यों इस रहस्य को कोई आज तक नहीं जान पाया।

गांव के लोग इसे नागराज का 'चूहापाली' स्थान कहते हैं और इस स्थान को हजारों वर्ष पुराना बताते हैं। कहते हैं कि नाग और चूहे आज तक नहीं द‍िखे, लेकिन परिक्रमा पथ पर चूहों की सैकड़ों लेंड‍ियां और उसके बीचोबीच नाग की लेंडी पाई जाती है। गांव वालों ने उस स्थान को कई बार साफ कर दिया, लेकिन न मालूम वे लेंडियां कहां से आ जाती हैं।

इस प्राचीन मंदिर में राजा गंधर्वसेन की मूर्ति स्थापित है। मालवा क्षत्रप गंधर्वसेन को गर्धभिल्ल भी कहा जाता था। वैसे तो राजा गंधर्वसेन के बारे में कई किस्से-कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन इस स्थान से जुड़ी उनकी कहानी अजीब ही है। ग्रामीणों का मानना है कि यहां पर राजा गंधर्वसेन का मंदिर सात-आठ खंडों में था। बीचोबीच राजा की मूर्ति स्थापित थी। अब राजा की मूर्ति वाला मंदिर ही बचा है, बाकी सब काल कवलित हो गए।

यहां के पुजारी महेश कुमार शर्मा से पूछा गया कि चूहे इच्छाधारी नाग की परिक्रमा लगाते हैं इस बात में कितनी सचाई है, तो उनका कहना था कि यहां नाग की बहुत ही 'प्राचीन बाम्बी' है और आसपास जंगल और नदी होने की वजह से कई नाग देखे गए हैं, लेकिन इस मंदिर में चूहों को देखना मुश्किल ही है, फिर भी न जाने कहां से चूहों की लेंडी आ जाती हैं, जबकि ऊपर और नीचे साफ-सफाई रखी जाती है। हम हमारे पूर्वजों से सुनते आए हैं कि इस मंदिर की रक्षा एक इच्छाधारी नाग करता है। 

यहां के स्थानीय निवासी कमल सोनी और केदारसिंह कुशवाह बताते हैं कि हम बचपन से ही चूहापाली के इस चमत्कार को देखते आए हैं। हमारे बुजुर्ग बताते हैं कि यहां इस बाम्बी में एक इच्छाधारी पीला नाग रहता है, जो हजारों वर्ष पुराना है। उसकी लम्बी-लम्बी मूंछें हैं और वह लगभग 12 से 15 फीट का है। हमारे ही गांव के रमेशचंद्र झालाजी ने वह नाग देखा था। बहुत किस्मत वालों को ही वह दिखाई देता है।

शेरसिंह कुशवाह, विक्रमसिंह कुशवाह और केदारसिंह कुशवाह का कहना है कि हमारा घर मंदिर के निकट है। रोज ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर से घंटियों की कभी-कभार आवाज सुनी गई है। अमावस्या और पूर्णिमा के दिन अक्सर ऐसा होता है कि जब मंदिर का ताला खोला जाता है तो पूजा-आरती के पूर्व ही मंदिर अंदर से साफ-सुथरा मिलता है और ऐसा लगता है जैसे किसी ने पूजा की हो। 

जिस तरह इस मंदिर में चूहे नाग की परिक्रमा करते हैं वैसे ही यहां की नदी सोमवती भी इस मंदिर का गोल चक्कर लगाते हुए कालीसिंध में जा मिली है।

जब हमने गंधर्वपुरी गांव के सरपंच विजयसिंह चौहान से इस संबंध में बात की तो उनका भी यही कहना था कि चूहापाली में सैकड़ों सालों से यह चल रहा है। यहां परिक्रमा के अवशेष पाए जाते हैं, लेकिन आज तक किसी ने देखा नहीं। गांव के बड़े-बूढ़ों से सुनते आए हैं।

यह एक प्राचीन नगरी है और यहां आस्था की बात पर ग्रामीणजन कहते हैं कि गंधर्वसेन के मंदिर में आने वाले का हर दुख मिटता है। जो भी यहां आता है उसको शांति का अनुभव होता है। यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है। इसका गुंबद परमारकाल में बना है, लेकिन नींव और मंदिर के स्तंभ तथा दीवारें बौद्धकाल की मानी जाती हैं। राजा गंधर्वसेन उज्जैन के राजा विक्रमादित्य और भर्तृहरि के पिता थे।

अब यह आपको तय करना है कि क्या वाकई यह चमत्कार है या अंधविश्वास।

कैसे पहुंचे : 
देवास की सोनकच्छ तहसील में स्थित है गंधर्वपुरी। देवास से बस द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है। देवास के लिए इंदौर से बस और ट्रेन उपलब्ध है।


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Friday, 29 May 2015

पूजा से सम्बंधित 30 जरूरी नियम -

सुखी और समृद्धिशाली जीवन के लिए देवी-देवताओं के पूजन की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। आज भी बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा को निभाते हैं। पूजन से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, लेकिन पूजा करते समय कुछ खास नियमों का पालन भी किया जाना चाहिए। अन्यथा पूजन का शुभ फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाता है। यहां 30  ऐसे नियम बताए जा रहे हैं जो सामान्य पूजन में भी ध्यान रखना चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने पर बहुत ही जल्द शुभ प्राप्त हो सकते हैं।

ये नियम इस प्रकार हैं...
1. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।

2. शिवजी, गणेशजी और भैरवजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए।

3. मां दुर्गा को दूर्वा (एक प्रकार की घास) नहीं चढ़ानी चाहिए। यह गणेशजी को विशेष रूप से अर्पित की जाती है।

4. सूर्य देव को शंख के जल से अर्घ्य नहीं देना चाहिए।

5. तुलसी का पत्ता बिना स्नान किए नहीं तोड़ना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बिना नहाए ही तुलसी के पत्तों को तोड़ता है तो पूजन में ऐसे पत्ते भगवान द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं।

6. शास्त्रों के अनुसार देवी-देवताओं का पूजन दिन में पांच बार करना चाहिए। सुबह 5 से 6 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त में पूजन और आरती होनी चाहिए। इसके बाद प्रात: 9 से 10 बजे तक दूसरी बार का पूजन। दोपहर में तीसरी बार पूजन करना चाहिए। इस पूजन के बाद भगवान को शयन करवाना चाहिए। शाम के समय चार-पांच बजे पुन: पूजन और आरती। रात को 8-9 बजे शयन आरती करनी चाहिए। जिन घरों में नियमित रूप से पांच बार पूजन किया जाता है, वहां सभी देवी-देवताओं का वास होता है और ऐसे घरों में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।

7. प्लास्टिक की बोतल में या किसी अपवित्र धातु के बर्तन में गंगाजल नहीं रखना चाहिए। अपवित्र धातु जैसे एल्युमिनियम और लोहे से बने बर्तन। गंगाजल तांबे के बर्तन में रखना शुभ रहता है।

8. स्त्रियों को और अपवित्र अवस्था में पुरुषों को शंख नहीं बजाना चाहिए। यह इस नियम का पालन नहीं किया जाता है तो जहां शंख बजाया जाता है, वहां से देवी लक्ष्मी चली जाती हैं।

9. मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्ति के सामने कभी भी पीठ दिखाकर नहीं बैठना चाहिए।

10. केतकी का फूल शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए।

11. किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी।

12. दूर्वा (एक प्रकार की घास) रविवार को नहीं तोडऩी चाहिए।

13. मां लक्ष्मी को विशेष रूप से कमल का फूल अर्पित किया जाता है। इस फूल को पांच दिनों तक जल छिड़क कर पुन:  चढ़ा सकते हैं।

14. शास्त्रों के अनुसार शिवजी को प्रिय बिल्व पत्र छह माह तक बासी नहीं माने जाते हैं। अत: इन्हें जल छिड़क कर पुन: शिवलिंग पर अर्पित किया जा सकता है।

15. तुलसी के पत्तों को 11 दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसकी पत्तियों पर हर रोज जल छिड़कर पुन: भगवान को अर्पित किया जा सकता है।

16. आमतौर पर फूलों को हाथों में रखकर हाथों से भगवान को अर्पित किया जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए। फूल चढ़ाने के लिए फूलों को किसी पवित्र पात्र में रखना चाहिए और इसी पात्र में से लेकर देवी-देवताओं को अर्पित करना चाहिए।

17. तांबे के बर्तन में चंदन, घिसा हुआ चंदन या चंदन का पानी नहीं रखना चाहिए।

18. हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति दीपक से दीपक जलते हैं, वे रोगी होते हैं।

19. बुधवार और रविवार को पीपल के वृक्ष में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।

20. पूजा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखकर करनी चाहिए। यदि संभव हो सके तो सुबह 6 से 8 बजे के बीच में पूजा अवश्य करें।

21. पूजा करते समय आसन के लिए ध्यान रखें कि बैठने का आसन ऊनी होगा तो श्रेष्ठ रहेगा।

22. घर के मंदिर में सुबह एवं शाम को दीपक अवश्य जलाएं। एक दीपक घी का और एक दीपक तेल का जलाना चाहिए।

23. पूजन-कर्म और आरती पूर्ण होने के बाद उसी स्थान पर खड़े होकर 3 परिक्रमाएं अवश्य करनी चाहिए।

24. रविवार, एकादशी, द्वादशी, संक्रान्ति तथा संध्या काल में तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ना चाहिए।

25. भगवान की आरती करते समय ध्यान रखें ये बातें- भगवान के चरणों की चार बार आरती करें, नाभि की दो बार और मुख की एक या तीन बार आरती करें। इस प्रकार भगवान के समस्त अंगों की कम से कम सात बार आरती करनी चाहिए।

26. पूजाघर में मूर्तियाँ 1 ,3 , 5 , 7 , 9 ,11 इंच तक की होनी चाहिए, इससे बड़ी नहीं तथा खड़े हुए गणेश जी,सरस्वतीजी, लक्ष्मीजी, की मूर्तियाँ घर में नहीं होनी चाहिए।

27. गणेश या देवी की प्रतिमा तीन तीन, शिवलिंग दो,शालिग्राम दो,सूर्य प्रतिमा दो,गोमती चक्र दो की संख्या में कदापि न रखें। 

28. अपने मंदिर में सिर्फ प्रतिष्ठित मूर्ति ही रखें उपहार,काँच, लकड़ी एवं फायबर की मूर्तियां न रखें एवं खण्डित, जलीकटी फोटो और टूटा काँच तुरंत हटा दें। शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित की गई है। जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि सिर्फ शिवलिंग कभी भी, किसी भी अवस्था में खंडित नहीं माना जाता है।

29.  मंदिर के ऊपर भगवान के वस्त्र, पुस्तकें एवं आभूषण आदि भी न रखें मंदिर में पर्दा अति आवश्यक है अपने पूज्य माता --पिता तथा पित्रों का फोटो मंदिर में कदापि न रखें,उन्हें घर के नैऋत्य कोण में स्थापित करें।

30. विष्णु की चार, गणेश की तीन,सूर्य की सात, दुर्गा की एक एवं शिव की आधी परिक्रमा कर सकते हैं।

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जानिए किन 9 लोगों को दिया दान होता है सफल जबकि किन 9 लोगों को दिया दान होता है निष्फल?

कहते हैं दान-पुण्य हमेशा संकट में आड़े आता है यानी दान करने से शुभता मिलती है। 9 प्रकार के दान ऐसे होते हैं जो निष्फल होते हैं जबकि 9 प्रकार के दान ऐसे भी होते हैं जो कभी असफल नहीं होते। आइए जानते है कौन है वे लोग जिन्हें दिया दान कभी व्यर्थ नहीं जाता और कौन है वे लोग जिन्हें दिया दान व्यर्थ जाता है।

इन 9 को दिया दान होता है सफल 

1. माता,
2. पिता,
3. गुरु,
4. मित्र,
5. विनयी,
6. उपकार करने वाला,
7. दीन,
8. अनाथ,
9. सज्जन।

इन 9 लोगों को दिया दान होता है निष्फल 

1. धूर्त,
2. बंदी,
3. मूर्ख,
4. अयोग्य चिकित्सक,
5. जुआरी,
6. शठ,
7. चाटुकार,
8. चारण,
9. चोर।

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Friday, 22 May 2015

किसे कहते हैं भगवान, जानिए -

जैसे जैन कैवल्य ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति को तीर्थंकर या अरिहंत कहते हैं। बौद्ध संबुद्ध कहते हैं वैसे ही हिंदू भगवान कहते हैं। भगवान का अर्थ है जितेंद्रिय। इंद्रियों को जीतने वाला। भगवान का अर्थ ईश्वर नहीं और जितने भी भगवान हैं वे ईश्वर कतई नहीं है। ईश्वर या परमेश्वर संसार की सर्वोच्च सत्ता है।

भगवान शब्द संस्कृत के भगवत शब्द से बना है। जिसने पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है तथा जिसकी पंचतत्वों पर पकड़ है उसे भगवान कहते हैं। भगवान शब्द का स्त्रीलिंग भगवती है। वह व्यक्ति जो पूर्णत: मोक्ष को प्राप्त हो चुका है और जो जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर कहीं भी जन्म लेकर कुछ भी करने की क्षमता रखता है वह भगवान है। परमहंस है।

भगवान को ईश्‍वरतुल्य माना गया है इसीलिए इस शब्द को ईश्वर, परमात्मा या परमेश्वर के रूप में भी उपयोग किया जाता है, लेकिन यह उचित नहीं है। ब्रह्मा, विष्णु, महेष, राम, कृष्ण और बुद्ध आदि सभी ईश्वर नहीं है।

भगवान शब्द का उपयोग विष्णु और शिव के अवतारों के लिए किया जाता है। दूसरा यह कि जो भी आत्मा पांचों इंद्रियो और पंचतत्व के जाल से मुक्त हो गई है वही भगवान कही गई है। इसी तरह जब कोई स्त्री मुक्त होती है तो उसे भगवती कहते हैं। भगवती शब्द का उपयोग माँ दुर्गा के लिए भी किया जाता है। इसे ही भागवत मार्ग कहा गया है।

भगवान (संस्कृत : भगवत्) सन्धि विच्छेद: भ्+अ+ग्+अ+व्+आ+न्+अ
भ = भूमि
अ = अग्नि
ग = गगन
वा = वायु
न = नीर
भगवान पंच तत्वों से बना/बनाने वाला है।

यह भी जानिए....
भगवान्- ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य- ये गुण अपनी समग्रता में जिस गण में हों उसे 'भग' कहते हैं। उसे अपने में धारण करने से वे भगवान् हैं। यह भी कि उत्पत्ति, प्रलय, प्राणियों के पूर्व व उत्तर जन्म, विद्या और अविद्या को एक साथ जानने वाले को भी भगवान कहते हैं।

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Monday, 4 May 2015

बेहतर स्वास्थ्य और उन्नति के लिए लगाएं घर में इन पौधों को -

शादी में आ रही है रूकावट ? या घर की सुख-शांति में हो रहा है खलल ?

घर के पीछे की ओर लगाएं केले का पौधा। यदि हम केले के पेड़ को किसी ग्रह के साथ जोड़ें तो यह बृहस्पति देवता का स्वरुप माना जाता है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए भी केले के पेड़ की पूजा की जाती है। इस तरह केले का पेड़ लगाने से धन संबंधी परेशानियों से भी राहत मिलती है।
घर पर नहीं पड़ रही है माँ लक्ष्मी की नज़र ? धन की कमी ने बढ़ा दी है परेशानी ? 

छोटे-छोटे फूलों वाला हरसिंगार का पेड़ दिलाएगा लाभ और इसकी अद्भुत सुगंध से मिलेगी दिल को ठंडक। इस पौधे का संबंध चन्द्र ग्रह से है जो अपने आप में ही शांति और ठंडक पहुंचाने वाला ग्रह है। इस पौधे को घर के बीचो-बीच या पिछले हिस्से में लगाने से आर्थिक संपन्नता प्राप्त होती है। इसकी देखभाल में कोताही न करें, इस पौधे के सूख जाने से मन पर बुरा प्रभाव भी पड़ता है।

शनि नाराज हैं और जीवन में बनते काम बिगड़ रहे हैं ?

तो घर में लगाइये शमी का पेड़। मान्यता है कि शमी का पेड़ में सभी देवताओं का वास होता है और इस पेड़ का संबंध शनि महाराज से है। वास्तु विज्ञान के अनुसार शमी के पौधे को घर के मुख्य द्वार के बायीं ओर लगाएं और नियमित रूप से सरसों के तेलका का दीपक जलाएं। इससे शनि की कृपा बनी रहेगी और आपके हर काम आसानी से बनेंगे।
तुलसी का पौधा ?

तुलसी का पौधा घर के बीचो बीच रखना बहुत ही लाभदायक होता है और यह घर से नकारात्मक उर्जा को दूर करवातावरण में सुख-शांति प्रदान करता है। जिनका शुक्र ग्रह कमजोर है उन्हें रोज शाम को तुलसी के आगे दीप प्रज्वलित करना चाहिए।
अनार को अयुर्वेद में स्वास्थ्य के लिए बड़ा की फायदेमंद बताया गया है?

वास्तु विज्ञान और ज्योतिषशास्त्र में भी अनार को बड़ा महत्व है। राहु-केतु के नकारात्मक प्रभाव ने ज़िन्दगी को उलझा कर रख दिया है? तंत्र-मंत्र के बाद भी नहीं दूर हो रही जीवन की मुश्किलें? तो लगाइये अनार का पौधा अपने घर में। वास्तु विज्ञान के अनुसार अनार का पेड़ घर के सामने लगाना फायदेमंद होता है। अनार के फूल को शहद में डुबो कर प्रत्येक सोमवार भगवान शिव को समर्पित करने से भारी से भारी कष्ट भी दूर होते हैं।

पीपल का वृक्ष ? 

बुध, शनि, और बृहस्पति ग्रह से गहरा नाता है पीपल के वृक्ष का। कहते हैं पीपल की नियमित पूजा करने, जल चढ़ाने और परिक्रमा करने से संतान दोष नष्ट होता है और बीमारियों से निजात मिलता है। पीपल का बोनसाई पेड़ घर के पिछले हिस्से में लगाएं तो यह उन्नति एवं लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक होता है।





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Friday, 1 May 2015

जानिए किस भगवान को चढ़ता है कौन सा फूल -


भगवान अपने भक्त को छप्पन प्रकार का भोग लगा कर पूजा करने के लिए नहीं कहते हैं. वे तो केवल आपके सच्चे भक्ति-भाव से ही प्रसन्न हो जाते हैं. महाभारत में भी भगवान श्रीकृष्ण को दुर्योधन ने भोजन के लिए आमंत्रित किया तो कृष्ण उसका तिरस्कार कर विदुर के घर शाक-पात खाने को पहुंच गए. एक पुरानी कहावत है कि भक्त अपने सामर्थ से ‘पान का पत्ता न सही, पान का डंठल ही सही’ सच्चे मन से चढ़ाता है तो प्रभु खुश हो जाते हैं. प्रभु की सच्ची भक्ति और उपासना के लिए यह जरूरी है कि भक्तगण को यह ज्ञात हो कि किस देवी-देवता को कौन सा चढ़ावा प्रिय है.
आज बात करेंगे कि किस देवी-देवता को कौन सा फूल अति प्रिय है. मान्यता है कि प्रभु के प्रिय फूल को चढ़ाने से वह शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं. देवों के इस श्रेणी में सबसे पहले पूजे जाने वाले श्री गणेशजी की बात करते हैं.
भगवान गणेश -
देवों में सर्वप्रथम भगवान गणेशजी को तुलसी छोड़कर हर तरह के फूल पसंद है. खास बात यह है कि गणपति को दूब अधिक प्रिय है. दूब की फुनगी में 3 या 5 पत्त‍ियां हों, तो ज्यादा अच्छा रहता है. ध्यान रहे कि गणेशजी पर तुलसी कभी न चढ़ाएं.
भगवान महादेव -
भोले बाबा को सभी सुगंधित पुष्प पंसद हैं. चमेली, श्वेत कमल, शमी, मौलसिरी, पाटला, नागचंपा, शमी, खस, गूलर, पलाश, बेलपत्र, केसर उन्हें खास प्रिय हैं. धतूरा और बेलपत्र महादेव को खास प्रिय हैं.
भगवान विष्णु -
यदि आप भगवान विष्णु के भक्त हैं तो उन्हें तुलसी अर्पित करें. भगवान विष्णु को तुलसी बहुत पसंद है. काली तुलसी और गौरी तुलसी, उन्हें दोनों ही पंसद हैं. तुलसी के साथ कमल, बेला, चमेली, गूमा, खैर, शमी, चंपा, मालती, कुंद आदि फूल विष्णु को प्रिय हैं.
हनुमान -
महावीर हनुमानजी को लाल फूल चढ़ाना ज्यादा अच्छा रहता है. वैसे उन्हें कोई भी सुगंधित फूल चढ़ाया जा सकता है.
सूर्य -
भगवान सूर्य को आक का फूल सबसे ज्यादा प्रिय है. मान्यता है कि अगर सूर्य को एक आक का फूल अर्पण कर दिया जाए, तो सोने की 10 अशर्फियां चढ़ाने का फल मिल जाता है. उड़हुल, कनेल, शमी, नीलकमल, लाल कमल, बेला, मालती आदि चढ़ाए है. ध्यान रहे कि सूर्य पर धतूरा, अपराजिता, अमड़ा और तगर कभी न चढ़ाएं.
माता गौरी और दुर्गा -
आम तौर पर भगवान शंकर को जो भी फूल पसंद हैं, देवी पार्वती को वे सभी फूल चढ़ाए जा सकते हैं.  सभी लाल फूल और सुगंधित सभी सफेद फूल भगवती को विशेष प्रिय हैं. बेला, चमेली, केसर, श्वेत कमल, पलाश, चंपा, कनेर, अपराजित आदि फूलों से भी देवी की पूजा की जाती है. आक और मदार के फूल केवल दुर्गाजी को ही चढ़ाना चाहिए, अन्य किसी देवी को नहीं. दुर्गाजी पर दूब कभी न चढ़ाएं. लक्ष्मीजी को कमल का फूल चढ़ाने का विशेष महत्व है.

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Sunday, 26 April 2015

ईश्वर सत्य है + सत्य ही शिव है + शिव है सुंदर है -

भगवान भोले का पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के किनारे स्थित है। पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था।
पशुपति नाथ मंदिर करीब एक मीटर ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है। चौकोर मंदिर का अधिकतर हिस्सा लकड़ी का बना है, जिसके चार दरवाजे हैं। इसके ऊपर सिंह की प्रतिकृति भी स्थापित है। मुख्य मंदिर में भैंस के रूप में भगवान शिव के शरीर का अगला हिस्सा भी है। आज नेपाल भूकंप जिस तरह की प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है, ठीक उसी तरह साल 2013 में उतराखंड भयानक बाढ़ से जूझ रहा था। लेकिन जिस तरह उत्तराखंड में आई बाढ़ भगवान भोलेनाथ के केदारनाथ धाम को नुकशान नहीं कर पाई थी, ठीक उसी तरह नेपाल में आया भयानक भूकंप भी भोलेनाथ के पशुपतिनाथ मंदिर का कुछ नहीं बिगाड़ पाया। भगवान भोलेनाथ के दोनों महत्वपूर्ण धाम इतनी भयानक प्राकृतिक आपदाओं से कैसे बच गए। हम आपको बता दें कि इन दोनों ही मंदिरों की जड़ें एक ही हैं। 

पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।
केदारनाथ में जल तांडव में भी ज्योतिलिंग महादेव ज्योति रूप वही अखंड बिराज मान है.

ये ही है भगवान के सत्य का प्रमाण .....

पशुपतिनाथ चतुर्मुखी शिवलिंग चार धामों और चार वेदों का प्रतीक माना जाता है। भगवान पशुपतिनाथ के चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है। हर एक मुख अलग-अलग गुण प्रकट करता है। पहला मुख दक्षिण की ओर अघोर मुख है, दूसरा पूर्व मुख को तत्पुरुष कहते हैं, तीसरा उत्तर मुख अर्धनारीश्वर रूप है, चौथा पश्चिमी मुखी को सद्योजात कहा जाता है और पांचवां ऊपरी भाग ईशान मुख कहा जाता है। यह निराकार मुख है और यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है।

भगवान पशुपतिनाथ के मंदिर भारत से ही नहीं दुनिया के हर कोने से लोग इस मंदिर को देखने और भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन करने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद पशुपतिनाथ के दर्शन करना जरुरी है।

जो सनातनी हिन्दुओने पूर्व मुग़ल लुटेरों के आगे सरणागति स्वीकारी धर्म परिवर्तन किया है उसे आज समज ना चाहिए की हमने क्या खोया है …।
जिसके पास सत्य की पहचान नहीं उसका भविष्य अंधकारमय है।

ईश्वर सत्य है + सत्य ही शिव है + शिव है सुंदर है ......

हर हर महादेव ……
ॐ नम: शिवाय ……

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Wednesday, 22 April 2015

केदारनाथ के कपाट 24 अप्रैल को खोल दिए जाएंगे -


हिमालय की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित भगवान शिव के धाम केदारनाथ के कपाट 24 अप्रैल को सुबह 8 बजकर 30 मिनट पर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे. इसके बाद श्रद्धालु वहां बाबा केदार के दर्शन कर सकेंगे.

श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के विशेष कार्याधिकारी वीडी सिंह ने बताया कि महाशिवरात्रि के अवसर पर उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में केदारनाथ मंदिर के कपाट खोले जाने का मुहूर्त निकाला गया है.

रुद्रप्रयाग जिले में करीब 11,755 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम के कपाट पिछले साल दीपावली के बाद भैयादूज के मौके पर 25 अक्टूबर को श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए गए थे. हालांकि वर्ष 2013 में आई प्राकृतिक आपदा से क्षतिग्रस्त हुए केदारनाथ में इन दिनों भारी बर्फ जमने के बाद भी पुनर्निर्माण का कार्य जारी है.

केदारनाथ धाम के अलावा, गढ़वाल हिमालय के चारधाम के नाम से मशहूर चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने का मुहूर्त भी निकाला जा चुका है. बदरीनाथ मंदिर के कपाट इस साल 26 अप्रैल को सुबह 5 बजकर 15 मिनट पर खोले जायेंगे.

गढ़वाल हिमालय की पहाड़ियों पर स्थित चारों धाम, बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री, सर्दियों में भारी बर्फवारी की वजह से हर साल अक्टूबर-नवंबर में बंद कर दिये जाते हैं जो अप्रैल-मई में दोबारा खोल दिये जाते हैं.

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Tuesday, 21 April 2015

अक्षय तृतीया के बारे में यह बातें आप नहीं जानते होंगे

अक्षय तृतीया एक ऐसी शुभ तिथि है जिसमें कोई भी शुभ कार्य हेतु, कोई नयी वस्तु खरीदने हेतु पंचांग देखकर शुभ मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
विवाह, गृह-प्रवेश जैसे शुभ कार्य भी बिना पंचांग देखे इस तिथि में किये जा सकते हैं। इस दिन पितृपक्ष में किये गए पिंडदान का अक्षय परिणाम भी मिलता है।
अक्षय तृतीया में पूजा-पाठ और हवन इत्यादि भी अत्याधिक सुखद परिणाम देते हैं। यदि सच्चे मन से प्रभु से जाने-अनजाने में किए गया अपराधों के लिए क्षमा-याचना की जाए तो प्रभु अपने भक्तों को क्षमा कर देते हैं और उन्हें सत्य, धर्म और न्याय की राह में चलने की शक्ति प्रदान करते हैं।
अक्षय तृतीया के दिन व्रत-पूजा का खरीदारे करें कब -
अक्षय तृतीया सर्वसिद्ध मुहूर्तों में से एक मुहूर्त है। इस दिन भक्तजन भगवान विष्णु की आराधना में विलीन होते हैं।स्त्रियाँअपने और परिवार की समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं।
ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान करके श्री विष्णुजी और माँ लक्ष्मी की प्रतिमा पर अक्षत चढ़ाना चाहिए। शांत चित्त से उनकी श्वेत कमल के पुष्प या श्वेत गुलाब, धुप-अगरबत्ती एवं चन्दन इत्यादि से पूजा अर्चना करनी चाहिए।
नैवेद्य के रूप में जौ, गेंहू, या सत्तू, ककड़ी, चने की दाल आदि का चढ़ावा करें। इसी दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
साथ ही फल-फूल, बर्तन, वस्त्र, गौ, भूमि, जल से भरे घड़े, कुल्हड़, पंखे, खड़ाऊं, चावल, नमक, घी, खरबूजा, चीनी, साग, आदि दान करना पुण्यकारी माना जाता है।
अक्षय तृतीया के प्रमुख पौराणिक कथाएं -
एक पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत के काल में जब पांडव वनवास में थे, तबएक दिन श्रीकृष्ण जो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है, ने उन्हें एक अक्षय पात्र उपहार स्वरुप दिया था। यह ऐसा पात्र था जो कभी भी खाली नहीं होता था और जिसके सहारे पांडवों को कभी भी भोजन की चिंता नहीं हुई और मांग करनेपर इस पात्र से असीमित भोजन प्रकट होता था। श्री कृष्ण से संबंधित एक और कथा अक्षय तृतीया के सन्दर्भ में प्रचलित है।
कथानुसार श्रीकृष्ण के बालपन के मित्र सुदामाइसी दिन श्रीकृष्ण के द्वार उनसे अपने परिवार के लिए आर्थिक सहायता मांगने गए था। भेंट के रूप में सुदामा के पास केवल एक मुट्ठीभर पोहा ही था। श्रीकृष्ण से मिलने के उपरान्त अपना भेंट उन्हें देने में सुदामा को संकोच हो रहा था किन्तु भगवान कृष्ण ने मुट्ठी भर पोहा सुदामा के हाथ से लिया और बड़े ही चाव से खाया। चूंकि सुदाम श्रीकृष्ण के अतिथि थे, श्रीकृष्ण ने उनका भव्य रूप से आदर-सत्कार किया।
ऐसे सत्कार से सुदामा बहुत ही प्रसन्न हुए किन्तु आर्थिक सहायता के लिए श्रीकृष्ण ने कुछ भी कहना उन्होंने उचित नहीं समझा औरवह बिना कुछ बोले अपने घर के लिए निकल पड़े।
जब सुदामा अपने घर पहुंचें तो दंग रह गए। उनके टूटे-फूटे झोपड़े के स्थान पर एक भव्यमहल था और उनकी गरीब पत्नी और बच्चें नए वस्त्राभूषण से सुसज्जित थे।
सुदामा को यह समझते विलंब ना हुआ कि यह उनके मित्र और विष्णुःअवतार श्रीकृष्ण का ही आशीर्वाद है। यहीं कारण है कि अक्षय तृतीया को धन-संपत्ति की लाभ प्राप्ति से भी जोड़ा जाता है।

नौ बातें जो अक्षय तृतीया को बनाते हैं सबसे खास -
अक्षय तृतीया को शास्त्रों में बड़ा ही महत्व दिया गया है। आइये जानें वह नौ बातों जो अक्षय तृतीया के दिन हुए जिसने इस दिन को बनाया है बहुत ही शुभ और खास।
  1. अक्षय तृतीया को युगादि तिथि के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था।
  2. अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु ने नर और नारायण के रूप में अवतार लिया था। नर नारायण ने बद्रीनाथ में तपस्या किया और इसे तीर्थ स्थान बनाया। यही नर नारायण अगले जन्म में अर्जुन और कृष्ण हुए। 
  3. माना जाता है कि महाभारत के युद्ध का समापन भी अक्षय तृतीया के दिन हुआ और पाण्डवों को हस्तिनापुर का साम्राज्य प्राप्त हुआ।
  4. शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण का युग द्वापर का अंत भी अक्षय तृतीया के दिन हुआ था।
  5. ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु के चरणों से निकली और शिव की जटा में वास करने वाली मां गंगा का धरती प आगमन भी अक्षय तृतीया के दिन हुआ।
  6. माना जाता है कि माहाभारत महाकाव्य की रचना बद्रीनाथ से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर माना गांव में गणेश गुफा में हुआ था। महर्षि वेद व्यास एवं श्रीगणेश ने अक्षय तृतीया के दिन ही इस महाकाव्य का लेखन कार्य शुरू किया था।
  7. चार धामों में प्रमुख बद्रीनाथ की यात्रा का आरंभ अक्षय तृतीया के दिन से शुरू होता है। अक्षय तृतीया के दिन गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलते हैं उसके अगले दिन केदारनाथ और फिर बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं।
  8. वृन्दावन के श्री बांके बिहारी जी मंदिर में पूरे वर्ष में केवल एक बार, अक्षय तृतीया के दिन श्री विग्रह के चरणों के दर्शन होते हैं।
  9. गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं यह बात कही है। अक्षय तृतीया के दिन ही विष्णु का एक अन्य अवतार हयग्रीव के रूप में हुआ था जिनका सिर अश्व का था।

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आप भी जपें यह मंत्र जल्दी बन सकते हैं धनवान -

हर व्यक्ति की तरह आप भी चाहते होंगे कि आप खूब धनवान बन जाएं, कभी भी जरूरत के समय आपको धन की कमी का सामना नहीं करना पड़े। आपकी यह चाहत पूरी हो सकती है लेकिन इसके लिए आपको शास्त्रों में बताए गए धन वृद्घि करने वाले सिद्घ मंत्रों और सूक्तों का पाठ करना होगा। इससे आप जो भी काम कर रहे हैं उनमें उन्नति होगी और धन आगमन में आने वाली बाधाएं दूर होगी। तो आइए जानें वह कौन से मंत्र और सूक्त हैं जो आपको कम समय ही बना सकते हैं धनवान 
देवी लक्ष्मी धन की देवी है और जिस घर पर लक्ष्मी की कृपा होती है उस घर में सदा धन दौलत की वृद्घि होती रहती है। शास्त्रों में बताया गया है कि जहां नियमित देवी लक्ष्मी के सूक्त 'श्री सूक्त' का पाठ किया जाता है वहां देवी लक्ष्मी का वास रहता है। जो श्री सूक्त का सुबह शाम पाठ करता है उसे कभी धन की कमी नहीं सताती है और न धन की कमी से उसका कोई काम अटकता है।



ॐ श्री ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम:। यह भगवान के खंचाजी यानी कोषाध्यक्ष कुबेर से 16 अक्षरों वाला सिद्घ मंत्र है। नियमित इसके जप से अचानक धन का लाभ मिलता रहता है।






विष्णु पुराण में देवी लक्ष्मी की एक स्तुति है। यह स्तुति देवराज इन्द्र ने उस समय की थी जब देवी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी। विष्णु पुराण में उल्लेख किया गया है कि इन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी लक्ष्मी ने वरदान दिया था कि जो व्यक्ति नियमित इस स्तुति का पाठ करेगा उसके घर में मैं सदैव रहूंगी और उसे कभी धन की कमी नहीं सताएगीद्घ तो आप भी इन्द्र द्वारा की गई लक्ष्मी स्तुती का पाठ करें।



चारों वेदों में सबसे प्राचीन और पहला वेद है ऋग्वेद। इस वेद में धन प्राप्ति का एक सिद्घ मंत्र दिया गया है। इस मंत्र को धन वृद्घि करने वाला सबसे प्राचीन मंत्र माना जाता है। आप भी इस मंत्र का नियमित जप कर सकते हैं 'ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि। ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।'


धन संबंधी परेशानियों को दूर करने में कुबेर महाराज का एक छोटा सा मंत्र 'ॐ वैश्रवणाय स्वाहा:' भी बड़ा कारगर है। इस मंत्र का नियमित 108 बार जप करें तो धनागमन में आने वाली बाधाएं दूर होंगी और आप आर्थिक परेशानियों से राहत महसूस करेंगे।



'ऊं श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा' यह भगवान श्री कृष्ण का सिद्घ मंत्र है। सवा लाख बार इस मंत्र का जप करन से यह मंत्र जपकर्ता को फल प्रदान करने लगता है। आप भी जपें यह मंत्र श्री कृष्ण आपकी आर्थिक परेशानी दूर करेंगे।




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