Wednesday, 16 December 2015

यहां पर है दुनिया का सबसे ऊंचा शिवलिंग -

भोपाल : यहां पर है दुनिया का सबसे ऊंचा शिवलिंग, पांडवों ने करवाई थी स्थापना -
22 फीट ऊंचा यह शिवलिंग दक्षिण भारत के तंजावुर स्थित बृहदेश्वर मंदिर के शिवलिंग से भी ऊंचा है। जनकथाओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था।

भोपाल के पास है ये मंदिर -
भोजेश्वर नाम से पहचाने जाने वाला यह मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर की दूरी पर है। रायसेन जिले के भोजपुर में स्थित इस मंदिर में काफी आसानी से पहुंचा जा सकता है। भोपाल से होशंगाबाद की तरफ जाने वाले नेशनल हाईवे नंबर 7 में 11 मील से अंदर की ओर भोजपुर के लिए मुख्य रास्ता है। बाहर से आने वाले पर्यटक आसानी से टैक्सी बुक कर यहां पहुंच सकते हैं। इसके साथ ही आप अपने वाहन से भी इस मंदिर में दर्शन के लिए जा सकते हैं।

पांडवों ने बनवाया था ये मंदिर - 
इस मंदिर के निर्माण में दो बातें सामने आती हैं। जनकथाओं के अनुसार वनवास के समय इस शिव मंदिर को पांडवों ने बनवाया था। भीम घुटनों के बल पर बैठकर इस शिवलिंग पर फूल चढाते थे। इसके साथ ही इस मंदिर के पास ही बेतवा नदी है। जहां पर कुंती द्वारा कर्ण को छोड़ने की जनकथाएं भी प्रचलित हैं। वहीँ, पुरातत्व विभाग इन जनकथाओं पर अपनी मुहर नहीं लगाता है। विभाग के अनुसार इस मंदिर का निर्माण मध्यभारत के परमार वंशीय राजा भोजदेव द्वारा करवाया 11वीं सदी में करवाया गया था। राजा भोजदेव कला, स्थापत्य और विद्या के महान संरक्षक थे। इन्होने ग्यारह से अधिक पुस्तकें भी लिखी थी।

कई देवी देवताओं की है मूर्तियां - 
मंदिर के गर्भगृह की अधूरी छत 40 फीट ऊंचे विशालकाय चार स्तंभों पर आधारित है। मंदिर से प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा में सीढ़ियां हैं। गर्भगृह के दरवाजों के दोनों ओर नदी देवी गंगा और यमुना की मूर्तियां लगी हुईं हैं। इसके साथ ही गर्भगृह के विशाल शीर्ष स्तंभ पर उमा-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, ब्रह्मा-सावित्री और सीता-राम की मूर्तियां स्थापित हैं। सामने की दीवार के अलावा बाकी सभी तीन दीवारों में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं हैं। मंदिर के बाहरी दीवार पर यक्षों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।

खंडित हो चुका है शिवलिंग -
17 फीट उंचे चबूतरे पर बने इस मंदिर की ऊंचाई 106 फीट और चौड़ाई 77 फीट है। 22 फीट ऊंचा यह शिवलिंग छत का पत्थर गिरने से यह दो भागों में टूट गया था। इसे बाद में पुरातत्व विभाग द्वारा जोड़ दिया गया है।

विश्व में अनोखी है इस मंदिर की निर्माणकला -
मंदिर के पीछे बने मिटटी के रपटे से मंदिर के निर्माण के बारे में सबसे महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। इस रपटे की मदद से 35 फुट लंबे और 70 टन वजनी पत्थरों को मंदिर के शीर्ष तक पहुंचाया जाता था। मंदिर के पास ही जमीन पर कुछ निशान देखे जा सकते हैं। यहां पर पत्थरों को काट कर तराशा जाता था। फिर इन्हें लकड़ी के गोल गठ्ठों के द्वारा इन पत्थरों को लुढ़का कर रपटे के ऊपर तक पहुंचाया जाता था।


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Friday, 19 June 2015

जानिए अमरनाथ गुफा से जुडे अनजाने रहस्य -


आदि देव महादेव स्वयंभू पशुपति नीलकंठ भगवान आशुतोष शंकर भोले भंडारी को सहस्त्रों नामों से स्तुति कर पुकारा जाता है। शास्त्रों में जगह-जगह पर भगवान शिव के महात्म्य का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में भी शिवजी का गुणगान मिलता है। श्री अमरनाथ धाम एक ऐसा शिव धाम है जिसके संबंध में मान्यता है कि भगवान शिव साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं।

बाबा बर्फानी से जुडे हैरान कर देने वाले तथ्य -
धार्मिक व ऐतिहासिक दृष्टी से अति महत्वपूर्ण श्री अमरनाथ यात्रा को कुछ शिव भक्त स्वर्ग की प्राप्ति का माध्यम बताते हैं तो कुछ लोग मोक्ष प्राप्ति का। श्री अमरनाथ यात्रा हमारी एकता का भी प्रतीक माना जता है। पावन गुफा में बर्फीली बूंदों से बनने वाला हिमशिवलिंग ऐसा दैवी चमत्कार है जिसे देखने के लिए हर कोई लालायित रहता है और जो देख लेता है वो धन्य हो जाता है।

भारत के कोने-कोने से और विदेशों से असंख्य शिव भक्त लगभग 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित श्री अमरनाथ की गुफा में प्रकृति के इस चमत्कार के दर्शन करने के लिए अनेकों बाधाएं पार करके भी पहुंचते हैं। श्री अमरनाथ गुफा में स्थित पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां भगवती सती का कंठ भाग गिरा था।

कश्मीर घाटी में स्थित पावन श्री अमरनाथ गुफा प्राकृतिक है। यह पावन गुफा लगभग 160 फुट लम्बी, 100 फुट चौड़ी और काफी ऊंची है। कश्मीर में वैसे तो 45 शिव धाम, 60 विष्णु धाम, 3 ब्रह्मा धाम, 22 शक्ति धाम, 700 नाग धाम तथा असंख्य तीर्थ हैं पर श्री अमरनाथ धाम का सबसे अधिक महत्व है।

काशी में लिंग दर्शन एवं पूजन से दस गुणा, प्रयाग से सौ गुणा, नैमिषारण्य तथा कुरुक्षेत्र से हजार गुणा फल देने वाला श्री अमरनाथ स्वामी का पूजन है। देवताओं की हजार वर्ष तक स्वर्ण पुष्प मोती एवं पट्टआ वस्त्रों से पूजा का जो फल मिलता है, वह श्री अमरनाथ की रसलिंग पूजा से एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है।

श्री अमरनाथ गुफा में शिव भक्त प्राकृतिक हिमशिवलिंग के साथ-साथ बर्फ से ही बनने वाले प्राकृतिक शेषनाग, श्री गणेश पीठ व माता पार्वती पीठ के भी दर्शन करते हैं। प्राकृतिक रूप से प्रति वर्ष बनने वाले हिमशिवलिंग में इतनी अधिक चमक विद्यमान होती है कि देखने वालों की आंखों को चकाचौंध कर देती है।

हिमशिवलिंग पक्की बर्फ का बनता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही देखने को मिलती है। मान्यता यह भी है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है। भगवान शिव ने माता पार्वती को सृष्टिआ की रचना इसी अमरनाथ गुफा में सुनाई थी।

गुफा की खोज -
इस गुफा की खोज बूटा मलिक नामक एक बहुत ही नेक और दयालु एक मुसलमान गडरिए ने की थी। वह एक दिन भेड़ें चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंचकर उसकी एक साधू से भेंट हो गई। साधू ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दे दी। घर पहुंचकर उसने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधू का धन्यवाद करने के लिए गया परन्तु वहां साधू को न पाकर एक विशाल गुफा को देखा। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया।

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार को गए हुए थे और पार्वती जी वहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि के आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा-देवी! भगवान शंकर, जो हम दोनों से बड़े हैं, के गले में मुंडमाला क्यों है? भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। भगवान शंकर ने कहा-हे पार्वती! जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है, उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।

पार्वती जी बोलीं -
मेरा शरीर नाशवान है, मृत्यु को प्राप्त होता है परन्तु आप अमर हैं, इसका कारण बताने का कष्ट करें। भगवान शंकर ने कहा -यह सब अमरकथा के कारण है। इस पर पार्वती जी के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान से कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं।


भगवान शंकर ने बहुत वर्षों तक टालने का प्रयत्न किया परन्तु अंतत: उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए शिव जी पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्रि) का परित्याग करके इन पर्वत मालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।

श्री अमरकथा गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। उसके बाद चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुणस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंच कर शिव भगवान ने पांचों तत्वों का परित्याग किया।

इसके पश्चात ऐसी मान्यता है कि शिव-पार्वती ने इस पर्वत शृंखला में तांडव किया था। तांडव नृत्य वास्तव में सृष्टिआ के त्याग का प्रतीक माना गया। सब कुछ छोड़ अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। किंवदंती के अनुसार रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन जो सामान्यत: अगस्त के बीच में पड़ती है, भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं।

ऐसा भी ग्रंथों में लिखा मिलता है कि भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है।

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा होती है। इस सम्बन्ध में अमरेश महादेव की कथा भी मशहूर है। इसके अनुसार आदिकाल में ब्रह्म, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, दानव आदि की उत्पत्ति हुई।

इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टिआ हुई परन्तु इंद्रादि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में हुए थे। देवता भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति कर मृत्यु बाधा से मुक्ति का उपाय पूछा। भोलेनाथ स्वामी बोले-मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्युरोग की औषधि है

उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर से अमृत बिंबदु पृथ्वी पर गिर कर सूख गए। पावन गुफा में जो भस्म है, वह इसी अमृत ङ्क्षबदु के कण है। सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए और देवताओं से कहा-देवताओ! आपने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा।

अब आप यहीं अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाएं। आज से मेरा यह अनादि लिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा। भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने देवताओं की मृत्यु का नाश किया, इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।

मनुष्य श्री अमरनाथ जी की यात्रा करके शुद्धि को प्राप्त करता है तथा शिवलिंग के दर्शनों से भीतर-बाहर से शुद्ध होकर धर्म, अर्थ, काम वचन तथा मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। अमरनाथ धाम पहुंचना सौभाग्य की बात है। वहां भगवान शिव के दर्शन करने से सर्वसुख की प्राप्ति होती है। बाबा बर्फानी की गुफा में प्रवेश करके भगवान शिव की साक्षात उपस्थिति का एहसास होता है।

जय बाबा अमरनाथ जय बाबा बर्फानी हर हर महादेव.....

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Thursday, 21 May 2015

भगवान शिव के 10 रुद्रावतार -

ब्रह्मा, विष्णु और शिव में विष्णु और शिव के दर्जनों अवतारों के बारे में पुराणों में मिलता है। विष्णु के 24 अवतार हैं तो शिव के 28 अवतार। लेकिन उनमें भी जो प्रमुख है उसी की चर्चा की जाती है। जैसे विष्णु के 10 अवतार और शिव के 10 अवतार।

हनुमान, अश्वत्थामा, दुर्वासा, पिप्पलाद, वृषभ (जैन धर्म के पहले तीर्थंकर) आदि सभी भी शिव के अवतार हैं, लेकिन यहां प्रस्तुत है शिव के दस रुद्रावतार के बारे में जानकारी। 

वेदों में शिव का नाम ‘रुद्र’ रूप में आया है। रुद्र का अर्थ होता है भयानक। रुद्र संहार के देवता और कल्याणकारी हैं। विद्वानों के मत से उक्त शिव के सभी प्रमुख अवतार व्यक्ति को सुख, समृद्धि, भोग, मोक्ष प्रदान करने वाले एवं व्यक्ति की रक्षा करने वाले हैं।

1. महाकाल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पहला अवतार महाकाल को माना जाता है। इस अवतार की शक्ति मां महाकाली मानी जाती हैं। उज्जैन में महाकाल नाम से ज्योतिर्लिंग विख्यात है।

उज्जैन में ही गढ़कालिका क्षेत्र में मां कालिका का प्राचीन मंदिर है और महाकाली का मंदिर गुजरात के पावागढ़ में है।

2. तारा- शिव के रुद्रावतार में दूसरा अवतार तार (तारा) नाम से प्रसिद्ध है। इस अवतार की शक्ति तारादेवी मानी जाती हैं।

पश्चिम बंगाल के वीरभूम में स्थित द्वारका नदी के पास महाश्मशान में स्थित है तारा पीठ। पूर्वी रेलवे के रामपुर हॉल्ट स्टेशन से 4 मील दूरी पर स्थित है यह पीठ।

3.बाल भुवनेश- देवों के देव महादेव का तीसरा रुद्रावतार है बाल भुवनेश। इस अवतार की शक्ति को बाला भुवनेशी माना गया है।

दस महाविद्या में से एक माता भुवनेश्वरी का शक्तिपीठ उत्तराखंड में है। उत्तरवाहिनी नारद गंगा की सुरम्य घाटी पर यह प्राचीनतम आदि शक्ति मां भुवनेश्वरी का मंदिर पौड़ी गढ़वाल में कोटद्वार सतपुली-बांघाट मोटर मार्ग पर सतपुली से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम विलखेत व दैसण के मध्य नारद गंगा के तट पर मणिद्वीप (सांगुड़ा) में स्थित है। 

इस पावन सरिता का संगम गंगाजी से व्यासचट्टी में होता है, जहां भगवान वेदव्यासजी ने श्रुति एवं स्मृतियों को वेद पुराणों के रूप में लिपिबद्ध किया था।

4. षोडश श्रीविद्येश- भगवान शंकर का चौथा अवतार है षोडश श्रीविद्येश। इस अवतार की शक्ति को देवी षोडशी श्रीविद्या माना जाता है। ‘दस महा-विद्याओं’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं।

भारतीय राज्य त्रिपुरा के उदरपुर के निकट राधाकिशोरपुर गांव के माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर माता का दायाँ पैर गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुर सुंदरी और भैरव को त्रिपुरेश कहते हैं।

5. भैरव- शिव के पांचवें रुद्रावतार सबसे प्रसिद्ध माने गए हैं जिन्हें भैरव कहा जाता है। इस अवतार की शक्ति भैरवी गिरिजा मानी जाती हैं।

उज्जैन के शिप्रा नदी तट स्थित भैरव पर्वत पर मां भैरवी का शक्तिपीठ माना गया है, जहां उनके ओष्ठ गिरे थे। किंतु कुछ विद्वान गुजरात के गिरनार पर्वत के सन्निकट भैरव पर्वत को वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं। अत: दोनों स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है। 

6. छिन्नमस्तक- छठा रुद्र अवतार छिन्नमस्तक नाम से प्रसिद्ध है। इस अवतार की शक्ति देवी छिन्नमस्ता मानी जाती हैं। छिनमस्तिका मंदिर प्रख्यात तांत्रिक पीठ है।

दस महाविधाओं में से एक मां छिन्नमस्तिका का विख्यात सिद्धपीठ झारखंड की राजधानी रांची से 75 किमी दूर रामगढ़ में है। मां का प्राचीन मंदिर नष्ट हो गया था अत: नया मंदिर बनाया गया, किंतु प्राचीन प्रतिमा यहां मौजूद है। 

दामोदर-भैरवी नदी के संगम पर स्थित इस पीठ को शक्तिपीठ माना जाता है। ज्ञातव्य है कि दामोदर को शिव व भैरवी को शक्ति माना जाता है।

7. द्यूमवान- शिव के दस प्रमुख रुद्र अवतारों में सातवां अवतार द्यूमवान नाम से विख्यात है। इस अवतार की शक्ति को देवी धूमावती माना जाता हैं।

धूमावती मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया जिले में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ 'पीताम्बरा पीठ' के प्रांगण में स्थित है। पूरे भारत में यह मां धूमावती का एक मात्र मंदिर है जिसकी मान्यता भी अधिक है। 
8. बगलामुख- शिव का आठवां रुद्र अवतार बगलामुख नाम से जाना जाता है। इस अवतार की शक्ति को देवी बगलामुखी माना जाता है।

दस महाविद्याओं में से एक बगलामुखी के तीन प्रसिद्ध शक्तिपीठ हैं- 1. हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित बगलामुखी मंदिर, 2. मध्यप्रदेश के दतिया जिले में स्थित बगलामुखी मंदिर और 3. मध्यप्रदेश के शाजापुर में स्थित बगलामुखी मंदिर। इसमें हिमाचल के कांगड़ा को अधिक मान्यता है। 

9. मातंग- शिव के दस रुद्रावतारों में नौवां अवतार मातंग है। इस अवतार की शक्ति को देवी मातंगी माना जाता है।

मातंगी देवी अर्थात राजमाता दस महाविद्याओं की एक देवी है। मोहकपुर की मुख्य अधिष्ठाता है। देवी का स्थान झाबुआ के मोढेरा में है।

10. कमल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दसवां अवतार कमल नाम से विख्यात है। इस अवतार की शक्ति को देवी कमला माना जाता है।

शिव के अन्य ग्यारह अवतार- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शम्भू, चण्ड तथा भव का उल्लेख मिलता है।

अन्य अंशावतार- इन अवतारों के अतिरिक्त शिव के दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भी 'शिव पुराण' में हुआ है।

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग भी अवतारों की ही श्रेणी में आते हैं। 

बारह ज्योतिर्लिंग
1. सौराष्ट्र में ‘सोमनाथ’,
2. श्रीशैल में ‘मल्लिकार्जुन’,
3. उज्जयिनी में ‘महाकालेश्वर’,
4. ओंकार में ‘अम्लेश्वर’,
5. हिमालय में ‘केदारनाथ’,
6. डाकिनी में ‘भीमेश्वर’,
7. काशी में ‘विश्वनाथ’,
8. गोमती तट पर ‘त्र्यम्बकेश्वर’,
9. चिताभूमि में ‘वैद्यनाथ’,
10. दारुक वन में ‘नागेश्वर’,
11. सेतुबंध में ‘रामेश्वर’ और
12. शिवालय में ‘घुश्मेश्वर’।

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Sunday, 17 May 2015

शिवपुराण में शिव-शक्ति का संयोग -

शिव पुराण के अनुसार शिव-शक्ति का संयोग ही परमात्मा है। शिव की जो पराशक्ति है उससे चित्‌ शक्ति प्रकट होती है। चित्‌ शक्ति से आनंद शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, आनंद शक्ति से इच्छाशक्ति का उद्भव हुआ है, इच्छाशक्ति से ज्ञानशक्ति और ज्ञानशक्ति से पांचवीं क्रियाशक्ति प्रकट हुई है। इन्हीं से निवृत्ति आदि कलाएं उत्पन्न हुई हैं। 

चित्‌ शक्ति से नाद और आनंदशक्ति से बिंदु का प्राकट्य बताया गया है। इच्छाशक्ति से 'म' कार प्रकट हुआ है। ज्ञानशक्ति से पांचवां स्वर 'उ' कार उत्पन्न हुआ है और क्रियाशक्ति से 'अ' कार की उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार प्रणव (ॐ) की उत्पत्ति हुई है। 

शिव से ईशान उत्पन्न हुए हैं, ईशान से तत्पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ है। तत्पुरुष से अघोर का, अघोर से वामदेव का और वामदेव से सद्योजात का प्राकट्य हुआ है। इस आदि अक्षर प्रणव से ही मूलभूत पांच स्वर और तैंतीस व्यजंन के रूप में अड़तीस अक्षरों का प्रादुर्भाव हुआ है। उत्पत्ति क्रम में ईशान से शांत्यतीताकला उत्पन्न हुई है। ईशान से चित्‌ शक्ति द्वारा मिथुनपंचक की उत्पत्ति होती है। 

अनुग्रह, तिरोभाव, संहार, स्थिति और सृष्टि इन पांच कृत्यों का हेतु होने के कारण उसे पंचक कहते हैं। यह बात तत्वदर्शी ज्ञानी मुनियों ने कह है। वाच्य वाचक के संबंध से उनमें मिथुनत्व की प्राप्ति हुई है। कला वर्णस्वरूप इस पंचक में भूतपंचक की गणना है। आकाशादि के क्रम से इन पांचों मिथुनों की उत्पत्ति हुई है। इनमें पहला मिथुन है आकाश, दूसरा वायु, तीसरा अग्नि, चौथा जल और पांचवां मिथुन पृथ्वी है। 

इनमें आकाश से लेकर पृथ्वी तक के भूतों का जैसा स्वरूप बताया गया है, वह इस प्रकार है - आकाश में एकमात्र शब्द ही गुण है, वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, अग्नि में शब्द, स्पर्श और रूप इन तीन गुणों की प्रधानता है, जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस ये चार गुण माने गए हैं तथा पृथ्वी शब्द, स्पर्श, रूप , रस और गंध इन पांच गुणों से संपन्न है। यही भूतों का व्यापकत्व कहा गया है अर्थात्‌ शब्दादि गुणों द्वारा आकाशदि भूत वायु आदि परवर्ती भूतों में किस प्रकार व्यापक है, यह दिखाया गया है। 

इसके विपरीत गंधादि गुणों के क्रम से वे भूत पूर्ववर्ती भूतों से व्याप्य हैं अर्थात्‌ गंध गुणवाली पृथ्वी जल का और रसगुणवाला जल अग्नि का व्याप्य है, इत्यादि रूप से इनकी व्याप्यता को समझना चाहिए। पांच भूतों (महत्‌ तत्व) का यह विस्तार ही प्रपंच कहलाता है। 


ND
सर्वसमष्टि का जो आत्मा है, उसी का नाम विराट है और पृथ्वी तल से लेकर क्रमशः शिवतत्व तक जो तत्वों का समुदाय है वही ब्रह्मांड है। वह क्रमशः तत्वसमूह में लीन होता हुआ अंततोगत्वा सबके जीवनभूत चैतन्यमय परमेश्वर में ही लय को प्राप्त होता है और सृष्टिकाल में फिर शक्ति द्वारा शिव से निकल कर स्थूल प्रपंच के रूप में प्रलयकालपर्यंत सुखपूर्वक स्थित रहता है। 

अपनी इच्छा से संसार की सृष्टि के लिए उद्यत हुए महेश्वर का जो प्रथम परिस्पंद है, उसे शिवतत्व कहते हैं। यही इच्छाशक्ति तत्व है, क्योंकि संपूर्ण कृत्यों में इसी का अनुवर्तन होता है। ज्ञान और क्रिया, इन दो शक्तियों में जब ज्ञान का आधिक्य हो, तब उसे सदाशिवतत्व समझना चाहिए, जब क्रियाशक्ति का उद्रेक हो तब उसे महेश्वर तत्व जानना चाहिए तथा जब ज्ञान और क्रिया दोनों शक्तियां समान हों तब वहां शुद्ध विद्यात्मक तत्व समझना चाहए। 

जब शिव अपने रूप को माया से निग्रहीत करके संपूर्ण पदार्थों को ग्रहण करने लगता है, तब उसका नाम पुरुष होता है।

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भगवान शंकर क्यों कहलाए नीलकंठ ?


समुद्र मंथन के दौरान जब देवतागण एवं असुर पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए मंथन कर रहे थे, तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं और देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गर्मी से जलने लगे। 

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने भयंकर विष को अपने शंख में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलंकठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

जिस समय भगवान शिव विषपान कर रहे थे, उस समय विष की कुछ बूंदें नीचे गिर गईं। जिन्हें बिच्छू, सांप आदि जीवों और कुछ वनस्पतियों ने ग्रहण कर लिया। इसी विष के कारण वे विषैले हो गए। विष का प्रभाव समाप्त होने पर सभी देवगण भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे।

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कैसे जन्मीं भगवान शंकर की बहन और उनसे क्यों परेशान हुईं मां पार्वती - पौराणिक कथा


हिंदुस्तान में परिवारिक रिश्तों का खास महत्व है. आज भले ही लोग संयुक्त परिवार से मुंह मोड़ रहे हों और उनका ध्यान एकल परिवार की तरफ तेजी से बढ़ रहा हो, इसके बावजूद भी लोग खुद को रिश्तों के बंधन से मुक्त नहीं कर पाए हैं. लोग विभिन्न पारिवारिक समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर परिवार के अटूट बंधन को और ज्यादा मजबूत करते हैं.

पौराणिक कथा के अनुसार जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से विवाह किया तो वह खुद को घर में अकेली महसूस करती थीं. उनकी इच्छा थी कि काश उनकी भी एक ननद होती जिससे उनका मन लगा रहता.  लेकिन भगवान शिव तो अजन्मे थे, उनकी कोई बहन नहीं थी इसलिए पार्वती मन की बात मन में रख कर बैठ गईं. भगवान शिव तो अन्तर्यामी हैं उन्होंने देवी पार्वती के मन की बात जान ली. उन्होंने पार्वती से पूछा कोई समस्या है देवी? तब पार्वती ने कहा कि काश उनकी भी कोई ननद होती.
भगवान शिव ने कहा मैं तुम्हें ननद तो लाकर दे दूं, लेकिन क्या ननद के साथ आपकी बनेगी. पार्वती जी ने कहा कि भला ननद से मेरी क्यों न बनेगी. भगवान शिव ने कहा ठीक है देवी, मैं तुम्हें एक ननद लाकर दे देता हूं. भगवान शिव ने अपनी माया से एक देवी को उत्पन्न कर दिया. यह देवी बहुत ही मोटी थी, इनके पैरों में दरारें पड़ी हुई थीं. भगवान शिव ने कहा कि यह लो तुम्हारी ननद आ गयी. इनका नाम असावरी देवी है.
देवी पार्वती अपनी ननद को देखकर बड़ी खुश हुईं. झटपट असावरी देवी के लिए भोजन बनाने लगीं. असावरी देवी स्नान करके आईं और भोजन मांगने लगीं. देवी पार्वती ने भोजन परोस दिया. जब असावरी देवी ने खाना शुरू किया, तो पार्वती के भंडार में जो कुछ भी था सब खा गईं और महादेव के लिए कुछ भी नहीं बचा. इससे पार्वती दुःखी हो गईं. इसके बाद जब देवी पार्वती ने ननद को पहनने के लिए नए वस्त्र दिए, तो मोटी असावरी देवी के लिए वह वस्त्र छोटे पड़ गए. पार्वती उनके लिए दूसरे वस्त्र का इंतजाम करने लगीं.
इस बीच ननद रानी को अचानक मजाक सूझा और उन्होंने अपने पैरों की दरारों में पार्वती जी को छुपा लिया. पार्वती जी का दम घुटने लगा. महादेव ने जब असावरी देवी से पार्वती के बारे में पूछा तो असावरी देवी ने झूठ बोला. जब शिव जी ने कहा कि कहीं ये तुम्हारी बदमाशी तो नहीं, असावरी देवी हंसने लगीं और जमीन पर पांव पटक दिया. इससे पैर की दरारों में दबी देवी पार्वती बाहर आ गिरीं.
उधर ननद के व्यवहार से देवी पार्वती का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. देवी पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि कृपया ननद को जल्दी से ससुराल भेजने की कृपा करें. मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने ननद की चाह की. भगवान शिव ने असावरी देवी को कैलाश से विदा कर दिया. लेकिन इस घटना के बाद से ननद और भाभी के बीच नोक-झोंक का सिलसिला शुरू हो गया.
तकरार, मन-मुटाव, नोक-झोंक किसी भी रिश्ते में न हो तो कोई भी परिवार मजबूत नहीं हो सकता. अपने रिश्तों में प्यार और विश्वास लाना है तो ऐसे तकरारों से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि खुशी-खुशी गले लगाना चाहिए.

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एक बार भोले शंकर से बोलीं हँस कर पार्वती - पौराणिक कथा


एक बार भोले शंकर से बोलीं हँस कर पार्वती,
'चलो जरा विचरण कर आये, धरती पर हे धूर्जटी !
विस्मित थे शंकर कि उमा को बैठे-ठाले क्या सूझा,
कुछ कारण होगा अवश्य मन ही मन में अपने बूझा !
'वह अवंतिका पुरी तुम्हारी, बसी हुई शिप्रा तट पर,
वैद्यनाथ तुम, सोमेश्वर, तुम विश्वनाथ हे शिव शंकर !
बहिन नर्मदा विनत चरण में अर्घ्य लिये ओंकारेश्वर ,
जल धारे सारी सरितायें, प्रभु, अभिषेक हेतु तत्पर !
इधर बहिन गंगा के तट पर देखें कैसा है जीवन,
यमुना के तटपर चल देखें मुरली धर का वृन्दावन !
बहनों से मिलने को व्याकुल हुआ हृदय कैलाश पती ! '
शिव शंकर से कह बैठीं अनमनी हुई सी देवि सती !
जान रहे थे शंभु कि जनों के दुख से जुडी जगत- जननी ,
जीव-जगत के हित-साधन को चल पडती मंगल करणी !
'जैसी इच्छा, चलो प्रिये,आओ नंदी पर बैठो तुम ,
पंथ सुगम हो देवि, तुम्हारे साथ-साथ चलते हैं हम !'
अटकाया डमरू त्रिशूल में ऊपर लटका ली झोली ,
वेष बदल कर निकल पडे, शंकर की वाणी यह बोली -
' जहाँ जहाँ मैं वहाँ वहाँ मुझसे अभिन्न सहचारिणि तुम ,
हरसिद्धि, अंबा, कुमारिका, भाव तुम्हारे हैं अनगिन !
'ग्राम मगर के हर मन्दिर में नाम रूप नव-नव धरती !'
हिम शिखरों के महादेव यों कहें, 'अपर्णा हेमवती !
मेकल सुता और कावेरी ,याद कर रहीं तुम्हें सतत,
यहाँ तुम्हारा मन व्याकुल हो उसी प्रेमवश हुआ विवश ! '
उतरे ऊँचे हिम-शिखरों से रम्य तलहटी में आये,
घन तरुओं की हरीतिमा में प्रीतिपूर्वक बिलमाये !
आगे बढते जन-जीवन को देख-देख कर हरषाते ,
नंदी पर माँ उमा विराजें, शिव डमरू को खनकाते !
हँसा देख कर एक पथिक, 'देखो रे कलियुग की माया,
पति धरती पर पैदल चलता, चढी हुई ऊपर जाया !'
रुकीं उमा उतरीं नंदी से, बोलीं, 'बैठो परमेश्वर!
मैं पैदल ही भली, कि कोई जन उपहास न पाये कर !'
'इच्छा पूरी होय तुम्हारी, 'शिव ने मान लिया झट से,
नंदी पर चढ गये सहज ही अपने गजपट को साधे !
आगे आगे चले जा रहे इस जन संकुल धरती पर ,
खेत और खलिहान, कार्य के उपक्रम में सब नारी नर !
उँगली उनकी ओर उठा कर दिखा रहा था एक जना ,
कोमल नारी धरती पर, मुस्टंड बैल पर बैठ तना !'
'देख लिया ,सुन लिया ?' खिन्न वे उतरे नंदी खडा रहा,
उधर संकुचित पार्वती ने सुना कि जो कुछ कहा गया !
'हम दोनों चढ चलें चलो, अब इसमें कुछ अन्यथा नहीं ।
शंकर झोली टाँगे आगे फिर जग -जननि विराज रहीं !
दोनों को ले मुदित हृदय से मंथर गति चलता नंदी ,
हरे खेत सजते धरती पर बजती चैन भरी बंसी !
'कैसे निर्दय चढ बैठे हैं, स्वस्थ सबल दोनों प्राणी ,
बूढा बैल ढो रहा बोझा, उसकी पीर नहीं जानी !'
कह-सुन कर बढ गये लोग, हतबुद्धि उमा औ' शंभु खडे ,
कान हिलाता वृषभ ताकता दोनो के मुख, मौन धरे !
चलो, चलो रे नंदी, पैदल साथ साथ चलते हैं हम,
संभव है इससे ही समाधान पा जाये जन का मन !
जब शंकर से उस दिन बोलीं आदि शक्ति माँ धूमवती ,
चलो, जरा चल कर तो देखें कैसी है अब यह धरती !
हा,हा हँसते लोग मिल गये उन्हें पंथ चलते-चलते,
पुष्ट बैल है साथ देख ले फिर भी फिर भी ये चलते,
जड मति का ऐसा उदाहरण, और कहीं देखा है क्या ?'
वे तो चलते बने किन्तु, रह गये शिवा-शिव चक्कर खा !
'केसे भी तो चैन नहीं, दुनिया को, देखा पार्वती,
अच्छा था उस कजरी वन में परम शान्ति से तुम रहतीं !'
'सबकी अपनी-अपनी मति, क्यों सोच हो रहा देव, तुम्हें ,
उनको चैन कहाँ जो सबमें केवल त्रुटियाँ ही ढूँढे !
दुनिया है यह यहाँ नहीं प्रतिबन्ध किसी की जिह्वा पर,
चुभती बातें कहते ज्यों ही पा जाते कोई अवसर !
अज्ञानी हैं नाथ,इन्हें कहने दो, जो भी ये समझें ,
निरुद्विग्न रह वही करें हम जो कि स्वयं को उचित लगे !
कभी बुद्धि निर्मल होगी जो छलमाया में भरमाई !
इनकी शुभ वृत्तियाँ जगाने मैं,हिमगिरि से चल आई,
ये अबोध अनजान निरे, दो क्षमा-दान हे परमेश्वर !
जागें सद्-विवेक वर दे दो विषपायी हे, शिवशंकर !'
अपनी कल्याणी करुणा से सिंचित करतीं यह जगती,
भोले शंकर से बोलीं परमेश्वरि दुर्गा महाव्रती !

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