Tuesday, 18 August 2015

नागपंचमी : नागवंश का इतिहास और नागपूजा -

नागपंचमी को सांप पंचमी क्यों नहीं कहा जा सकता? सरीसृप प्रजाति के प्राणी को पूजा जाता है,वह सर्प है किन्तु नाग तो एक जाति है जिनके संबंध में विभिन्न मतानुसार अलग-अलग मान्यताएं है-यक्षों की एक समकालीन जाति सर्प चिन्ह वाले नागों की थी,यह भी दक्षिण भारत में पनपी थी। नागों ने लंका के कुछ भागों पर ही नहीं,वरन प्राचीन मलाबार पर अधिकार जमा रखा था। 
रामायण में सुरसा को नागों की माता और समुद्र को उनका अधिष्ठान बताया गया है। महेंद्र और मैनाक पर्वतों की गुफाओं में भी नाग निवास करते थे। हनुमानजी द्वारा समुद्र लांघने की घटना को नागों ने प्रत्यक्ष देखा था। 
नागों की स्त्रियां अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थी। रावण ने कई नाग कन्याओं का अपहरण किया था। प्राचीन काल में विषकन्याओं का चलन भी कुछ ज्यादा ही था। इनसे शारीरिक संपर्क करने पर व्यक्ति की मौत हो जाती थी। ऐसी विषकन्याओं को राजा अपने राजमहल में शत्रुओं पर विजय पाने तथा षड्यंत्र का पता लगाने हेतु भी रखा करते थे। रावण ने नागों की राजधानी भोगवती नगरी पर आक्रमण करके वासुकि,तक्षक,शंक और जटी नामक प्रमुख नागों को परास्त किया था। कालान्तर में नाग जाति चेर जाति में विलीन गई ,जो ईस्वी सन के प्रारम्भ में अधिक संपन्न हुई थी। 
नागपंचमी मनाने के संबंध में एक मत यह भी है कि अभिमन्यु के बेटे राजा परीक्षित ने तपस्या में लीन ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया था। इस पर ऋषि के शिष्य श्रृंगी ऋषि ने क्रोधित होकर शाप दिया कि यही सर्प सात दिनों के पश्चात तुम्हे जीवित होकर डस लेगा,ठीक सात दिनों के पश्चात उसी तक्षक सर्प ने जीवित होकर राजा को डसा। तब क्रोधित होकर राजा परीक्षित के बेटे जन्मजय ने विशाल "सर्प यज्ञ" किया जिसमे सर्पो की आहुतियां दी। 
इस यज्ञ को रुकवाने हेतु महर्षि आस्तिक आगे आए। उनका आगे आने का  कारण यह था कि महर्षि आस्तिक के पिता आर्य और माता नागवंशी थी। इसी नाते से वे यज्ञ होते देख न देख सके।सर्प यज्ञ रुकवाने,लड़ाई को ख़त्म करने पुनः अच्छे सबंधों को बनाने हेतु आर्यो ने स्मृति स्वरूप अपने त्योहारों में 'सर्प पूजा' को एक त्योहार के रूप में मनाने की शुरुआत की। 
नागवंश से ताल्लुक रखने पर उसे नागपंचमी कहा जाने लगा होगा। मास्को के लेखक ग्री म वागर्द लोविन ने प्राचीन 'भारत का इतिहास' में नाग राजवंशों के बारे में बताया कि मगध के प्रभुत्व के सुधार करने के लिए अजातशत्रु का उत्तराअधिकारी उदय (461-ईपू )राजधानी को राजगृह से पाटलीपुत्र ले गया,जो प्राचीन भारत प्रमुख बन गया। अवंति शक्ति को बाद में राजा शिशुनाग के राज्यकाल में ध्वस्त किया गया था। एक अन्य राज शिशुनाग वंश का था। शिशु नाग वंश का स्थान नंद वंश (345 ईपू)ने लिया।  

भाव शतक में इसे धाराधीश बताया गया है अर्थात नागों का वंश राज्य उस समय धरा नगरी(वर्तमान में धार) तक विस्तृत था। धाराधीश मुंज के अनुज और राजा भोज के पिता सिन्धुराज या सिंधुज ने विध्याटवी के नागवंशीय राजा शंखपाल की कन्या शशिप्रभा से विवाह किया था। इस कथानक पर परमारकालीन राज कवि परिमल पदमगुप्त ने नवसाहसांक चरित्र ग्रंथ की रचना की। मुंज का राज्यकाल 10 वीं शती ईपु का है। अतः इस काल तक नागों का विंध्य क्षेत्र में अस्तित्व था।

नागवंश के अंतिम राजा गणपतिनाग थे। इसके बाद नाग वंश की जानकारी का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। नाग जनजाति का नर्मदा घाटी में निवास स्थान होना बताया गया है। लगभग 1200  ईपु हैहय ने नागों को वहां से उखाड़ फेंका था।कुषान साम्राज्य के पतन के बाद नागों का पुनरोदय हुआ और यह नव नाग कहलाए। 
इनका राज्य मथुरा,विदिशा,कांतिपुरी,(कुतवार )व् पदमावती (पवैया )तक विस्तृत था। नागों ने अपने शासन काल के दौरान जो सिक्के चलाए थे उसमे सर्प के चित्र अंकित थे। इससे भी यह तथ्य प्रमाणित होता है कि नागवंशीय राजा सर्प पूजक थे। शायद इसी पूजा की प्रथा को निरंतर रखने हेतु श्रावण शुक्ल की पंचमी को नागपंचमी का चलन रखा गया होगा। कुछ लोग नागदा नामक ग्रामों को नागदा से भी जोड़ते है। यहां नाग-नागिन की प्रतिमाएं और चबूतरे बने हुए हैं  इन्हे भिलट बाबा के नाम से भी पुकारा है। 
उज्जैन में नागचंद्रेश्वर का मंदिर नागपंचमी के दिन खुलता है व सर्प उद्यान भी है। 
खरगोन में नागलवाड़ी क्षेत्र में नागपंचमी के दिन मेला व बड़ा भंडारा होता है।स र्प कृषि मित्र है व सर्प दूध नहीं पीते हैं,उनकी पूजा करना व रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।

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Friday, 29 May 2015

पौराणिक कथा - गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है ?

दूर्वा यानि दूब यह एक तरह की घास होती है जो गणेश पूजन में प्रयोग होती है। एक मात्र गणेश ही ऐसे देव है जिनको यह चढ़ाई जाती है। दूर्वा गणेशजी को अतिशय प्रिय है। इक्कीस दूर्वा को इक्कठी कर एक गांठ बनाई जाती है तथा कुल 21 गांठ गणेशजी को मस्तक पर चढ़ाई जाती है। लेकिन आखिर क्यों दूर्वा की 21 गांठे गणेशजी को चढ़ाई जाती है इसके लिए पुराणों में एक कथा है।

पौराणिक कथा :
कथा के अनुसार प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक दैत्य था। इस दैत्य के कोप से स्वर्ग और धरती पर त्राही-त्राही मची हुई थी। अनलासुर ऋषि-मुनियों और आम लोगों को जिंदा निगल जाता था। दैत्य से त्रस्त होकर देवराज इंद्र सहित सभी देवी-देवता और प्रमुख ऋषि-मुनि महादेव से प्रार्थना करने पहुंचे। सभी ने शिवजी से प्रार्थना की कि वे अनलासुर के आतंक का नाश करें।
शिवजी ने सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रार्थना सुनकर कहा कि अनलासुर का अंत केवल श्रीगणेश ही कर सकते हैं।

जब श्रीगणेश ने अनलासुर को निगला तो उनके पेट में बहुत जलन होने लगी। कई प्रकार के उपाय करने के बाद भी गणेशजी के पेट की जलन शांत नहीं हो रही थी। तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा की 21 गांठ बनाकर श्रीगणेश को खाने को दी। जब गणेशजी ने दूर्वा ग्रहण की तो उनके पेट की जलन शांत हो गई। तभी से श्रीगणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई।

दूर्वा चढ़ाते वक़्त बोले मन्त्र :
गणेश जी को  21 दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे 10 मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें।

ॐ गणाधिपाय नमः ,ॐ उमापुत्राय नमः ,ॐ विघ्ननाशनाय नमः ,ॐ विनायकाय नमः
ॐ ईशपुत्राय नमः ,ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः ,ॐ एकदन्ताय नमः ,ॐ इभवक्त्राय नमः
ॐ मूषकवाहनाय नमः ,ॐ कुमारगुरवे नमः

औषधि है दूर्वा :
इस कथा द्वारा हमे यह संदेश प्राप्त होता है की पेट की जलन, तथा पेट के रोगों के लिए दूर्वा औषधि का कार्य करती है। मानसिक शांति के लिए यह बहुत लाभप्रद है। यह विभिन्न बीमारियों में एंटिबायोटिक का काम करती है, उसको देखने और छूने से मानसिक शांति मिलती है और जलन शांत होती है। वैज्ञानिको ने अपने शोध में पाया है कि कैंसर रोगियों के लिए भी यह लाभप्रद है।

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Sunday, 17 May 2015

भगवान शंकर क्यों कहलाए नीलकंठ ?


समुद्र मंथन के दौरान जब देवतागण एवं असुर पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए मंथन कर रहे थे, तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं और देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गर्मी से जलने लगे। 

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने भयंकर विष को अपने शंख में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलंकठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

जिस समय भगवान शिव विषपान कर रहे थे, उस समय विष की कुछ बूंदें नीचे गिर गईं। जिन्हें बिच्छू, सांप आदि जीवों और कुछ वनस्पतियों ने ग्रहण कर लिया। इसी विष के कारण वे विषैले हो गए। विष का प्रभाव समाप्त होने पर सभी देवगण भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे।

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कैसे जन्मीं भगवान शंकर की बहन और उनसे क्यों परेशान हुईं मां पार्वती - पौराणिक कथा


हिंदुस्तान में परिवारिक रिश्तों का खास महत्व है. आज भले ही लोग संयुक्त परिवार से मुंह मोड़ रहे हों और उनका ध्यान एकल परिवार की तरफ तेजी से बढ़ रहा हो, इसके बावजूद भी लोग खुद को रिश्तों के बंधन से मुक्त नहीं कर पाए हैं. लोग विभिन्न पारिवारिक समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर परिवार के अटूट बंधन को और ज्यादा मजबूत करते हैं.

पौराणिक कथा के अनुसार जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से विवाह किया तो वह खुद को घर में अकेली महसूस करती थीं. उनकी इच्छा थी कि काश उनकी भी एक ननद होती जिससे उनका मन लगा रहता.  लेकिन भगवान शिव तो अजन्मे थे, उनकी कोई बहन नहीं थी इसलिए पार्वती मन की बात मन में रख कर बैठ गईं. भगवान शिव तो अन्तर्यामी हैं उन्होंने देवी पार्वती के मन की बात जान ली. उन्होंने पार्वती से पूछा कोई समस्या है देवी? तब पार्वती ने कहा कि काश उनकी भी कोई ननद होती.
भगवान शिव ने कहा मैं तुम्हें ननद तो लाकर दे दूं, लेकिन क्या ननद के साथ आपकी बनेगी. पार्वती जी ने कहा कि भला ननद से मेरी क्यों न बनेगी. भगवान शिव ने कहा ठीक है देवी, मैं तुम्हें एक ननद लाकर दे देता हूं. भगवान शिव ने अपनी माया से एक देवी को उत्पन्न कर दिया. यह देवी बहुत ही मोटी थी, इनके पैरों में दरारें पड़ी हुई थीं. भगवान शिव ने कहा कि यह लो तुम्हारी ननद आ गयी. इनका नाम असावरी देवी है.
देवी पार्वती अपनी ननद को देखकर बड़ी खुश हुईं. झटपट असावरी देवी के लिए भोजन बनाने लगीं. असावरी देवी स्नान करके आईं और भोजन मांगने लगीं. देवी पार्वती ने भोजन परोस दिया. जब असावरी देवी ने खाना शुरू किया, तो पार्वती के भंडार में जो कुछ भी था सब खा गईं और महादेव के लिए कुछ भी नहीं बचा. इससे पार्वती दुःखी हो गईं. इसके बाद जब देवी पार्वती ने ननद को पहनने के लिए नए वस्त्र दिए, तो मोटी असावरी देवी के लिए वह वस्त्र छोटे पड़ गए. पार्वती उनके लिए दूसरे वस्त्र का इंतजाम करने लगीं.
इस बीच ननद रानी को अचानक मजाक सूझा और उन्होंने अपने पैरों की दरारों में पार्वती जी को छुपा लिया. पार्वती जी का दम घुटने लगा. महादेव ने जब असावरी देवी से पार्वती के बारे में पूछा तो असावरी देवी ने झूठ बोला. जब शिव जी ने कहा कि कहीं ये तुम्हारी बदमाशी तो नहीं, असावरी देवी हंसने लगीं और जमीन पर पांव पटक दिया. इससे पैर की दरारों में दबी देवी पार्वती बाहर आ गिरीं.
उधर ननद के व्यवहार से देवी पार्वती का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. देवी पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि कृपया ननद को जल्दी से ससुराल भेजने की कृपा करें. मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने ननद की चाह की. भगवान शिव ने असावरी देवी को कैलाश से विदा कर दिया. लेकिन इस घटना के बाद से ननद और भाभी के बीच नोक-झोंक का सिलसिला शुरू हो गया.
तकरार, मन-मुटाव, नोक-झोंक किसी भी रिश्ते में न हो तो कोई भी परिवार मजबूत नहीं हो सकता. अपने रिश्तों में प्यार और विश्वास लाना है तो ऐसे तकरारों से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि खुशी-खुशी गले लगाना चाहिए.

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एक बार भोले शंकर से बोलीं हँस कर पार्वती - पौराणिक कथा


एक बार भोले शंकर से बोलीं हँस कर पार्वती,
'चलो जरा विचरण कर आये, धरती पर हे धूर्जटी !
विस्मित थे शंकर कि उमा को बैठे-ठाले क्या सूझा,
कुछ कारण होगा अवश्य मन ही मन में अपने बूझा !
'वह अवंतिका पुरी तुम्हारी, बसी हुई शिप्रा तट पर,
वैद्यनाथ तुम, सोमेश्वर, तुम विश्वनाथ हे शिव शंकर !
बहिन नर्मदा विनत चरण में अर्घ्य लिये ओंकारेश्वर ,
जल धारे सारी सरितायें, प्रभु, अभिषेक हेतु तत्पर !
इधर बहिन गंगा के तट पर देखें कैसा है जीवन,
यमुना के तटपर चल देखें मुरली धर का वृन्दावन !
बहनों से मिलने को व्याकुल हुआ हृदय कैलाश पती ! '
शिव शंकर से कह बैठीं अनमनी हुई सी देवि सती !
जान रहे थे शंभु कि जनों के दुख से जुडी जगत- जननी ,
जीव-जगत के हित-साधन को चल पडती मंगल करणी !
'जैसी इच्छा, चलो प्रिये,आओ नंदी पर बैठो तुम ,
पंथ सुगम हो देवि, तुम्हारे साथ-साथ चलते हैं हम !'
अटकाया डमरू त्रिशूल में ऊपर लटका ली झोली ,
वेष बदल कर निकल पडे, शंकर की वाणी यह बोली -
' जहाँ जहाँ मैं वहाँ वहाँ मुझसे अभिन्न सहचारिणि तुम ,
हरसिद्धि, अंबा, कुमारिका, भाव तुम्हारे हैं अनगिन !
'ग्राम मगर के हर मन्दिर में नाम रूप नव-नव धरती !'
हिम शिखरों के महादेव यों कहें, 'अपर्णा हेमवती !
मेकल सुता और कावेरी ,याद कर रहीं तुम्हें सतत,
यहाँ तुम्हारा मन व्याकुल हो उसी प्रेमवश हुआ विवश ! '
उतरे ऊँचे हिम-शिखरों से रम्य तलहटी में आये,
घन तरुओं की हरीतिमा में प्रीतिपूर्वक बिलमाये !
आगे बढते जन-जीवन को देख-देख कर हरषाते ,
नंदी पर माँ उमा विराजें, शिव डमरू को खनकाते !
हँसा देख कर एक पथिक, 'देखो रे कलियुग की माया,
पति धरती पर पैदल चलता, चढी हुई ऊपर जाया !'
रुकीं उमा उतरीं नंदी से, बोलीं, 'बैठो परमेश्वर!
मैं पैदल ही भली, कि कोई जन उपहास न पाये कर !'
'इच्छा पूरी होय तुम्हारी, 'शिव ने मान लिया झट से,
नंदी पर चढ गये सहज ही अपने गजपट को साधे !
आगे आगे चले जा रहे इस जन संकुल धरती पर ,
खेत और खलिहान, कार्य के उपक्रम में सब नारी नर !
उँगली उनकी ओर उठा कर दिखा रहा था एक जना ,
कोमल नारी धरती पर, मुस्टंड बैल पर बैठ तना !'
'देख लिया ,सुन लिया ?' खिन्न वे उतरे नंदी खडा रहा,
उधर संकुचित पार्वती ने सुना कि जो कुछ कहा गया !
'हम दोनों चढ चलें चलो, अब इसमें कुछ अन्यथा नहीं ।
शंकर झोली टाँगे आगे फिर जग -जननि विराज रहीं !
दोनों को ले मुदित हृदय से मंथर गति चलता नंदी ,
हरे खेत सजते धरती पर बजती चैन भरी बंसी !
'कैसे निर्दय चढ बैठे हैं, स्वस्थ सबल दोनों प्राणी ,
बूढा बैल ढो रहा बोझा, उसकी पीर नहीं जानी !'
कह-सुन कर बढ गये लोग, हतबुद्धि उमा औ' शंभु खडे ,
कान हिलाता वृषभ ताकता दोनो के मुख, मौन धरे !
चलो, चलो रे नंदी, पैदल साथ साथ चलते हैं हम,
संभव है इससे ही समाधान पा जाये जन का मन !
जब शंकर से उस दिन बोलीं आदि शक्ति माँ धूमवती ,
चलो, जरा चल कर तो देखें कैसी है अब यह धरती !
हा,हा हँसते लोग मिल गये उन्हें पंथ चलते-चलते,
पुष्ट बैल है साथ देख ले फिर भी फिर भी ये चलते,
जड मति का ऐसा उदाहरण, और कहीं देखा है क्या ?'
वे तो चलते बने किन्तु, रह गये शिवा-शिव चक्कर खा !
'केसे भी तो चैन नहीं, दुनिया को, देखा पार्वती,
अच्छा था उस कजरी वन में परम शान्ति से तुम रहतीं !'
'सबकी अपनी-अपनी मति, क्यों सोच हो रहा देव, तुम्हें ,
उनको चैन कहाँ जो सबमें केवल त्रुटियाँ ही ढूँढे !
दुनिया है यह यहाँ नहीं प्रतिबन्ध किसी की जिह्वा पर,
चुभती बातें कहते ज्यों ही पा जाते कोई अवसर !
अज्ञानी हैं नाथ,इन्हें कहने दो, जो भी ये समझें ,
निरुद्विग्न रह वही करें हम जो कि स्वयं को उचित लगे !
कभी बुद्धि निर्मल होगी जो छलमाया में भरमाई !
इनकी शुभ वृत्तियाँ जगाने मैं,हिमगिरि से चल आई,
ये अबोध अनजान निरे, दो क्षमा-दान हे परमेश्वर !
जागें सद्-विवेक वर दे दो विषपायी हे, शिवशंकर !'
अपनी कल्याणी करुणा से सिंचित करतीं यह जगती,
भोले शंकर से बोलीं परमेश्वरि दुर्गा महाव्रती !

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Saturday, 9 May 2015

हिमालय के चमत्कारिक महात्मा की रहस्यमय दास्तां - पौराणिक कथा

प्राकृतिक व्यतिक्रम से ही रोग उत्पन्न होते हैं। तथा समानुपातन से उनका निदान भी हो जाता है। यह एक शाश्वत एवं स्वयं सिद्ध नियम है। यह केवल शास्त्र या पुराणों का ही कथन नहीं है। जब भी नैसर्गिक संचरण में भेद पैदा होगा, कोई न कोई अनपेक्षित या कृत्रिम घटना-दुर्घटना जन्म लेगी ही। इसी बात या तह को कोई बहुत पढ़कर समझता है। तथा कोई प्रकृति की गोद में बैठ निरंतर अनुभव के द्वारा संग्रहीत करता है।

ऊधमपुर (जम्मू) से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक स्थान है जिसे शिवखेरी के नाम से जाना जाता है। यहां पर भगवान शिव का एक बहुत पुराना स्थान है। यह बहुत ही दुर्गम स्थान पर है। इसमें जाना सबके बस की बात नहीं है। फिर भी यहां पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होती है। जम्मू से सीधे यहां के लिए बस सेवा है। चाहे जो भी हो, यह एक अति मनोरम स्थान है। 

शिवखेरी से लगभग सात किलोमीटर पहले मुख्य रास्ते से पश्चिमोत्तर दिशा में एक स्थान है देवजल। बिल्कुल संकरी चतुर्दिक सघन पहाड़ियों से घिरा चीड़ एवं देवदार के घने वृक्षों से ढका यह स्थान बड़ा ही डरावना दीख पड़ता है। वैसे भी यहां पर घूमने जाना वर्जित है। क्योकि यहां बड़े बड़े बाघ एवं भालू जैसे हिंसक जीव पाए जाते हैं।

इन पहाड़ियों के बीच में एक बिल्कुल खाली एवं साफ सुथरा लगभग पचासों एकड़ में फैला स्थान है। बिल्कुल सपाट एवं समतल स्थान है। यहां तक पहुंचने के लिए एक अति संकरी पगडंडी जो पहाड़ियों के बीच से होकर पेड़ो एवं घनी झाड़ियों से गुजराती है, उसी से आना होता है।

सुगंध से ही पता चलता है इस स्थान पर महात्मा जी आने वाले हैं,कौन है वह चमत्कारिक महात्मा... 
प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की दशमी एवं कृष्ण पक्ष की अष्टमी को एक महात्मा जी यहां आते हैं। कभी कभी नहीं भी आते हैं। मैंने कई बार कोशिश की, लोगों के साथ जाता था लेकिन निराश होकर लौटना पड़ता था। किन्तु एक बार दर्शन हो ही गए।

नाम मात्र के वस्त्र शरीर पर, रंग बिल्कुल काला, आंखे बड़ी-बड़ी बहुत ही चमकदार एवं तीव्र वेधन क्षमता वाली रोशनी से भरी हुई, बड़ी बड़ी दाढी मूंछें, लगभग सात फिट से भी ज्यादा लम्बाई, पूरे शरीर पर कोई बहुत ही खुशबूदार भस्म लपेटे हुए, बहुत ही भद्दी-मोटी शरीर की चमड़ी किन्तु चेहरे पर साहस, सफलता एवं खुशी का ओज।

एक सफेद चट्टान जो मैदान के एक किनारे पर एक बड़े चिनार जैसे बड़े चपटे पत्तों वाले पेड़ के नीचे था, उसी पर बैठ जाते थे। किसी से डोगरी भाषा में, किसी से पश्तों तथा किसी से हिंदी में बाते बड़ी आसानी से करते हैं।

एक चमड़े की झोली उनके कंधे पर लटकी रहती है। लोग कहते थे कि हर बार उनकी झोली बदल जाती है। मुझे लगता था कि वह किसी जानवर के ताजा चमड़े से बनी झोली थी। वह कहां से और किस रास्ते से आते हैं, किसी ने नहीं देखा है।

ऐसा सुनने में आया है कि उसी मैदान में किसी किनारे से एक सुरंग निकलती है जो जम्मू में बड़ीब्रह्मणा नामक जगह पर खुलती है। मान्यता है कि जाम्बवंत जी इसी सुरंग से आते जाते थे।

खैर मैंने सुरंग नहीं देखी, किन्तु उनके आने जाने को कोई नहीं देख पाता है। केवल सुगंध से ही पता लगता है कि अब महात्मा जी आने वाले हैं। वहां पर लाइन लगाने की जरूरत नहीं है। चाहे आप कहीं भी बैठे, वह जरूरतमंद को दूर से भी बुला लेते हैं। 

पूरे जम्मू में क्यों नहीं है सांस, दमा और हड्डी के रोगी.... 
लेकिन एक बात आज भी प्रत्यक्ष है कि उस सौ किलोमीटर की दूरी में कोई भी व्यक्ति दमा, टीबी, गठिया, संधिवात, कुष्ठ, आमवात या किसी अस्थि रोग से पीड़ित नहीं है। महात्मा बहुत ही अचूक औषधि वह प्रदान करते हैं। एक रोग के लिए एक दिन में वह मात्र तीन या चार रोगी को ही दवा देते हैं। अर्थात गठिया के चार रोगी, कुष्ठ के चार रोगी आदि।

मैंने पूछा भी था, किन्तु उन्होंने बड़ी सौम्यता से उत्तर दिया कि इतनी ही औषधि वह एकत्र ही कर पाते हैं। उनको यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि कौन दूर से आया है तथा कौन फिर दोबारा या तिबारा भी आ सकता है। इसीलिए लोग परस्पर झगड़ा भी नहीं करते हैं। क्योंकि चाहे कितना भी परस्पर वाद विवाद कर लो, उन्हें जिसको औषधि देनी होगी, उसे ही वह देंगे। चाहे कोई कुछ भी कर लें। 

पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला को क्यों नहीं मिला बाबा का आशीर्वाद...
लोग बताते हैं कि एक बार शेख अब्दुल्ला जो वहां के मुख्यमंत्री थे, अपने किसी रिश्तेदार को लेकर आए। उस दिन वह महात्मा आए ही नहीं। लगभग चार-पांच बार ऐसा हुआ, किन्तु वह महात्मा नहीं आए। 

लोगों को लगा कि शायद उन्हें किसी हिंसक जानवर ने मार डाला। सात महीने बाद वह फिर दिखाई दिए। लोग आने-जाने लगे। फिर शेख अब्दुल्ला पहुंचे। किन्तु वह उस दिन नहीं आए। ऐसा कई बार हुआ। अंत में लोगों ने महात्मा जी से इसका कारण पूछा। 

उन्होंने बताया कि यदि कोई लाव लस्कर के साथ उनके पास आएगा तो वह नहीं आएंगे। कुछ आतंकवादियों ने वहां अपना डेरा बनाना चाहा। किन्तु सभी बारी-बारी मरते रहे। इसीलिए डर के मारे उस पहाड़ी की तरफ आतंकवादी भी नहीं जाते हैं। अंत में शेख अब्दुल्ला की रिश्तेदार वह महिला अन्य लोगों के साथ पैदल चलकर वहां पहुंची तथा औषधि लेकर गई।

एक चमत्कार से बदल गई महिला द्वारा महात्माजी को दी गई भेंट....
उस महिला ने महात्माजी के उस बैठने वाले चट्टान को हटवा कर वहां पर ग्यारह कुंतल वजन के चांदी का बहुत ही नक्काशीदार आसन बनवा कर रखवाया। किन्तु महात्मा जी के बैठते ही वह काले मिट्टी में बदल गया।

उन्होंने लोगों से उसे हटाने को कहा। लोग हटाने लगे तो वह टूटकर रेत की तरह बिखर गया। फिर महात्माजी ने अकेले उतने बड़े भारी पत्थर को जिस पर वह बैठते थे, धकेल कर वही पर लाए जहां पर वह पहले बैठते थे और फिर उसी पर बैठने लगे।

संभवतः अभी भी वह आते हैं, लेकिन किस महीने आएंगे, यह ठीक पता नहीं है। मैंने उनसे इसका भी कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी औषधियां बहुत कम मिल रही है तथा लोग अब दुर्लभ औषधियों की काला बाजारी भी करने लगे हैं। उन्होंने यह बात अच्छी तरह समझ ली थी कि मैं कोई मरीज नहीं बल्कि उत्सुकतावश केवल जानकारी लेने के लिए गया हुआ था।

ऐसे कौन-सी जड़ी है जिससे हड्डी जुड़ जाती थी...
महात्माजी झोली में ढेर सारी जड़ी-बूटियां भर कर लाते थे। किन्तु उन्होंने बता रखा था कि उनके पास श्वसन तथा अस्थि तंत्र के अलावा अन्य किसी भी व्याधि की औषधि नहीं है। फिर भी लोग अंधश्रद्धा एवं विश्वास के कारण नई व्याधियों से ग्रसित होने पर भी जाते ही थे।

आपको संभवतः यह जानकर और आश्चर्य होगा कि जम्मू तथा जम्मू से सटे किसी भी शहर या नगर के किसी भी अस्पताल में श्वसन या हड्डी के रोग से संबधित कोई भी मरीज नहीं मिलेगा। मैंने तो बहुत खोजा। किन्तु कहीं कोई मरीज नहीं मिला। बस वही आदमी भूले भटके इन अस्पतालों में चला जाएगा जो इस महात्मा के बारे में नहीं जानता हो। या फिर उस बीहड़ में जाने से डरता हो। या फिर वातानुकूलित जगह को छोड़ना नहीं चाहता हो। 

महात्मा जी ने जो जडी-बूटियां कुछ मरीजों को दी थी, उन्हें मैंने देखा तो बहुत ज्यादा तो नहीं पहचान सका किन्तु ऐसा लगा कि भावार्थ रत्नाकर एवं शारंगधर संहिता में जो जड़ी-बूटियां बताई गई है, वे ही है। थोड़ा-बहुत अंतर दिखाई दे रहा था।

जैसे डिडबेहडा- कहा जाता है कि यदि घोड़े की भी टांग टूट गई हो, तथा एक दिन से ज्यादा का विलंब नहीं हुआ हो तो इसे हल्दी के साथ पीस कर लगा देने से वह हड्डी तो जुड़ ही जाती है। अगले दिन वह घोड़ा फिर दौड़ने के लिए पूरी तरह तैयार होता है। 

फिर दूसरा बघमकोय- सुश्रुत ने बघमकोय को रक्त रोग के लिए रामबाण बताया है। उन्होंने तो इसके बारे में यहां तक कह दिया है कि यदि बघमकोय से कुष्ठ रोग ठीक नहीं हुआ तो चाहे शुक्राचार्य या अश्विनीकुमार ही क्यों न चिकित्सा करें, वह ठीक नहीं हो सकता।

फिर तीसरा शीतलपाटी- बृहतसंहिता में कहा गया है कि जिस किसी कन्या को कुंडली में विषघात, विषकन्या या वैधव्य योग हो, या आर्द्रोपेत कणिकाओं जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान संभवतः अनुमान के सहारे स्यूडाफेड्रीलरी सेल्स कहता है, बेतरतीब अनियमित हो गई हो, या देहातों या ग्रामीण आंचल में कहते हैं कि किसी दुर्योग के कारण जब किसी लड़की की शादी नहीं हो पाती है तो इस झाड़ी के मूल, छिलके एवं पत्तियों के रस के विविध प्रयोग से अचूक सफलता मिलती है।

इसी शीतल पाटी वनस्पति से वर्तमान समय में 'साराभाई केमिकल्स' नाम की गुजरात स्थित दवा कंपनी अत्यंत महंगा कैप्सूल संभवतः उसका नाम 'ब्लेंटाडीन' है बनाती है। जो एक कैप्सूल लगभग सात हजार रुपए से भी ज्यादा का मिलता है। 

मैंने महात्माजी से यह प्रार्थना की कि यदि यह औषधि सरकार बनाए तो इस पर और ज्यादा शोध होकर ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए प्रयुक्त हो सकती है। बहुत ही सोच कर एवं गंभीर मुद्रा में उन्होंने उत्तर दिया कि यदि इसे आज सरकार जान जाए तो इन गरीबों का क्या होगा जो सरकारी या बड़े-बड़े चिकित्सालयों का भारी-भरकम खर्च न उठा सकते हो? मैं निरूत्तर हो गया।

क्यों कैमरे में कैद नहीं हो पाता था महात्माजी का फोटो...
आश्चर्य तब हुआ जब मैंने उनसे उनका फोटो खींचने का आग्रह किया। तो उन्होंने मंजूरी तो दे दी, किन्तु यह बता दिया कि शरीर पर लगे खुशबूदार भस्म पदार्थ के कारण उनका फोटो नहीं आ सकता। और बात भी सही थी, कोई फोटो नहीं आया। 

मैं अपनी नौकरी की मजबूरी के कारण फिर दोबारा न जा सका, या फिर इसलिए भी नहीं प्रयत्न किया कि बार-बार इतना पैसा क्यों एवं कहां से खर्च करूं? 

मैं ठहरा एक निश्चित वेतन पर काम करने वाला सरकारी नुमाइंदा। इसलिए फिर दोबारा उधर जाना नहीं हुआ। किन्तु इतना निश्चित है कि वह महात्मा कुछ विशेष प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के बहुत ही उत्कृष्ट जानकार थे। जैसे उस सुगंध की ऐसी कौन-सी विशेषता थी कि उनके शरीर से टकरा कर आने वाली किरणें कैमरे में नहीं आ पाती थीं?

मैंने उस स्थान का कुछ चित्र ले रखा है। किन्तु मेरे सिम कार्ड में मात्र कुछ एमबी यूसेज ही बचा हुआ है। इसलिए मैं इन्हें अपलोड नहीं कर पा रहा हूं।

मैं वर्ष 2003-2004 में जम्मू में पोस्टेड था। तो तीन चार बार उनके दर्शन हुए। मेरे साथ काम करने वाले कुछ एक लोगों को उनकी औषधि से अचूक लाभ भी हुआ। जो सैनिक चिकित्सालय में कई वर्षों से चिकित्सा करा रहे थे। किन्तु सेना की नौकरी में इतनी छुट्टी कहां मिलती है? 

इसलिए मैं फिर उसके बाद वहां नहीं जा सका। किन्तु फिर भी शिवखेरी के मेले में आज भी लोग कोने-कोने से जाते रहते हैं। तथा उस संकरी गुफा में बड़ी ही कठिनाई से प्रवेश कर आशुतोष भगवान भोलेनाथ का दर्शन कर उनका कृपा प्रसाद प्राप्त कर अधिभौतिक एवं अधिदैविक विपदाओं से त्राण पाते रहते हैं।

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Tuesday, 5 May 2015

जानिए माघ स्नान की पौराणिक कथा -


स्कंदपुराण के रेवाखंड में माघ स्नान की कथा के उल्लेख में आया है कि प्राचीन काल में नर्मदा तट पर शुभव्रत नामक ब्राह्मण निवास करते थे। वे सभी वेद शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता थे। किंतु उनका स्वभाव धन संग्रह करने का अधिक था।

उन्होंने धन तो बहुत एकत्रित किया। वृद्घावस्था के दौरान उन्हें अनेक रोगों ने घेर लिया। तब उन्हें ज्ञान हुआ कि मैंने पूरा जीवन धन कमाने में लगा दिया अब परलोक सुधारना चाहिए। वह परलोक सुधारने के लिए चिंतातुर हो गए।
अचानक उन्हें एक श्लोक याद आया जिसमें माघ मास के स्नान की विशेषता बताई गई थी। उन्होंने माघ स्नान का संकल्प लिया और 'माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।' इसी श्लोक के आधार पर नर्मदा में स्नान करने लगे। नौ दिनों तक प्रात: नर्मदा में जल स्नान किया और दसवें दिन स्नान के बाद उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।   
शुभव्रत ने जीवन भर कोई अच्छा कार्य नहीं किया था लेकिन माघ मास में स्नान करके पश्चाताप करने से उनका मन निर्मल हो गया। माघ मास के स्नान करने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई। 

पवित्र माघ मास का माहात्म्य -
भारतीय संवत्सर का ग्यारहवां चन्द्रमास और दसवां सौरमास माघ कहलाता है। इस महीने में मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा होने से इसका नाम माघ पड़ा। धार्मिक दृष्टिकोण से इस मास का बहुत अधिक महत्व है। इस मास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पापमुक्त हो स्वर्ग लोक में जाते हैं - 



'माघे निमग्नाः सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।'
पद्मपुराण में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि पूजा करने से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि माघ महीने में स्नान मात्र से होती है। इसलिए सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान करना चाहिए। 
'प्रीतये वासुदेवस्य सर्वपापानुत्तये। माघ स्नानं प्रकुर्वीत स्वर्गलाभाय मानवः॥'
माघ मास में पूर्णिमा को जो व्यक्ति ब्रह्मावैवर्तपुराण का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि माघ में ब्रह्मवैवर्तपुराण की कथा सुननी चाहिए यह संभव न हो सके तो माघ महात्म्य अवश्य सुनें। अतः इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवान माधव की पूजा अत्यंत फलदायी होती है। माघ मास की अमावास्या को प्रयागराज में स्नान से अनंत पुण्य प्राप्त होते हैं। वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाता है।

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Monday, 4 May 2015

अश्वपति ने दिया था पूर्णरूपी आत्मा का ब्रह्मोपदेश -

कैकय देश में अश्वपति नाम का राजा था। वह बड़ा सदाचारी, प्रजावत्सल और उच्च कोटि का ब्रह्मज्ञानी था। उसने वैश्वानर (सभी मनुष्यों में व्यापक) आत्मा की सफलतापूर्वक खोज की थी। स्वयं आत्म-दर्शन किया था और बड़े-बड़े वेदज्ञ पंडितों को भी आत्मतत्व की दीक्षा दी थी।

उस समय प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इंद्रद्युम्न, जन और बुडिल नाम के पांच महापंडित एकसाथ बैठकर विचार किया करते थे कि आत्मा क्या है, ब्रह्म क्या है?

यह सुनकर कि उद्दालक ऋषि वैश्वानर आत्मा के शोध में आजकल लगे हुए हैं, वे पांचों आत्मतत्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनके पास पहुंचे।

परंतु उद्दालक उनकी शंका का समाधान न कर सकें। उन्होंने सुन रखा था कि कैकय देश का राजा अश्वपति ही इस विषय का समाधान कर सकता है अत: वे पांचों पंडित और उद्दालक आत्मतत्व की खोज में कैकय देश पहुंचे।

राजा अश्वपति ने उनका यथोचित आतिथ्य किया। राजा ने उनसे कहा कि मेरे राज्य में न तो कोई चोर है, न कोई कृपण और न कोई मद्य ‍पीने वाला। सभी नित्य यज्ञ करते हैं। मेरे यहां कोई अविद्वान नहीं मिलेगा। प्रजाजनों में कोई व्यभिचारी नहीं है, फिर व्यभिचारिणी कहां से होगी?

उन पंडितों और उद्दालक को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और हर्ष भी कि वे निस्संदेह एक ऐसे रा‍जर्षि के पास पहुंचे हैं, जो उनको आत्मतत्व का सच्चा और पूरा ज्ञान करा सकता है।

अश्वपति ने एक-एक पंडित से अलग-अलग पूछा कि वे किसको आत्मा मानकर उसकी उपासना करते हैं।

उन्होंने जो उत्तर दिए, उससे मालूम हुआ कि प्राचीनशाल द्युलोक की उपासना करता था। नक्षत्रों और तारों से प्रकाशमान आकाश को वह आत्मा मानता था।

सत्ययज्ञ ने आदित्य अर्थात सूर्य को आत्मा मान लिया था और वह उसी का उपासक था।
इंद्रद्युम्न ने वायु को आत्मा माना और उसी की उपासना की थी।

जन ने अंतरिक्ष को आत्मा मान लिया था और उसी की उपासना में वह संलग्न था।
बुडिल जल को आत्मा मानता था।

और, उद्दालक ने पृथ्वी को आत्मा मान लिया था। वह केवल पृथ्‍वी का उपासक था।

अश्वपति ने उनसे कहा कि वे अलग-अलग, एक-एक अंश को आत्मा मान रहे हैं। वे संपूर्ण को नहीं जानते इसलिए उनकी साधना अधूरी है। उसने बताया कि द्युलोक, आदित्य, वायु, आकाश, अंतरिक्ष, जल और पृथ्वी को आत्मा मानकर वे धन-धान्य, रथ, बड़े-बड़े भवन और दूसरी सांसारिक समृद्धि पाकर उनको भोग सकते हैं, परंतु उस परम लाभ को वे इनकी उपासना से नहीं पा सकते जिसे पाकर फिर कुछ पाने के लिए शेष नहीं रहता। एक-एक तत्व और देवता की अलग-अलग उपासना वे भले ही करें, किंतु उनका संशय तब तक दूर नहीं होगा, जब तक वे वैश्वानर को, विश्वमानुष को अर्थात समष्टिरूप आत्मा को नहीं जानते, उसका साक्षात्कार नहीं करते और उसकी उपासना नहीं करते।

अश्वपति के उपदेश का सारांश यह है कि हमारा यह शरीर नर है और वैनाश्वर है समष्टि चैतन्य। व्यष्टि का समष्टि में लीन हो जाना, पिंड का ब्रह्मांड में तदाकार हो जाना ही वैश्वानर की सच्ची उपासना है। अपनी आत्मा को ही देखकर हमें वहां नहीं रुक जाना चाहिए।

पूरी तृप्ति तो हमारी तभी होगी, जब विश्वमात्र में व्याप्त नर की, वैश्वानर की खोज हम करेंगे और उसी के लिए यज्ञ करेंगे और परितृप्त भी उसी से होंगे। मतलब यह कि आत्मा के अपूर्ण रूप की उपासना न कर हम उसके पूर्ण रूप की उपासना करें। संपूर्ण जगत को तृप्त करने के लिए हम तृप्तकर्म करें।

उन पांच महापंडितों और उद्दालक की जिज्ञासा का पूरा समाधान हो गया। वे वैश्वानर के उपासक हो गए।

यह कथा छांदोग्य उपनिषद से ली गई है।


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जब यक्ष बन ब्रह्मा ने ली परीक्षा,पढ़ें रोचक पौराणिक कथा -

एक बार देवताओं और दानवों में घोर युद्ध छिड़ गया। अंत में जीत देवताओं की हुई। अग्नि, वायु और इंद्र अपने आपको दूसरे देवताओं से अधिक पराक्रमी और शक्तिशाली मानने लगे। उनको गर्व हो गया कि इस जीत के कारण वे ही हैं। सर्वसमर्थ ब्रह्म ने उनके इस गर्व को ताड़ लिया और उसने अपनी शक्ति को देवताओं के अंदर से खींच लिया।

उनके सामने अब ब्रह्म एक यक्ष के रूप में खड़ा था। देवताओं की समझ में न आया कि यह यक्ष कौन है। 

उन्होंने अग्नि से कहा- अग्निदेव! आप जाकर पता लगाइए कि यह कौन है?

अग्नि दौड़कर यक्ष के सामने पहुंचा। यक्ष के पूछने पर उसने अपना ‍परिचय दिया कि मैं अग्नि हूं।

तेरी क्या शक्ति है? तू क्या कर सकता है? यक्ष ने पूछा।
पृथ्वी पर जो कुछ भी है उसे जलाकर मैं भस्म कर सकता हूं।

अग्नि के सामने यक्ष ने एक तिनका रख दिया और कहा- अच्छा तो इसे जला।

अग्नि ने अपनी सारी शक्ति लगा दी उसे जलाने में, पर उसे वह जला नहीं सका और वह अपना-सा मुंह लिए लौट आया। यक्ष का पता लगाना उसके लिए संभव न हुआ।

तब देवताओं ने वायु से कहा- वायुदेव! आप पता लगाकर आइए कि यह यक्ष कौन है, वायु वहां पहुंचा।
तू कौन है? यक्ष ने पूछा।
मैं वायु हूं।
तू क्या कर सकता है?

मैं चाहे जिस वस्तु को उड़ाकर ले जा सकता हूं -

बड़े-बड़े पहाड़ों को भी।
अच्‍छा, तो इस तिनके को तो उड़ा।
वायु ने अपना सारा बल लगा दिया, पर वह तिनका तनिक भी नहीं हिला। वायु भी निराश लौट आया बिना जाने कि वह यक्ष कौन है।

अब इंद्र की बारी थी। देवताओं ने उसे भेजा इस विश्वास से कि इंद्रदेव अवश्य ही यक्ष का पता लगा लेंगे। इंद्र वहां पहुंचा तो यक्ष अंतर्ध्यान हो गया।

इंद्र अं‍तरिक्ष में यक्ष को खोजने लगा, पर वह कहीं ‍नहीं मिला। खोज में उसे एक परम सुंदरी स्त्री दिखाई दी। ऐसी शुभ्र जैसे हिमलता हो। उसने नाम बतलाया 'उमा'। उमा अर्थात बुद्धि।


इंद्र ने उससे पूछा- कौन था यह यक्ष?
यह यक्ष ब्रह्म था। तुम देवतागणों की शक्ति वास्तव में ब्रह्म की ही शक्ति है, तुम्हारी अपनी नहीं।
देवताओं की आंखें खुल गईं। उनका गर्व चूर-चूर हो गया। बुद्धि ने उनको बताया कि सारा बल और सामर्थ्य तो वास्तव में ब्रह्म का ही है।

अग्नि, वायु और इंद्र नि:संदेह यह तीनों देव-शक्तियां हैं, पर इनको भी शक्ति प्रदान करने वाला तो ब्रह्म ही है। यह इस कथा का निष्कर्ष है।


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वृंदा कैसे बनी तुलसी, पढ़ें रोचक पौराणिक कथा -


पौराणिक काल में एक थी लड़की। नाम था वृंदा। राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था। वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की परम भक्त थी। बड़े ही प्रेम से भगवान की पूजा किया करती थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी।

एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा -स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं आप जब तक युद्ध में रहेगें में पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिए अनुष्ठान करुंगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते मैं अपना संकल्प नही छोडूगीं।जलंधर तो युद्ध में चले गए और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई। उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गए। 

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि-वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं। 

भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पहुंच गए जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा,वे तुरंत पूजा में  से उठ गई और उनके चरण छू लिए। जैसे ही उनका संकल्प टूटा,युद्ध में देवताओं  ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूछा - आप कौन हैं जिसका स्पर्श मैंने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गए पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गए। सभी देवता हाहाकार करने लगे। लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई। 

उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। 

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मूर्ती पूजा का रहस्य ,पढ़ें रोचक पौराणिक कथा -


कोई कहे की की हिन्दू मूर्ती पूजा क्यों करते हैं तो उन्हें बता दें मूर्ती पूजा का रहस्य :-

स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने
अपने भवन में बुलाया और बोला,

“तुम हिन्दू लोग मूर्ती की पूजा करते हो!
मिट्टी, पीतल, पत्थर की मूर्ती का.!

पर मैं ये सब नही मानता।
ये तो केवल एक पदार्थ है।”

उस राजा के सिंहासन के पीछे
किसी आदमी की तस्वीर लगी थी।

विवेकानंद जी कि नजर उस
तस्वीर पर पड़ी।

विवेकानंद जी ने राजा से पूछा,
“राजा जी, ये तस्वीर किसकी है?”

राजा बोला, “मेरे पिताजी की।”

स्वामी जी बोले, “उस तस्वीर को अपने
हाथ में लीजिये।”

राज तस्वीर को हाथ मे ले लेता है।

स्वामी जी राजा से : “अब आप उस
तस्वीर पर थूकिए!”

राजा : “ये आप क्या बोल रहे हैं
स्वामी जी.?

“स्वामी जी : “मैंने कहा उस
तस्वीर पर थूकिए..!”

राजा (क्रोध से) : “स्वामी जी, आप होश मे
तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।”

स्वामी जी बोले, “क्यों?

ये तस्वीर तो केवल
एक कागज का टुकड़ा है,
और जिस पर कूछ रंग लगा है।

इसमे ना तो जान है,

ना आवाज,

ना तो ये सुन सकता है,

और ना ही कूछ बोल सकता है।”

और स्वामी जी बोलते गए,

“इसमें ना ही हड्डी है और ना प्राण।

फिर भी आप इस पर कभी थूक
नही सकते।

क्योंकि आप इसमे अपने
पिता का स्वरूप देखते हो।

और आप इस तस्वीर का अनादर
करना अपने पिता का अनादर करना
ही समझते हो।”

थोड़े मौन के बाद स्वामी जी आगे कहाँ,
“वैसे ही, हम हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी,
या धातु की पूजा भगवान का स्वरूप मान
कर करते हैं।

भगवान तो कण-कण मे है, पर
एक आधार मानने के लिए और
मन को एकाग्र करने के
लिए हम मूर्ती पूजा करते हैं।”

स्वामी जी की बात सुनकर राजा ने
स्वामी जी के चरणों में गिर कर
क्षमा माँगी।

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