Friday, 29 May 2015

गरुड़ पुराण ज्ञान - नहीं करना चाहिए इन 10 लोगों के घर भोजन

गरुण पुराण, वेदव्यास जी द्वारा रचित 18 पुराणो में से एक है। गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके अलावा भी इस ग्रन्थ में कई मानव उपयोगी बातें लिखी है जिनमे से एक है की किस तरह के लोगों के घर भोजन नहीं करना चाहिए।

क्योंकि एक पुरानी कहावत है, जैसा खाएंगे अन्न, वैसा बनेगा मन। यानी हम जैसा भोजन करते हैं, ठीक वैसी ही सोच और विचार बनते हैं। इसका सबसे सशक्त उदाहरण महाभारत में मिलता है जब तीरों की शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह से द्रोपदी पूंछती है- "आखिर क्यों उन्होंने भरी सभा में मेरे चीरहरण का विरोध नहीं किया जबकि वो सबसे बड़े और सबसे सशक्त थे।" तब भीष्म पितामह कहते है की मनुष्य जैसा अन्न खता है वैसा ही उसका मन हो जाता है। उस वक़्त में कौरवों का अधर्मी अन्न खा रहा था इसलिए मेरा दिमाग भी वैसा ही हो गया और मुझे उस कृत्य में कुछ गलत नज़र नहीं आया।

हमारे समाज में एक परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है कि लोग एक-दूसरे के घर पर भोजन करने जाते हैं। कई बार दूसरे लोग हमें खाने की चीजें देते हैं। वैसे तो यह एक सामान्य सी बात है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किन लोगों के यहां हमें भोजन नहीं करना चाहिए।

गरुड़ पुराण के आचार कांड में बताया गया है कि हमें किन 10 लोगों के यहां भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि हम इन लोगों के द्वारा दी गई खाने की चीज खाते हैं या इनके घर भोजन करते हैं तो इससे हमारे पापों में वृद्धि होती है। यहां जानिए ये 10 लोग कौन-कौन हैं और इनके घर पर भोजन क्यों नहीं करना चाहिए...

1. कोई चोर या अपराधी
कोई व्यक्ति चोर है, न्यायालय में उसका अपराधी सिद्ध हो गया हो तो उसके घर का भोजन नहीं करना चाहिए। गरुड़ पुराण के अनुसार चोर के यहां का भोजन करने पर उसके पापों का असर हमारे जीवन पर भी हो सकता है।

2. चरित्रहीन स्त्री
इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि चरित्रहीन स्त्री के हाथ से बना हुआ या उसके घर पर भोजन नहीं करना चाहिए। यहां चरित्रहीन स्त्री का अर्थ यह है कि जो स्त्री स्वेच्छा से पूरी तरह अधार्मिक आचरण करती है। गरुड़ पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति ऐसी स्त्री के यहां भोजन करता है, वह भी उसके पापों का फल प्राप्त करता है।

3. सूदखोर
वैसे तो आज के समय में काफी लोग ब्याज पर दूसरों को पैसा देते हैं, लेकिन जो लोग दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए अनुचित रूप से अत्यधिक ब्याज प्राप्त करते हैं, गरुड़ पुराण के अनुसार उनके घर पर भी भोजन नहीं करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में दूसरों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाना पाप माना गया है। गलत ढंग से कमाया गया धन, अशुभ फल ही देता है।

4. रोगी व्यक्ति
यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, कोई व्यक्ति छूत के रोग का मरीज है तो उसके घर भी भोजन नहीं करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के यहां भोजन करने पर हम भी उस बीमारी की गिरफ्त में आ सकते हैं। लंबे समय से रोगी इंसान के घर के वातावरण में भी बीमारियों के कीटाणु हो सकते हैं जो कि हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

5. अत्यधिक क्रोधी व्यक्ति
क्रोध इंसान का सबसे बड़ा शत्रु होता है। अक्सर क्रोध के आवेश में व्यक्ति अच्छे और बुरे का फर्क भूल जाता है। इसी कारण व्यक्ति को हानि भी उठानी पड़ती है। जो लोग हमेशा ही क्रोधित रहते हैं, उनके यहां भी भोजन नहीं करना चाहिए। यदि हम उनके यहां भोजन करेंगे तो उनके क्रोध के गुण हमारे अंदर भी प्रवेश कर सकते हैं।

6. नपुंसक या किन्नर
किन्नरों को दान देने का विशेष विधान बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इन्हें दान देने पर हमें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इन्हें दान देना चाहिए, लेकिन इनके यहां भोजन नहीं करना चाहिए। किन्नर कई प्रकार के लोगों से दान में धन प्राप्त करते हैं। इन्हें दान देने वालों में अच्छे-बुरे, दोनों प्रकार के लोग होते हैं।

7. निर्दयी व्यक्ति
यदि कोई व्यक्ति निर्दयी है, दूसरों के प्रति मानवीय भाव नहीं रखता है, सभी को कष्ट देते रहता है तो उसके घर का भी भोजन नहीं खाना चाहिए। ऐसे लोगों द्वारा अर्जित किए गए धन से बना खाना हमारा स्वभाव भी वैसा ही बना सकता है। हम भी निर्दयी बन सकते हैं। जैसा खाना हम खाते हैं, हमारी सोच और विचार भी वैसे ही बनते हैं।

8. निर्दयी राजा
यदि कोई राजा निर्दयी है और अपनी प्रजा का ध्यान न रखते हुए सभी को कष्ट देता है तो उसके यहां का भोजन नहीं करना चाहिए। राजा का कर्तव्य है कि प्रजा का ध्यान रखें और अपने अधीन रहने वाले लोगों की आवश्यकताओं को पूरी करें। जो राजा इस बात का ध्यान न रखते हुए सभी को सताता है, उसके यहां का भोजन नहीं खाना चाहिए।

9. चुगलखोर व्यक्ति
जिन लोगों की आदत दूसरों की चुगली करने की होती है, उनके यहां या उनके द्वारा दिए गए खाने को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। चुगली करना बुरी आदत है। चुगली करने वाले लोग दूसरों को परेशानियों फंसा देते हैं और स्वयं आनंद उठाते हैं। इस काम को भी पाप की श्रेणी में रखा गया है। अत: ऐसे लोगों के यहां भोजन करने से बचना चाहिए।

10. नशीली चीजें बेचने वाले
नशा करना भी पाप की श्रेणी में ही आता है और जो लोग नशीली चीजों का व्यापार करते हैं, गरुड़ पुराण में उनका यहां भोजन करना वर्जित किया गया है। नशे के कारण कई लोगों के घर बर्बाद हो जाते हैं। इसका दोष नशा बेचने वालों को भी लगता है। ऐसे लोगों के यहां भोजन करने पर उनके पाप का असर हमारे जीवन पर भी होता है।

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गरुड़ पुराण- ऐसी पत्नी, दोस्त, नौकर व घर से बचकर रहने में ही भलाई है -

हमारे धर्म ग्रंथों में अनेक ऐसी बातें बताई गई हैं जो न सिर्फ हमें लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र सिखाती हैं बल्कि यह भी बताती हैं कि हमें कैसे लोगों से संपर्क रखना चाहिए और कैसे नहीं? गरुड़ पुराण भी एक ऐसा ही ग्रंथ हैं जो हमें जीवन से जुड़ी अनेक गुप्त बातों से अवगत करवाता है, ये बातें हमारे लिए जानना बहुत ही जरूरी है।

वर्तमान समय में देखा जाए तो पत्नी, मित्र व नौकर हमारे परम सहयोगी होते हैं तथा स्वयं का घर होने पर हम शांति का अनुभव करते हैं। गरुड़ पुराण में इन सभी के बारे में लिखा है कि मनमानी करने वाली पत्नी, दुष्ट मित्र, वाद-विवाद करने वाला नौकर तथा जिस घर में सांप रहता है, हां निवास करना साक्षात मृत्यु के ही समान है। जानिए ये सब किस प्रकार हमारे लिए घातक साबित हो सकते हैं-

मनमानी करने वाली पत्नी
हिंदू धर्म में पत्नी को बहुत ही सम्माननीय माना गया है। पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करने के बारे में सोचना भी गलत है। पत्नी को अर्धांगिनी भी कहा गया है जिसका अर्थ है शरीर का आधा भाग। लेकिन यदि पत्नी का स्वभाव मनमानी करने वाला है तो वह किसी के रूप में आपका नुकसान कर सकती है।

मनमानी से अर्थ है ऐसी पत्नी को जो अपने पति की इच्छा के विरूद्ध कार्य करती है तथा अन्य पुरुषों में भी आसक्ति रखती है। ऐसी पत्नी अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। इसलिए कहा गया है कि मनमानी करने वाली पत्नी के साथ रहना साक्षात मृत्यु के समान है।

दुष्ट मित्र
जीवन में अगर कोई हमारा सच्चा हितैषी होता है वह एक मित्र ही होता है। विपत्ति के समय सबसे पहले मित्र ही हमारे साथ खड़ा होता है। हमारे धर्म ग्रंथों में ही सच्चे मित्रों के अनेक किस्से पढऩे व सुनने को मिलते हैं। जब हम किसी दुविधा में फंस जाते हैं तो मित्र ही हमें सही रास्ता दिखाते हैं।

यदि आपका मित्र दुष्ट प्रवृत्ति का है तो यह वह आपके लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। दुष्ट मित्र अपना हित साधने के लिए आपको गलत सलाह दे सकता है या फिर आपको शारीरिक रूप से भी नुकसान पहुंचा सकता है। एक गलत सलाह और शारीरिक नुकसान दोनों ही रूप में दुष्ट मित्र साक्षात मृत्यु के समान ही है। अत: ऐसे मित्रों से बचकर रहना चाहिए।

वाद-विवाद करने वाला नौकर
घरों में भृत्य (दास, नौकर) रखने का प्रचलन काफी पुराना है। वर्तमान में भी संभ्रांत परिवारों में ज़रुरत के मुताबिक नौकर रखे जाते हैं। नौकर न सिर्फ अपने मालिक की जरुरतों का पूरा ध्यान रखते हैं बल्कि वह घर के गुप्त भेद भी जानते हैं, लेकिन यदि नौकर वाद-विवाद करने वाला हो तो उसे तुरंत निकाल देना भी बेहतर रहता है।

वाद-विवाद करने वाला नौकर किसी भी समय आपके लिए कोई बड़ी मुसीबत बन सकता है। यदि ऐसा नौकर आपका कोई गुप्त भेद जानता है तो वाद-विवाद होने पर वह कभी भी आपका भेद खोल सकता है। वाद-विवाद बढ़ जाने पर वह आपको शारीरिक चोट भी पहुंचा सकता है। अत: वाद-विवाद करने वाले नौकर को साथ में रखना साक्षात मृत्यु के समान है।

घर में रहने वाला सांप
आज जिस घर में रहते हैं, यदि वहां सांप का भी निवास है तो भी आपकी जान हमेशा खतरे में रहती है। वैसे तो सांप बिना वजह किसी पर हमला नहीं करता, लेकिन गलती से भी यदि आप आपका पैर उस पर पड़ जाए तो सांप आपको काटे बिना नहीं छोड़ेगा।

इसलिए कहते हैं जिस घर में सांप का निवास हो, उसे तुरंत छोड़ देना ही बेहतर हैं क्योंकि लापरवाही बरतने पर आपकी जान भी जा सकती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए गरुड़ पुराण में कहा गया है कि सर्पयुक्त घर में निवास करना साक्षात मृत्यु के समान है।

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गरुड़ पुराण- इन 5 के साथ हमेशा करना चाहिए कठोर व्यवहार -

गरुड़ पुराण के अनुसार कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके साथ सदैव कठोर व्यवहार ही करना चाहिए। यदि इनके साथ नरमी से बात करेंगे तो ये आपकी बात कभी नहीं मानेंगे। ये 5 इस प्रकार हैं-

1- दुर्जन यानी बुरे स्वभाव वाला
दुर्जन व्यक्ति के साथ यदि आप नम्रता पूर्वक व्यवहार करेंगे तो इसके बदले में वह आपसे ऐसा व्यवहार नही करेगा। उल्टा वह आपके नम्र स्वभाव का फायदा उठाने की कोशिश ही करेगा। इसलिए यदि आपको किसी दुर्जन व्यक्ति से काम निकलवाना हो तो उसके साथ कठोरता से ही बात करनी चाहिए, तभी वह आपके साथ नम्रता पूर्ण व्यवहार करेगा।

2- शिल्पकार यानी कारीगर या मजदूर
गरुड़ पुराण में शिल्पकार से भी कठोर व्यवहार करने के लिए कहा गया है, जिससे अभिप्राय उन लोगों से है जो अपना काम ठीक तरीके से नहीं करते और आलस्य करते हुए काम को टालते रहते हैं। ऐसे लोगों के साथ यदि नम्रतापूर्ण बात की जाए तो यह ठीक से आपना काम नहीं करेंगे इसलिए यदि इन लोगों से अपना काम निकलवाना है तो इनके साथ कठोर व्यवहार करना बहुत आवश्यक है।

3- दास यानी नौकर
यदि आप नौकर से नम्रता पूर्ण व्यवहार करेंगे तो वह आपको किसी आज्ञा का पालन नहीं करेगा और आपके साथ मित्र के समान आचरण करने लगेगा। ऐसी स्थिति में वह आपका अपमान भी कर सकता है। इस स्थिति से बचने के लिए आपको अपने नौकर को कठोर अनुशासन में रखना अनिवार्य है। इसलिए यदि आपको दास यानी नौकर से काम करवाना है तो उसके साथ कठोर अनुशासन रखना बहुत आवश्यक है।

4- ढोलक व अन्य वाद्य यंत्र
ढोलक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसे यदि आप धीरे-धीरे प्रेम पूर्वक बजाने का प्रयास करेंगे तो उसकी आवाज वैसी नहीं आएगी, जैसी आप चाहते हैं यानी वह ठीक से काम नहीं करेगा। यदि आप चाहते हैं कि ढोलक की आवाज जोर से आए तो आपको उसे अपने दोनों हाथों से जोर-जोर से पीटना होगा तभी ढोलक से वैसी आवाज आएगी, जैसी आप चाहते हैं। इसलिए कहा गया है कि ढोलक के साथ भी कठोर अनुशासन (जोर-जोर से पीटना) रखना चाहिए। अन्य वाद्य यंत्रों के साथ भी ऐसा ही करना चाहिए।

5- दुष्ट स्त्री
हिंदू धर्म में स्त्रियों को बहुत ही सम्माननीय माना गया है। उनके साथ दुव्र्यवहार करने के बारे में सोचना भी गलत है, लेकिन यदि किसी स्त्री का स्वभाव दुष्ट है तो उसके साथ नम्रता पूर्ण व्यवहार करना मूर्खता होगी क्योंकि वह अपने स्वभाव के अनुसार आपको दुख ही पहुंचाएगी। इसलिए कहा गया है कि दुष्ट स्त्री के साथ सदैव कठोर अनुशासन व व्यवहार करना चाहिए।

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गरुड़ पुराण: किस चीज से क्या नष्ट हो जाता है?

हमारे धर्म ग्रंथों में अनेक ऐसी बातें बताई गई हैं जो हमें लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र सिखाती हैं, गरुड़ पुराण भी एक ऐसा ही ग्रंथ हैं जो हमें जीवन से जुड़ी अनेक गुप्त बातों से अवगत करवाता है, ये बातें हमारे लिए जानना बहुत ही जरूरी है।

गरुड़ पुराण के नीतिसार में बताया गया है कि किस चीज से क्या नष्ट हो जाता है...

1. गंदे कपड़े पहनने से सौभाग्य नष्ट हो जाता है
जो लोग धन और सभी सुख-सुविधाओं से संपन्न हैं, फिर भी गंदे कपड़े पहनते हैं तो उनका सौभाग्य नष्ट हो जाता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि ऐसे लोगों को महालक्ष्मी त्याग देती हैं और समाज में भी सम्मान प्राप्त नहीं होता है। साफ एवं सुगंधित वस्त्र धारण करने पर लक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहती है।

2. अभ्यास के बिना विद्या नष्ट हो जाती है
यदि हम विद्या का निरंतर अभ्यास नहीं करेंगे तो उस ज्ञान को भूल सकते हैं। अत: हम जो भी चीजें सीखते हैं, उनका लगातार अभ्यास करते रहना चाहिए।

3. संतुलित और सुपाच्य भोजन से रोगों का नाश होता है
अधिकांश बीमारियां असंतुलित खान-पान की वजह से ही होती हैं। हमें सदैव सुपाच्य भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। ऐसे भोजन से पाचन तंत्र ठीक से काम करता है और भोजन से पूर्ण ऊर्जा शरीर को प्राप्त होती है। पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है और इस वजह से हम रोगों से बचे रहते हैं।

4. चतुरता पूर्ण नीति से शत्रु नष्ट होता है
शत्रुओं से निपटने के लिए चतुरता पूर्ण नीति का सहारा लेना चाहिए। शत्रु लगातार हमें नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते रहते हैं और यदि हमें चतुरता नहीं दिखाएंगे तो हानि हमारी ही होती है। अत: जैसा शत्रु है, उसके अनुसार नीति का उपयोग करके उसे नष्ट किया जा सकता है।

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Sunday, 19 April 2015

गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण में व्यावहारिक जीवन के ऐसे कई गलत काम या विचार बताए गए हैं, जिन्हें पाप माना जाता है। ये विचार और स्वभाव आदत में इस तरह समा जाते हैं कि उन्हें बार-बार दोहराने पर भी गलती का एहसास नहीं होता। वजह यह भी है कि धर्म के नजरिए से कोई भी व्यक्ति पाप से अछूता नहीं, क्योंकि जीवन में हर व्यक्ति से कोई न कोई पाप जरूर करता है।

कुछ लोग पाप जानकर करते हैं तो कुछ अनजाने में, लेकिन पाप के नतीजे हमेशा भोगने पड़ते हैंं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं, स्त्री से जुड़ी कुछ ऐसी बातें, जिन्हें गरुड़ पुराण में पाप और इन्हें करने या सोचने वाले को पापी माना गया है I
लिखा गया है कि -

मातरं भगिनीं ये च विष्णुस्मरणवर्जिता:। अदृष्दोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम्।
भ्रातृधुग्ब्रह्महा गोघ्र: सुरापो गुरुतल्पग:। हेमक्षौमहरस्ताक्ष्र्य स वै 
प्रेतत्वमाप्रुयात्।I
न्यासापहर्ता मित्रधु्रक् परदारतस्तथा। विश्वासघाती क्रूरस्तु स प्रेतो जायते ध्रुवम्।।
कुलमार्गांश्चसंत्यज्य परधर्मतस्तथा। विद्यावृत्तविहीनश्च स प्रेतो जायते ध्रुवम्।।

इन बातों को सरल शब्दों में समझे तो प्रेत योनि में जाने के पीछे ऐसे बुरे काम हैं

- बेकसूर मां, बहन, पत्नी, बहू और कन्या को बेसहारा छोड़ने वाला या उन्हें ऐसे छोड़ने के बारे में विचार रखने वाला।

- गुरुपत्नी के प्रति बुरे भाव रखने वाला, भाई के साथ दगाबाजी, गाय को मारने वाला, नशा करने वाला, किसी भी मनुष्य या ब्राह्मण को मृत्यु तुल्य दु:ख देने वाला व चोर।

- पराई स्त्री के बारे में गलत सोचने वाला और संबंध रखने वाला, घर में रखी अमानत को चुराने वाला, मित्र के साथ धोखा करने वाला, विश्वासघाती और पापी।

- वह अज्ञानी व दुराचरण करने वाला, जो कुटुंब या परिवार की अच्छी परंपराओं को तोड़े।

गरुड़पुराण के अनुसार ये सभी काम करने या सोचने वाला पुरुष पापी होता है और वह मरने के बाद प्रेत बनता है

परान्नं च परस्वं च परशय्या: परस्त्रिय:।
परवेश्मनि वासश्र्च शकादपि हरेच्छ्रियम्।।

मतलब है दूसरों की स्त्री का सेवन, अन्न, धन, शय्या या पलंग का उपयोग और दूसरे के घर में रहना, ये इन्द्र का वैभव भी समाप्त कर देते हैं। सरल शब्दों में कहें तो परस्त्री से संबंध या उसका भोग दरिद्रता या धन हानि का कारण भी बनता है।
इसी तरह लिखा गया है

कुतो निद्रा दरिद्रस्य परप्रेष्यवरस्य च। परनारीप्रस्क्तस्य परद्रव्यहरस्य च।।

यानी पराई नारी पर आसक्त, दरिद्र व दूसरों का भेजा दूत और दूसरों का धन दबाने की मंशा रखने वाले की नींद उड़ जाती है। परस्त्रियों को लेकर बेचैन व आसक्त व्यक्ति चैन की नींद का सुख खोकर रोगी भी हो जाता है।
शास्त्रों के नजरिए से किसी भी स्त्री के साथ किया गया अपमानजनक व्यवहार पुरुष के पतन का कारण बन सकता है। कठोर व्यवहार से स्त्री को वश में करने की कोशिश को बड़ा पाप माना गया है। स्त्री से रिश्ता मां, बहन, पत्नी, बेटी किसी भी रूप में हो, प्रेम और स्नेह के साथ निभाने पर ही सुख देता है। कहा गया है स्त्री को कमतर मानकर, बुरी मानसिकता या भोग का साधन समझ बुरे व्यवहार से अधिकार या वश में करने की कोशिश अंतत: मान-प्रतिष्ठा को धूमिल ही नहीं करती, बल्कि जीवन को दु:खों से भर देती है।

शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि मित्र की स्त्री पर अप्रत्यक्ष दृष्टि या दर्शन से बचें। सरल शब्दों में कहें तो मित्र की स्त्री के प्रति गलत सोच, नजर, भाव या व्यवहार धार्मिक नजरिए से पाप कर्म ही है। यह व्यावहारिक तौर से भी विश्वास भंग करने वाला दोष हैं।ऐसा करना किसी भी व्यक्ति की दुर्गति का कारण बनता है।

जो पुरुष सोचते हैं स्त्री के लिए ऐसी बातें, उन्हें शास्त्रों में पापी माना गया है।

- हिन्दू धर्मग्रंथ शिव पुराण में जिन चार मानसिक या वैचारिक दोषों का जिक्र किया गया है। उनके मुताबिक पराई स्त्री को पाने का संकल्प या चाहत करना भी मानसिक पाप है। जो इंसान के लिए अपार दु:ख, मानसिक अशांति और कलह का कारण बनता है।

इस पुराण के मुताबिक ऐसी बुरी सोच से व्यक्ति को नरक यानी दु:ख भोगना पड़ता हैं।

महाभारत में भी कुछ ऐसे पाप बताए गए हैं, जिनको करने से व्यक्ति पाप का भागी बनता है। ऐसे पापों का बढऩा ही अंत का कारण बनता है।

- पराई स्त्री को बुरी नजर से देखना, बुरा व्यवहार या संबंध बनाना।
- गुरु की स्त्री से संबंध।
- गर्भ हत्या करने वाला।
- घर में आग लगाना या कलह करवाना।
- चुगली करना।
- मित्र के साथ विश्वासघात।
- ब्राह्मण होकर शराब पीना।
- क्रूर स्वभाव वाला।
- धर्म या ईश्वर का विरोध।
- वेद की बुराई करना।
- शराब बेचना।
-हथियार वनाना या बेचना।
- वाचालता या बकवास करना।
- जहर देना

दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे।