Monday, 12 October 2015

' शारदीय नवरात्र " की कालावधि -

इस वर्ष शारदीय नवरात्र 13 अक्तूबर से प्रारम्भ हो रहे हैं कलश स्थापना शुभ मुहूर्त सुबह 6:24 से 10:12 तक है तथा अभिजित काल मुहुर्त11:48 से 12:34 के बीच अभिजीत मुहूर्त में (कलश स्थापना मुहूर्त में चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग अच्छे नहीं माने जाते परन्तु इस वर्ष दोनों के योग में ही कलश स्थापना करनी पड़ेगी
घट स्थापना करना अर्थात नवरात्रि की कालावधि में ब्रह्मांड में कार्यरत शक्ति तत्त्व का घट में आवाहन कर उसे कार्यरत करना । कार्यरत शक्ति तत्त्व के कारण वास्तु में विद्यमान कष्टदायक तरंगें समूल नष्ट हो जाती हैं।
सामग्री: 
*जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र,
*जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी,
*पात्र में बोने के लिए जौ घट स्थापना के लिए,
*मिट्टी का कलश,
*कलश में भरने के लिए शुद्ध जल,
*गंगाजल,
*मोली,
*इत्र, 
*साबुत सुपारी,
*दूर्वाकलश में रखने के लिए,
*कुछ सिक्के पंचरत्न अशोक या आम के 5 पत्ते,
*कलश ढकने के लिए ढक्कन,
*ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल,
*पानी वाला नारियल,
*नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपडा,
*फूल - माला।
विधि :
सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें। इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब एक परत जौ की बिछाएं। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब फिर एक परत जौ की बिछाएं। जौ के बीच चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब कलश के कंठ पर मोली बाँध दें। अब कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें। कलश में साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल डालें। कलश में थोडा सा इत्र दाल दें। कलश में पंचरत्न डालें। कलश में कुछ सिक्के रख दें। कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें। अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें। ढक्कन में चावल भर दें। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार “पञ्चपल्लवसंयुक्तं वेदमन्त्रैः सुसंस्कृतम्। सुतीर्थजलसम्पूर्णं हेमरत्नैः समन्वितम्॥” अर्थात कलश पंचपल्लवयुक्त, वैदिक मन्त्रों से भली भाँति संस्कृत, उत्तम तीर्थ के जल से पूर्ण और सुवर्ण तथा पंचरत्न मई होना चाहिए। नारियल पर लाल कपडा लपेट कर मोली लपेट दें। अब नारियल को कलश पर रखें।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है - “अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय,ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृध्यै। प्राचीमुखं वित विनाशनाय,तस्तमात् शुभं संमुख्यं नारीकेलं”। 
अर्थात् - 
नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है।नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है। इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहे। ध्यान रहे कि नारियल का मुख उस सिरे पर होता है, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है।अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचो बीच रख दें। अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें। "हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इस में पधारें।" अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। धूपबत्ती कलश को दिखाएं। कलश को माला अर्पित करें। कलश को फल मिठाई अर्पित करें। कलश को इत्र समर्पित करें।
कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित की जाती है।नवरात्री के प्रथम दिन एक लकड़ी की चौकी की स्थापना करनी चाहिए। इसको गंगाजल से पवित्र करके इसके ऊपर सुन्दर लाल वस्त्र बिछाना चाहिए। इसको कलश के दायीं और रखना चाहिए। उसके बाद माँ भगवती की धातु की मूर्ति अथवा नवदुर्गा का फ्रेम किया हुआ फोटो स्थापित करना चाहिए। मूर्ति के अभाव में नवार्णमन्त्र युक्त यन्त्र को स्थापित करें। माँ दुर्गा को लाल चुनरी उड़ानी चाहिए। माँ दुर्गा से प्रार्थना करें "हे माँ दुर्गा आप नौ दिन के लिए इस चौकी में विराजिये।" उसके बाद सबसे पहले माँ को दीपक दिखाइए। उसके बाद धूप, फूलमाला, इत्र समर्पित करें। फल, मिठाई अर्पित करें।
नवरात्रि में नौ दिन मां भगवती का व्रत रखने का तथा प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का विशेष महत्व है। हर एक मनोकामना पूरी हो जाती है। सभी कष्टों से छुटकारा दिलाता है।नवरात्री के प्रथम दिन ही अखंड ज्योत जलाई जाती है जो नौ दिन तक जलती रहती है। दीपक के नीचे "चावल" रखने से माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा "सप्तधान्य" रखने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैमाता की पूजा "लाल रंग के कम्बल" के आसन पर बैठकर करना उत्तम माना गया हैनवरात्रि के प्रतिदिन माता रानी को फूलों का हार चढ़ाना चाहिए। प्रतिदिन घी का दीपक (माता के पूजन हेतु सोने, चाँदी, कांसे के दीपक का उपयोग उत्तम होता है) जलाकर माँ भगवती को मिष्ठान का भोग लगाना चाहिए। मान भगवती को इत्र/अत्तर विशेष प्रिय है।
नवरात्री के प्रतिदिन कंडे की धूनी जलाकर उसमें घी, हवन सामग्री, बताशा, लौंग का जोड़ा, पान, सुपारी, कपूर, गूगल, इलायची, किसमिस, कमलगट्टा जरूर अर्पित करना चाहिए।लक्ष्मी प्राप्ति के लिए नवरात्र मैं पान मैं गुलाब की ७ पंखुरियां रखें तथा मां भगवती को अर्पित कर देंमां दुर्गा को प्रतिदिन विशेष भोग लगाया जाता है। किस दिन किस चीज़ का भोग लगाना है ये हम विस्तार में आगे बताएँगे।प्रतिदिन कन्याओं का विशेष पूजन किया जाता है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार “एकैकां पूजयेत् कन्यामेकवृद्ध्या तथैव च। द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्रत्येकं नवकन्तु वा॥” अर्थात नित्य ही एक कुमारी का पूजन करे अथवा प्रतिदिन एक-एक-कुमारी की संख्या के वृद्धिक्रम से पूजन करें अथवा प्रतिदिन दुगुने-तिगुने के वृद्धिक्रम से और या तो प्रत्येक दिन नौ कुमारी कन्याओं का पूजन करें। किस दिन क्या सामग्री गिफ्ट देनी चाहिए ये भी आगे बताएँगे।
यदि कोई व्यक्ति नवरात्र पर्यन्त प्रतिदिन पूजा करने में असमर्थ है तो उसे अष्टमी तिथि को विशेष रूप अवश्य पूजा करनी चाहिए। प्राचीन काल में दक्ष के यज्ञ का विध्वंश करने वाली महाभयानक भगवती भद्रकाली करोङों योगिनियों सहित अष्टमी तिथि को ही प्रकट हुई थीं।
प्रतिदिन कुछ मन्त्रों का पाठ भी करना चाहिए -

 सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।
ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता।।
श्री दुर्गा मंत्र -

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।। 
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं श्रं फट् स्वाहा।।नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ।। १ ।।
नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनी। जाग्रतं हि महादेवी जपं सिद्ध कुरुष्व मे ।। २ ।।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोsस्तुते ।। ३ ।।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररुपिणी ।। ४ ।।
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिकादेवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ।। ५ ।।
माँ का भोग  -
माता को मौसम के अनुसार भोग लगा सकते है।
आप अपनी ज्योतिष,वास्तु, हस्तरेखा एवम् तंत्र से सम्बंधित समस्याओ के समाधान के ज्योतिषीय उपाय के लिए मिल सकते है देव अध्यात्म ज्योतिष के संपादक आचार्य अनूप एवं उप संपादक ज्योतिषाचार्य रविभूषण से । ज्योतिष एक विज्ञानं है जो आपको आने वाले समय की जानकारी देता है। कई बार एक परामर्श ही भविष्य बदल देता है

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Wednesday, 16 September 2015

श्री गणेशजी का रहस्य जानिए -

भारतीय धर्म और संस्कृति में भगवान गणेशजी सर्वप्रथम पूजनीय और प्रार्थनीय हैं। उनकी पूजा के बगैर कोई भी मंगल कार्य शुरू नहीं होता। कोई उनकी पूजा के बगैर कार्य शुरू कर देता है तो किसी न किसी प्रकार के विघ्न आते ही हैं। सभी धर्मों में गणेश की किसी न किसी रूप में पूजा या उनका आह्वान किया ही जाता है।
* गणेश देव : वे अग्रपूज्य, गणों के ईश गणपति, स्वस्तिक रूप तथा प्रणव स्वरूप हैं। उनके स्मरण मात्र से ही संकट दूर होकर शांति और समृद्धि आ जाती है।
* माता-पिता : शिव और पार्वती।
* भाई-बहन : कार्तिकेय और अशोक सुंदरी।
*पत्नी : प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री ऋद्धि और सिद्धि।
*पुत्र : सिद्धि से 'क्षेम' और ऋद्धि से 'लाभ' नाम के दो पुत्र हुए। लोक-परंपरा में इन्हें ही शुभ-लाभ कहा जाता है।
*जन्म समय : अनुमानत: 9938 विक्रम संवत पूर्व भाद्रपद माह की चतुर्थी अर्थात आज से 12,016 वर्ष पूर्व।
*प्राचीन प्रमाण : दुनिया के प्रथम धर्मग्रंथ ऋग्वेद में भी भगवान गणेशजी का जिक्र है। ऋग्वेद में 'गणपति' शब्द आया है। यजुर्वेद में भी ये उल्लेख है।
*गणेश ग्रंथ : गणेश पुराण, गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेशजी की आरती, संकटनाशन गणेश स्तोत्र।
*गणेश संप्रदाय : गणेश की उपासना करने वाला सम्प्रदाय गाणपतेय कहलाते हैं।
*गणेशजी के 12 नाम : सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र, विघ्नराज, द्वैमातुर, गणाधिप, हेरम्ब, गजानन।
*अन्य नाम : अरुणवर्ण, एकदन्त, गजमुख, लम्बोदर, अरण-वस्त्र, त्रिपुण्ड्र-तिलक, मूषकवाहन।
*गणेश का स्वरूप : वे एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। अपने चारों हाथों में वे क्रमश: पाश, अंकुश, मोदक पात्र तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी हैं। वे रक्त चंदन धारण करते हैं।
*प्रिय भोग : मोदक, लड्डू
*प्रिय पुष्प : लाल रंग के
*प्रिय वस्तु : दुर्वा (दूब), शमी-पत्र
*अधिपति : जल तत्व के
*प्रमुख अस्त्र : पाश, अंकुश
*वाहन : मूषक
*गणेशजी का दिन : बुधवार।
*गणेशजी की तिथि : चतुर्थी।
*ग्रहाधिपति : केतु और बुध
*गणेश पूजा-आरती : केसरि या चंदन, अक्षत, दूर्वा अर्पित कर कपूर जलाकर उनकी पूजा और आरती की जाती है। उनको मोदक का लड्डू अर्पित किया जाता है। उन्हें रक्तवर्ण के पुष्प विशेष प्रिय हैं।
 *श्री गणेश मं‍त्र : ॐ गं गणपतये नम:।
*ऋद्धि मं‍त्र : ॐ हेमवर्णायै ऋद्धये नम:।
*सिद्धि मं‍त्र : ॐ सर्वज्ञानभूषितायै नम:।
*लाभ मं‍त्र : ॐ सौभाग्य प्रदाय धन-धान्ययुक्ताय लाभाय नम:।
*शुभ मं‍त्र : ॐ पूर्णाय पूर्णमदाय शुभाय नम:।
गणेश पुराण के अनुसार प्रत्येक युग में गणेशजी का वाहन अलग रहा है -
सतयुग : भगवान गणेशजी का सतयुग में वाहन सिंह है और उनकी भुजाएं 10 हैं तथा नाम विनायक।
त्रेतायुग : श्री गणेशजी का त्रेतायुग में वाहन मयूर है इसीलिए उनको मयूरेश्वर कहा गया है। उनकी भुजाएं 6 हैं और रंग श्वेत।
द्वापरयुग : द्वापरयुग में उनका वाहन मूषक है और उनकी भुजाएं 4 हैं। इस युग में वे गजानन नाम से प्रसिद्ध हैं और उनका वर्ण लाल है।
कलियुग : कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है और वर्ण धूम्रवर्ण है। इनकी 2 भुजाएं हैं और इस युग में उनका नाम धूम्रकेतु है।

गणेश पुराण के अनुसार प्रत्येक युग में गणेशजी का वाहन अलग रहा है -
सतयुग : भगवान गणेशजी का सतयुग में वाहन सिंह है और उनकी भुजाएं 10 हैं तथा नाम विनायक।
त्रेतायुग : श्री गणेशजी का त्रेतायुग में वाहन मयूर है इसीलिए उनको मयूरेश्वर कहा गया है। उनकी भुजाएं 6 हैं और रंग श्वेत।
द्वापरयुग : द्वापरयुग में उनका वाहन मूषक है और उनकी भुजाएं 4 हैं। इस युग में वे गजानन नाम से प्रसिद्ध हैं और उनका वर्ण लाल है।
कलियुग : कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है और वर्ण धूम्रवर्ण है। इनकी 2 भुजाएं हैं और इस युग में उनका नाम धूम्रकेतु है।

अगले पन्ने पर गणेशजी की जन्म -

मां जगदम्बिका कैलाश पर अपने अंत:पुर में विराजमान थीं। सेविकाएं उबटन लगा रही थीं। शरीर से गिरे उबटन को उन आदिशक्ति ने एकत्र किया और एक मूर्ति बना डाली। उन चेतनामयी का वह शिशु चेतन हो गया और उसने माता को प्रणाम किया और आज्ञा मांगी। मां ने उससे कहा गया कि बिना आज्ञा कोई द्वार से अंदर न आने पाए।
बालक डंडा लेकर द्वार पर खड़ा हो गया। भगवान शंकर अंत:पुर में जाने लगे तो उसने उन्हें रोक दिया। भगवान भूतनाथ ने देवताओं को आज्ञा दी कि इस बालक को द्वार से हटा दिया जाए। इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम आदि सब उस बालक के डंडे से आहत होकर भाग खड़े हुए, क्योंकि वह महाशक्ति का पुत्र जो था। जब भगवान शंकर ने देखा कि यह तो महाशक्तिशाली है, तो उन्होंने त्रिशूल उठाया और बालक का मस्तक काट दिया।
जब मेहग को इस घटना की सूचना मिली कि उनके पुत्र का वध कर दिया गया है, तो उनका क्रोध भड़क उठा। पुत्र का शव देखकर माता कैसे शांत रहे। देवताओं पर घोर संकट खड़ा हो गया। वे सभी भगवान शंकर की स्तुति करने लगे 
तब शंकर ने कहा कि 'किसी नवजात शिशु का मस्तक उसके धड़ से लगा दो, लेकिन ध्यान रहे कि तब उसकी मां का उस पर ध्यान न हो।' देवता ढूंढने लगे ऐस शिशु लेकिन उन्हें रास्ते में एक हथनी का बच्चा अकेला मिला। उसी का मस्तक पाकर वह बालक गजानन हो गया। अपने अग्रज कार्तिकेय के साथ संग्राम में उनका एक दांत टूट गया और तब से गणेशजी एकदन्त हैं।
अंत में गणेशजी के 108 नामों का रहस्य-
1. बाल गणपति : सबसे प्रिय बालक।
2. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो।
3. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान।
4. धूम्रवर्ण : धुएं को उड़ाने वाला।
5. एकाक्षर : एकल अक्षर।
6. एकदन्त : एक दांत वाले।
7. गजकर्ण : हाथी की तरह कान वाला।
8. गजानन : हाथी के मुख वाले भगवान।
9. गजवक्र : हाथी की सूंड वाला।
10. गजवक्त्र : जिसका हाथी की तरह मुंह है।
11. गणाध्यक्ष : सभी गणों का मालिक।
12. गणपति : सभी गणों के मालिक।
13. गौरीसुत : माता गौरी का बेटा।
14. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले देव।
15. लम्बोदर : बड़े पेट वाले।
16. महाबल : अत्यधिक बलशाली वाले प्रभु।
17. महागणपति : देवातिदेव।
18. महेश्वर : सारे ब्रह्मांड के भगवान।
19. मंगलमूर्ति : सभी शुभ कार्य के देव।
20. मूषक वाहन : जिसका सारथी मूषक है।
21. निदीश्वरम : धन और निधि के दाता।
22. प्रथमेश्वर : सबके बीच प्रथम आने वाला।
23. शूपकर्ण : बड़े कान वाले देव।
24. शुभम : सभी शुभ कार्यों के प्रभु।
25. सिद्धिदाता : इच्छाओं और अवसरों के स्वामी।
26. सिद्धिविनायक : सफलता के स्वामी।
27. सुरेश्वरम : देवों के देव।
28. वक्रतुण्ड : घुमावदार सूंड।
29. अखूरथ : जिसका सारथी मूषक है।
30. अलम्पता : अनन्त देव।
31. अमित : अतुलनीय प्रभु।
32. अनन्तचिदरुपम : अनंत और व्यक्ति चेतना।
33. अवनीश : पूरे विश्व के प्रभु।
34. अविघ्न : बाधाओं को हरने वाले।
35. भीम : विशाल।
36. भूपति : धरती के मालिक।
37. भुवनपति : देवों के देव।
38. बुद्धिप्रिय : ज्ञान के दाता।
39. बुद्धिविधाता : बुद्धि के मालिक।
40. चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले।
41. देवादेव : सभी भगवान में सर्वोपरि।
42. देवांतकनाशकारी : बुराइयों और असुरों के विनाशक।
43. देवव्रत : सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले।
44. देवेन्द्राशिक : सभी देवताओं की रक्षा करने वाले।
45. धार्मिक : दान देने वाला।
46. दूर्जा : अपराजित देव।
47. द्वैमातुर : दो माताओं वाले।
48. एकदंष्ट्र : एक दांत वाले।
49. ईशानपुत्र : भगवान शिव के बेटे।
50. गदाधर : जिसका हथियार गदा है।
51. गणाध्यक्षिण : सभी पिंडों के नेता।
52. यशस्कर : प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी।
53. गुणिन : जो सभी गुणों के ज्ञानी।
54. हरिद्र : स्वर्ण के रंग वाला।
55. हेरम्ब : मां का प्रिय पुत्र।
56. कपिल : पीले भूरे रंग वाला।
57. कवीश : कवियों के स्वामी।
58. कीर्ति : यश के स्वामी।
59. कृपाकर : कृपा करने वाले।
60. कृष्णपिंगाश : पीली भूरी आंख वाले।
61. क्षेमंकरी : माफी प्रदान करने वाला।
62. क्षिप्रा : आराधना के योग्य।
63. मनोमय : दिल जीतने वाले।
64. मृत्युंजय : मौत को हरने वाले।
65. मूढ़ाकरम : जिनमें खुशी का वास होता है।
66. मुक्तिदायी : शाश्वत आनंद के दाता।
67. नादप्रतिष्ठित : जिसे संगीत से प्यार हो।
68. नमस्थेतु : सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले।
69. नन्दन : भगवान शिव का बेटा।
70. सिद्धांथ : सफलता और उपलब्धियों के गुरु।
71. पीताम्बर : पीले वस्त्र धारण करने वाला।
72. प्रमोद : आनंद।
73. पुरुष : अद्भुत व्यक्तित्व।
74. रक्त : लाल रंग के शरीर वाला।
75. रुद्रप्रिय : भगवान शिव के चहेते।
76. सर्वदेवात्मन : सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता।
77. सर्वसिद्धांत : कौशल और बुद्धि के दाता।
78. सर्वात्मन : ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला।
79. ओमकार : ओम के आकार वाला।
80. शशिवर्णम : जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो।
81. शुभगुणकानन : जो सभी गुण के गुरु हैं।
82. श्वेता : जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है।
83. सिद्धिप्रिय : इच्छापूर्ति वाले।
84. स्कन्दपूर्वज : भगवान कार्तिकेय के भाई।
85. सुमुख : शुभ मुख वाले।
86. स्वरूप : सौंदर्य के प्रेमी।
87. तरुण : जिसकी कोई आयु न हो।
88. उद्दण्ड : शरारती।
89. उमापुत्र : पार्वती के बेटे।
90. वरगणपति : अवसरों के स्वामी।
91. वरप्रद : इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता।
92. वरदविनायक : सफलता के स्वामी।
93. वीर गणपति : वीर प्रभु।
94. विद्यावारिधि : बुद्धि के देव।
95. विघ्नहर : बाधाओं को दूर करने वाले।
96. विघ्नहर्ता : बुद्धि की देव।
97. विघ्नविनाशन : बाधाओं का अंत करने वाले।
98. विघ्नराज : सभी बाधाओं के मालिक।
99. विघ्नराजेन्द्र : सभी बाधाओं के भगवान।
100. विघ्नविनाशाय : सभी बाधाओं का नाश करने वाला।
101. विघ्नेश्वर : सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान।
102. विकट : अत्यंत विशाल।
103. विनायक : सबका भगवान।
104. विश्वमुख : ब्रह्मांड के गुरु।
105. विश्वराजा : संसार के स्वामी।
106. यज्ञकाय : सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला।
107. यशस्विन : सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव।
108. योगाधिप : ध्यान के प्रभु।