Sunday, 10 May 2015

महान सम्राट अशोक, जानिए कितने हैं सम्राट अशोक -

अशोक महान पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य (राजा प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय)। पिता का नाम बिंदुसार। दादा का नाम चंद्रगुप्त मौर्य। माता का नाम सुभद्रांगी। पत्नियों का नाम देवी (वेदिस-महादेवी शाक्यकुमारी), कारुवाकी (द्वितीय देवी तीवलमाता), असंधिमित्रा (अग्रमहिषी), पद्मावती और तिष्यरक्षित। पुत्रों का नाम- देवी से पुत्र महेन्द्र, पुत्री संघमित्रा और पुत्री चारुमती, कारुवाकी से पुत्र तीवर, पद्मावती से पुत्र कुणाल (धर्मविवर्धन) और भी कई पुत्रों का उल्लेख है। धर्म- हिन्दू और बौद्ध। राजधानी पाटलीपुत्र।

सम्राट अशोक का नाम संसार के महानतम व्यक्तियों में गिना जाता है। ईरान से लेकर बर्मा तक अशोक का साम्राज्य था। अंत में कलिंग के युद्ध ने अशोक को धर्म की ओर मोड़ दिया। अशोक ने जहां-जहां भी अपना साम्राज्य स्थापित किया, वहां-वहां अशोक स्तंभ बनवाए। उनके हजारों स्तंभों को मध्यकाल के मुस्लिमों ने ध्वस्त कर दिया।

अशोक के समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर, कर्नाटक तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफगानिस्तान तक पहुंच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। 

अशोक महान ने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। बिंदुसार की 16 पटरानियों और 101 पुत्रों का उल्लेख है। उनमें से सुसीम अशोक का सबसे बड़ा भाई था। तिष्य अशोक का सहोदर भाई और सबसे छोटा था। भाइयों के साथ गृहयुद्ध के बाद अशोक को राजगद्दी मिली।

कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा विजित देश की जनता के कष्ट ने अशोक की अंतरात्मा को झकझोर दिया। सबसे अंत में अशोक ने कलिंगवासियों पर आक्रमण किया और उन्हें पूरी तरह कुचलकर रख दिया। मौर्य सम्राट के शब्दों में, 'इस लड़ाई के कारण 1,50,000 आदमी विस्थापित हो गए, 1,00,000 व्यक्ति मारे गए और इससे कई गुना नष्ट हो गए...'। युद्ध की विनाशलीला ने सम्राट को शोकाकुल बना दिया और वह प्रायश्चित करने के प्रयत्न में बौद्ध विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ।

इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने पूर्वजों की तरह अशोक भी वैदिक धर्म का अनुयायी था। कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार अशोक के इष्टदेव शिव थे, लेकिन अशोक युद्ध के बाद अब शांति और मोक्ष चाहते थे और उस काल में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था।

सभी बौद्ध ग्रंथ अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हैं। अशोक के बौद्ध होने के सबल प्रमाण उसके अभिलेख हैं। राज्याभिषेक से संबद्ध लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को 'बुद्धशाक्य' कहा है। 

भाब्रु लघु शिलालेख में अशोक त्रिरत्न- बुद्ध, धम्म और संघ में विश्वास करने के लिए कहता है और भिक्षु तथा भिक्षुणियों से कुछ बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन तथा श्रवण करने के लिए कहता है। लघु शिलालेख से यह भी पता चलता है कि राज्याभिषेक के 10वें वर्ष में अशोक ने बोधगया की यात्रा की, 12वें वर्ष वह निगालि सागर गया और कोनगमन बुद्ध के स्तूप के आकार को दुगना किया। महावंश तथा दीपवंश के अनुसार उसने तृतीय बौद्ध संगीति (सभा) बुलाई और मोग्गलिपुत्त तिस्स की सहायता से संघ में अनुशासन और एकता लाने का सफल प्रयास किया।

पहला अशोक : कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार कश्मीर के राजवंशों की लिस्ट में 48वें राजा का नाम अशोक था, जो कि कनिष्क से तीन पीढ़ी पहले था। वह कश्मीर के गोनंद राजवंश का राजा था। इस राजा को धर्माशोक भी कहते थे।

दूसरा अशोक : हिन्दू पुराणों के अनुसार मौर्य वंश का तीसरा राजा अशोकवर्धन था, जो चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र और बिंदुसार का पुत्र था। इसी अशोक को महान सम्राट अशोक कहा गया था और इसी ने अशोक स्तंभ बनवाए और इसी ने कलिंग का युद्ध किया था। कलिंग के युद्ध के बाद यही अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था।

तीसरा अशोक : गुप्त वंश के दूसरे राजा समुद्रगुप्त का उपनाम अशोकादित्य था। समुद्रगुप्त को अनेक स्थानों पर अशोक ही कहा गया जिसके चलते भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। समुद्रगुप्त बड़ा ही साहसी और बुद्धिमान राजा था। उसने संपूर्ण भारतवर्ष में बड़े व्यापक स्तर पर विजयी अभियान चलाए थे।

चौथा अशोक : पुराणों में शिशुनाग वंश के दूसरे राजा का नाम भी अशोक था। वह शिशुनाग का पुत्र था। उसका काला रंग होने के कारण उसे 'काकवर्णा' कहते थे, हालांकि उसे कालाशोक नाम से भी पुकारा जाता था।

बौद्ध ग्रंथों में यद्यपि महान सम्राट अशोक के संबंध में बड़े विस्तार से उल्लेख मिलता है, लेकिन उनके वर्णण भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। माना जाता है कि लेखकों ने अशोकादित्य (समुद्रगुप्त) और गोनंदी अशोक (कश्मीर का राजा) दोनों को मिलाकर एक चक्रवर्ती अशोक की कल्पना कर ली है। 

इस स्थिति में यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि बौद्ध धर्म का प्रचारक देवानांप्रिय अशोक कौन था। सम्राट अशोक को देवानांप्रिय भी कहा जाता था इसीलिए ज्यातातर विद्वानों ने मान लिया कि सम्राट अशोक का काल (269-232) ईस्वी पूर्व गद्दी पर बैठा था, जबकि यह गलत है।

अशोक सीरिया के राजा 'एण्टियोकस द्वितीय' और कुछ अन्य यवन राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख 'शिलालेख संख्या 8' में है। इससे विदित होता है कि अशोक ने ईसा पूर्व 3री शताब्दी के उत्तरार्ध में राज्य किया, किंतु उसके राज्याभिषेक की सही तारीख़ का पता नहीं चलता है। अशोक ने 40 वर्ष राज्य किया इसलिए राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा। 

चीनी विवरण के आधार पर अशोक का काल 850 ईसा पूर्व, सीलोनी विवरण के आधार पर 315 ईसा पूर्व और राजतरंगिणी के अनुसार 1260 ईसा पूर्व।

पौराणिक कालगणना के अनुसार अशोक के राज्य के लिए निकाले गए 1472 से 1436 ईसा पूर्व के काल में और राजतरंगिणी के आधार पर धर्माशोक के लिए निकले राज्यकाल 1448 से 1400 ईसा पूर्व में कुछ-कुछ समानता है जबकि भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले इतिहासकारों द्वारा निकाले गए 265 ईसा पूर्व के काल से कोई समानता ही नहीं है।

उक्त के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान इतिहासकारों द्वारा अशोक के संबंध में निर्धारित काल निर्णय बहुत ही उलझा और अपुष्ट है जबकि भारत पौराणिक आधार पर कालगणना करने वालों और इतिहासकारों के बीच लगभग 1200 वर्ष का अंतर आ जाता है।

चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक और कनिष्क की जोन्स आदि पाश्‍चात्य विद्वानों द्वारा निर्धारित तिथियों के संदर्भ में एबी त्यागराज अय्यर की 'इंडियन आर्किटेक्चर' का निम्नलिखित उद्धरण भी ध्यान देने योग्य है- 

'एथेंस में कुछ समय पूर्व एक समाधि मिली थी, उस पर लिखा था कि- 'यहां बौधगया के एक श्रवणाचार्य लेटे हुए हैं। एक शाक्य मुनि को उनके यूनानी शिष्य द्वारा ग्रीक देश ले जाया गया था। समाधि में स्थित शाक्य मुनि की मृत्यु 1000 ईसा पूर्व अंकित है। यदि शाक्य साधु को 1000 ईसा पूर्व के आसपास यूनान ले जाया गया था तो कनिष्क की तिथि कम से कम 1100 ईसा पूर्व और अशोक की 1250 ईसा पूर्व और चंद्रगुप्त मौर्य की 1300 ईसा पूर्व होनी चाहिए और इस मान से भगवान बुद्ध उनके भी पूर्व हुए थे। यदि यह मान लिया जाए तो संपूर्ण इतिहास ही बदल जाएगा। यूनानी साहित्य का सेड्रोकोट्टस चंद्रगुप्त मौर्य सेल्यूकस निकेटर का समकालीन था जिसने 303 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण किया था, एकदम निराधार और अनर्गल है।' (दि प्लाट इन इंडियन क्रोनोलॉजी पृ. 9)

अंग्रेज काल में नए सिरे से लिखे गए भारतीय इतिहास के कारण ही यह भ्रम की स्थिति उत्पन्न हई है कि भारतीय इतिहास में ठीक-ठीक तिथि निर्धारण नहीं है। भारत में अब तक जो भी सरकार सत्ता में रही उसने भी इसकी कभी चिंता नहीं ‍की कि भारत के इतिहास को खोजा जाए। ज्यादातर भारतीय इतिहासकारों ने विदेशी इतिहासकारों का अनुसरण ही किया है।


दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे 

Saturday, 9 May 2015

भारत की 15 रहस्यमयी गुफाओं का रहस्य जानिए -



अभगच्छत राजेन्द्र देविकां विश्रुताम्।
प्रसूर्तित्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ॥- महाभारत

अर्थात् - सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखंड अर्थात इस ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई।

प्रारंभिक मानव गुफा में रहता था? उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिकों ने दुनिया की सबसे प्राचीन पहाड़ी अरावली और सतपुड़ा की पहाड़ियों को माना है। यूनान के लोगों की धारणा थी कि उनके देवता गुफाओं में ही रहते थे। इसी प्रकार रोम के लोगों का मानना था कि गुफाओं में परियां तथा जादू-टोना करने वाले लोग रहते हैं। फारस के लोग मानते थे कि गुफाओं में देवताओं का वास होता है। आज का विज्ञान कहता है कि गुफाओं में एलियंस रहते थे। गुफाओं का इतिहास सदियों पुराना है। पाषाण युग में मानव गुफाओं में रहता था।

आमतौर पर पहाड़ों को खोदकर बनाई गई जगह को गुफा कहते हैं, लेकिन गुफाएं केवल पहाड़ों पर ही निर्मित नहीं होती हैं यह जमीन के भीतर भी बनाई जातीं और प्राकृतिक रूप से भी बनती हैं। प्राकृतिक रूप से जमीन के नीचे बहने वाली पानी की धारा से बनती हैं। ज्वालामुखी की वजह से भी गुफाओं का निर्माण होता है। दुनिया में अनेक छोटी-बड़ी गुफाएं हैं, जो किसी अजूबे से कम नहीं हैं।

अफगानिस्तान के बामियान से भीमबैठका तक और अमरनाथ से महाबलीपुरम तक भारत में हजारों गुफाएं हैं। हिमालय में तो अनगिनत प्राकृतिक गुफाएं हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वहां साधु-संत ध्यान और तपस्या करते हैं। आओ जानते हैं भारत की 15 रहस्यमयी गुफाओं के बारे में, जो अब रखरखाव के अभाव में अपने अस्तित्व संकट से जूझ रही हैं। भारत सरकार को चाहिए कि वह इस पर ध्यान दें।

भीमबैठका : भीम यहां बैठते थे, विश्राम करते थे इसलिए इन गुफाओं को भीमबैठका कहा जाता है। भीमबैठका रातापानी अभयारण्य में स्थित है। यह भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में है। यहां से आगे सतपुडा की पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं। भीमबेटका (भीमबैठका) भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के रायसेन जिले में स्थित एक पुरापाषाणिक आवासीय पुरास्थल है। यह आदिमानव द्वारा बनाए गए शैलचित्रों और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है। इन चित्रों को पुरापाषाण काल से मध्यपाषाण काल के समय का माना जाता है।

नर्मदा घाटी को विश्व की सबसे प्राचीन घाटियों में गिना जाता है। यहां भीमबैठका, भेड़ाघाट, नेमावर, हरदा, ओंकारेश्वर, महेश्वर, होशंगाबाद, बावनगजा, अंगारेश्वर, शूलपाणी आदि नर्मदा तट के प्राचीन स्थान हैं। नर्मदा घाटी में डायनासोर के अंडे भी पाए गए हैं और यहां कई विशालकाय प्रजातियों के कंकाल भी मिले हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में तो कई गुफाएं हैं। एक गुफा में 10 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र मिले हैं।

यहां मिले शैलचित्रों में स्पष्ट रूप से एक उड़नतश्तरी बनी हुई है। साथ ही इस तश्तरी से निकलने वाले एलियंस का चित्र भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो आम मानव को एक अजीब छड़ी द्वारा निर्देश दे रहा है। इस एलियंस ने अपने सिर पर हेलमेट जैसा भी कुछ पहन रखा है जिस पर कुछ एंटीना लगे हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि 10 हजार वर्ष पूर्व बनाए गए ये चित्र स्पष्ट करते हैं कि यहां एलियन आए थे, जो तकनीकी मामले में हमसे कम से कम 10 हजार वर्ष आगे हैं ही।

भीमबेटका क्षेत्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल ने अगस्त 1990 में राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित किया। इसके बाद जुलाई 2003 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। ये भारत में मानव जीवन के प्राचीनतम चिह्न हैं। इनकी खोज वर्ष 1957-1958 में डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा की गई थी।

यहां 750 शैलाश्रय हैं जिनमें 500 शैलाश्रय चित्रों द्वारा सज्जित हैं। पूर्व पाषाणकाल से मध्य ऐतिहासिक काल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।

इन चित्रों में शिकार, नाच-गाना, घोड़े व हाथी की सवारी, लड़ते हुए जानवर, श्रृंगार, मुखौटे और घरेलू जीवन का बड़ा ही शानदार चित्रण किया गया है। इसके अलावा वन में रहने वाले बाघ, शेर से लेकर जंगली सूअर, भैंसा, हाथी, हिरण, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, छिपकली व बिच्छू तक चित्रित हैं। चित्रों में प्रयोग किए गए खनिज रंगों में मुख्य रूप से गेंरुआ, लाल और सफेद हैं और कहीं-कहीं पीला और हरा रंग भी प्रयोग हुआ है।

कहीं-कहीं तो चित्र बहुत सघन हैं जिनसे पता चलता है कि ये अलग-अलग समय में अलग-अलग लोगों ने बनाए होंगे। इनके काल की गणना कार्बन डेटिंग सिस्टम से की गई है जिनमें अलग-अलग स्थानों पर पूर्व पाषाणकाल से लेकर मध्यकाल तक की चित्रकारी मिलती है। इसकी कार्बन डेटिंग से पता चला है कि इनमें से कुछ चित्र तो लगभग 25 हजार वर्ष पुराने हैं।

ये चित्र गुफाओं की दीवारों व छतों पर बनाए गए हैं जिससे मौसम का प्रभाव कम से कम हो। अधिकतर चित्र सफेद व लाल रंग से ही बनाए गए हैं लेकिन मध्यकाल के कुछ चित्र हरे व पीले रंगों से भी निर्मित हैं। प्रयुक्त रंगों में कुछ पदार्थों जैसे मैंगनीज, हैमेटाइट, नरम लाल पत्थर व लकड़ी के कोयले का मिश्रण होता था। इसमें जानवरों की चर्बी व पत्तियों का अर्क भी मिला दिया जाता था। आज भी ये रंग वैसे के वैसे ही हैं।

अजंता-एलोरा की गुफाएं : यह स्थान महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित हैं। इसमें अजंता में 29 बौद्ध गुफाएं और कई हिन्दू मंदिर मौजूद हैं। ये गुफाएं अपनी चित्रकारी, गुफाएं और अद्भुत मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हैं। ये गुफाएं कई हजार वर्ष पुरानी हैं, लेकिन बौद्ध गुफाएं होने के कारण इनको 2 सदी ईसा पूर्व से 7 शताब्दी ईसा तक का माना जाता रहा है, लेकिन अब नए शोध ने यह धारणा बदल दी है।

एलोरा की गुफाएं सबसे प्राचीन मानी जाती हैं। इसमें पत्थर को काटकर बनाई गईं 34 गुफाएं हैं और एक रहस्यमयी प्राचीन हिन्दू मंदिर है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई मानव नहीं बना सकता और इसे आज की आधुनिक तकनीक से भी नहीं बनाया जा सकता। इस विशालकाय अद्भुत मंदिर को सभी देखने आते हैं। इसका नाम कैलाश मंदिर है। आर्कियोलॉजिस्टों के अनुसार इसे कम से कम 4 हजार वर्ष पूर्व बनाया गया था। 40 लाख टन की चट्टानों से बनाए गए इस मंदिर को किस तकनीक से बनाया गया होगा? यह आज की आधुनिक इंजीनियरिंग के बस की बात नहीं है।

माना जाता है कि एलोरा की गुफाओं के अंदर नीचे एक सीक्रेट शहर है। आर्कियोलॉजिकल और जियोलॉजिस्ट की रिसर्च से यह पता चला कि ये कोई सामान्य गुफाएं नहीं हैं। इन गुफाओं को कोई आम इंसान या आज की आधुनिक तकनीक नहीं बना सकती। यहां एक ऐसी सुरंग है, जो इसे अंडरग्राउंड शहर में ले जाती है।

एलीफेंटा की गुफा : मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित एक स्थल है, जो एलीफेंटा नाम से विश्वविख्यात है। यहां पहाड़ को काटकर बनाई गई इन सुंदर और रहस्यमय गुफाओं को किसने बनाया होगा? माना जाता है कि इसे 7वीं व 8वीं शताब्दी में राष्‍ट्रकूट राजाओं द्वारा खोजा गया था। 'खोजा गया था' का मतलब यह कि यह उन्होंने बनाया नहीं था। कई हजार वर्षों पुरानी इन गुफाओं की संख्या 7 हैं जिनमें से सबसे महत्‍वपूर्ण है महेश मूर्ति गुफा। एलीफेंटा को घारापुरी के पुराने नाम से जाना जाता है, जो कोंकणी मौर्य की द्वीप राजधानी थी।

इसका ऐतिहासिक नाम घारापुरी है। यह नाम मूल नाम अग्रहारपुरी से निकला हुआ है। एलीफेंटा नाम पुर्तगालियों ने दिया है। यहां हिन्दू धर्म के अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। यहां भगवान शंकर की 9 बड़ी-बड़ी मूर्तियां हैं, जो शंकरजी के विभिन्न रूपों तथा क्रियाओं को दिखाती हैं। इनमें शिव की त्रिमूर्ति प्रतिमा सबसे आकर्षक है। यह पाषाण-शिल्पित मंदिर समूह लगभग 6,000 वर्गफीट के क्षेत्र में फैला है।

गुफा के मुख्‍य हिस्‍से में पोर्टिको के अलावा 3 ओर से खुले सिरे हैं और इसके पिछली ओर 27 मीटर का चौकोर स्‍थान है और इसे 6 खंभों की कतार से सहारा दिया जाता है। 'द्वारपाल' की विशाल मूर्तियां अत्‍यंत प्रभावशाली हैं। इस गुफा में शिल्‍पकला के कक्षों में अर्धनारीश्‍वर, कल्‍याण सुंदर शिव, रावण द्वारा कैलाश पर्वत को ले जाने, अंधकारी मूर्ति और नटराज शिव की उल्‍लेखनीय छवियां दिखाई गई हैं। इस गुफा संकुल को यूनेस्‍को द्वारा विश्‍व विरासत का दर्जा दिया गया है।

बाघ की गुफाएं : बाघ की गुफाएं प्राचीन भारत के स्वर्णिम युग की अद्वितीय देन हैं। मध्यप्रदेश के प्राचीन स्थल धार जिले में स्थित बाघ की गुफाओं को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। धार, इंदौर शहर से 60 किलोमीटर की दूरी पर ही है। बाघिनी नामक छोटी-सी नदी के बाएं तट पर और विंध्य पर्वत के दक्षिण ढलान पर स्थित इन गुफाओं का इतिहास भी रहस्यों से भरा है।

बाघ-कुक्षी मार्ग से थोड़ा हटकर बाघ की गुफाएं बाघ ग्राम से 5 मील दूर हैं। यह स्थल उस विशाल प्राचीन मार्ग पर स्थित है, जो उत्तर से अजंता होकर सुदूर दक्षिण तक जाता है।

इसमें कुल 9 गुफाएं हैं जिनमें से 1, 7, 8 और 9वीं गुफा नष्टप्राय है तथा गुफा संख्या 2 'पाण्डव गुफा' के नाम से प्रचलित है जबकि तीसरी गुफा 'हाथीखाना' और चौथी 'रंगमहल' के नाम से जानी जाती है। इन गुफा का निर्माण संभवतः 5वी-6वीं शताब्दी ई. में हुआ होगा।

माना जाता है कि इन गुफाओं का निर्माण भगवान बुद्ध की प्रतिदिन होने वाली दिव्यवार्ता को प्रतिपादित करने हेतु निर्मित और चित्रित किया गया था। बाघ की गुफा संख्या 1 से 9 तक में कक्ष, स्तंभ, लंबे बरामदे, कोठरियां, शैलकृत स्तूप, बुद्ध प्रतिमा, बोधिसत्व, अवलोकितेंर मैत्रेय, नदी, देवियों आदि का अंकन है। बाघ की गुफा संख्या 2, 3, 4, 5, एवं 7 में भित्तिचित्र हैं, गुफा में 6 दृश्यों का अंकन है। बाघ गुफाओं के चित्रों की शैली अजंता के समान है तथा ये अजंता के समकालीन हैं।

महाकाली और कन्हेरी की गुफाएं : मुंबई में कई गुफाएं हैं। उनमें से एलीफेंटा, महाकाली और कन्हेरी की गुफाएं प्रसि‍द्ध हैं। महाकाली की गुफा मुंबई के अंधेरी वेस्ट में बौद्धमठ के पास है, जबकि कन्हेरी की गुफा मुंबई के पश्चिम में बसे बोरीवली क्षेत्र में स्थित है।

महाकाली की गुफाएं 19 गुफाओं को मिलाकर बनाई गई हैं। माना जाता है कि लगभग 1 शताब्दी से 6वीं के शताब्दी के मध्य इसका निर्माण हुआ था। महाकाली गुफा के बीच में एक शिव मंदिर है। यहां का शिवलिंग 8 फिट ऊंचा है। महाकाली गुफा में 9वीं गुफा सबसे बड़ी है, इस गुफा में बुद्ध की पौराणिक कथा और उनके 7 चित्र बने हुए हैं।

कन्हेरी की गुफा की लंबाई 86 फुट, चौड़ाई 40 फुट और ऊंचाई 50 फुट है। इसमें 34 स्तंभ लगाए गए हैं। कन्हेरी की गणना पश्चिमी भारत के प्रधान बौद्ध दरीमंदिरों में की जाती है।

बोरा गुफाएं : दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश में ऐसी कई गुफाएं हैं। इनमें बेलम व बोरा गुफाएं प्रमुख हैं। बोरा गुफाएं विशाखापट्टनम से 90 किलोमीटर की दूरी पर हैं। 10 लाख साल पुरानी ये गुफाएं समुद्र तल से 1400 फुट ऊंचाई पर स्थित हैं। भू-वैज्ञानिकों के शोध कहते हैं कि लाइमस्टोन की ये स्टैलक्टाइट व स्टैलग्माइट गुफाएं गोस्थनी नदी के प्रवाह का परिणाम हैं।

गुफाएं अंदर से काफी विराट हैं। उनके भीतर घूमना एक अद्भुत अनुभव है। अंदर घुसकर वह एक अलग ही दुनिया नजर आती है। कहीं आप रेंगते हुए मानो किसी सुरंग में घुस रहे होते हैं तो कहीं अचानक आप विशालकाय बीसियों फुट ऊंचे हॉल में आ खड़े होते हैं।

देश की प्रमुख गुफाओं में से एक है बोरा की गुफाएं। बोरा गुफाएं छत्तीसगढ़ में कोटमसर गुफाओं जैसी गर्म और दमघोंटू नहीं हैं। इसकी वजह इनकी भीतर से विशालता भी है। विशाखापट्टनम में रुककर भी दिन में गुफाएं देखी जा सकती हैं।

बेलम गुफाएं : आंध्र में ही कुरनूल से 106 किलोमीटर दूर बेलम गुफाएं स्थित हैं। मेघालय की गुफाओं के बाद ये भारतीय उपमहाद्वीप की दूसरी सबसे बड़ी प्राकृतिक गुफाएं हैं। इन्हें मूल रूप से तो 1854 में एचबी फुटे ने खोजा था लेकिन दुनिया के सामने 1982 में यूरोपीय गुफा विज्ञानियों की एक टीम ने इन्हें मौजूदा स्वरूप में पेश किया।

पहाड़ियों में स्थित बोरा गुफाओं के विपरीत बेलम गुफाएं एक बड़े से सपाट खेत के नीचे स्थित हैं। जमीन से गुफाओं तक 3 कुएं जैसे छेद हैं। इन्हीं में से बीच का छेद गुफा के प्रवेश द्वार के रूप में इस्तेमाल होता है। लगभग 20 मीटर तक सीधे नीचे उतरने के बाद गुफा जमीन के नीचे फैल जाती हैं। इनकी लंबाई 3,229 मीटर है।

कुटुमसर की गुफाएं : कुटुमसर की गुफाओं में रहते थे आदि मानव। एक अध्ययन से पता चला है कि करोड़ों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल में बस्तर की कुटुमसर की गुफाओं में मनुष्य रहा करते थे। फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी अहमदाबाद, इंस्टीट्यूट ऑफ पेलको बॉटनी लखनऊ तथा भूगर्भ अध्ययन शाला लखनऊ ने यह जानकारी दी है।

विश्वप्रसिद्ध बस्तर की कुटुमसर की गुफाएं कई रहस्यों को अभी भी अपने में समेटे हुए है जिनका भूगर्भ शास्त्रियों द्वारा लगातार अध्ययन किया जा रहा है। भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि करोड़ों वर्ष पूर्व क्षेत्र में कुटुमसर की गुफाऐं स्थित हैं वह क्षेत्र पूरा पानी में डूबा हुआ था। गुफाओं का निर्माण प्राकृतिक परिवर्तनों साथ साथ पानी के बहाव के कारण हुआ।

कुटुमसर की गुफाएं जमीन से 55 फुट नीचे हैं। इनकी लंबाई 330 मीटर है। इस गुफा के भीतर कई पूर्ण विकसित कक्ष हैं जो 20 से 70 मीटर तक चौड़े हैं। फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के शोधकर्त्ताओं ने इन्हीं कक्षों के अध्ययन के बाद निष्कर्ष पर पहुंचे है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यहां के आस पास के लोग इन गुफाओं में रहा करते थे। संभवत: यह प्रागैतिहासिक काल था।

चूना पत्थर से बनी कुटुमसर की गुफाओं के आंतरिक और बाह्य रचना के अध्ययन के उपरांत भूगर्भशास्त्री कई निष्कर्षों पर पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए चूना पत्थर के रिसाव, कार्बनडाईक्साइड तथा पानी की रासायनिक क्रिया से सतह से लेकर छत तक अद्भूत प्राकृतिक संरचनाएँ गुफा के अंदर बन चुकी हैं। उल्लेखनीय है कि रक्षामंत्रालय की एक उच्चस्तरीय समिति ने विश्वप्रसिद्ध इस गुफा की झाँकियों को 26 जनवरी के अवसर पर राजपथ पर प्रस्तुत करने की अनुमति भी प्रदान की।

उंदावली, विजयवाड़ा की गुफा : विजयवाड़ा आंध्र प्रदेश प्रान्त का एक शहर है।  विजयवाड़ा आंध्र प्रदेश के पूर्व-मध्य में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। दो हज़ार वर्ष पुराना यह शहर बैजवाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम देवी कनकदुर्गा के नाम पर है, जिन्हें स्थानीय लोग विजया कहते हैं। यहाँ की गुफाओं में उंद्रावल्ली की प्रमुख गुफा है, जो सातवीं सदी में बनाई गई थी। शयन करते विष्णु की एक शिला से निर्मित मूर्ति यहाँ की कला का श्रेष्ठ नमूना है। विजयवाड़ा के दक्षिण में 12 किलोमीटर दूर मंगलगिरि की पहाड़ी पर विष्णु के अवतार भगवान नरसिंह का विख्यात मंदिर है।

जम्मू कश्मीर की गुफाएं : कश्मीर में तो अमरनाथ और वैष्णोदेवी की गुफा में हिन्दुजन दर्शन के लिए जाते ही हैं लेकिन कश्मीर में ऐसी चार गुफाएं हैं, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि उनका दूसरा सिरा 4000 हजार किलोमीटर दूर रूस तक जाता है। इतना ही नहीं, इन गुफाओं के बारे में और भी ऐसे रहस्य हैं, जिनकी सच्चाई सदियों बाद भी सामने नहीं आईं।

पीर पंजाल की गुफा : जम्मू-कश्मीर के पीर पंजाल में एक गुफा है जहां एक शिवलिंग रखा है। इसका नाम पीर पंजाल केव रखा गया है।

शिव खाड़ी : जम्मू में ही शिव खाड़ी नामक एक गुफा है।

डुंगेश्वरी गुफा, बिहार : सुजात नामक स्थान पर डुंगेश्वरी गुहा मंदिर को महाकाल गुफाओं के नाम से भी जाना जाता है जो बोधगया (बिहार) के उत्तर-पूर्व में 12 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां तीन पवित्र बुद्ध गुफाएं हैं। इन गुफाओं में भगवान बुद्ध ने ध्यान लगाया था। भगवान बुद्ध ने बोधगया आने के पूर्व छह वर्षों तक कठोर निग्रह के साथ इन गुफाओं में तपस्या की थी। यह माना जाता है कि भगवान बुद्ध को यहीं से मध्यम मार्ग का ज्ञान प्राप्त हुआ था

अर्जन गुफा : कुल्लू से 5 किलोमीटर की दूरी पर जगतसुख स्थान है। जगतसुख कुल्लू के राजा जगत सिंह की राजधानी थी। इस स्थान पर बिम्बकेश्वर और  गायत्री देवी के मंदिर विशेष आकर्षक हैं। इसके नजदीक हमटा नाम स्थान है। यहां प्रसिद्ध अर्जुन गुफा है।

इस गुफा में अर्जुन की विशाल प्रतिमा है। यहां से 2 किलामीटर दूर त्रिवेणी नामक स्थान है,जहां व्यास गंगा, धोमाया गंगा और सोमाया गंगा का संगम है। इससे 1 किलोमीटर की दूरी पर गर्म पानी का चश्मा कलात कुंड है और कपिल मुनि का आश्रम भी यहां है। यहीं पर टोबा नामक प्रसिद्ध गुफा मठ भी है।

पीतलखोरा की गुफा : पीतलखोरा की गुफा महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित है। यहां पत्थर की चट्टानों को काटकर कुल 13 गुफाएं बनाई गई है। गुफा संख्या 3 चैत्य गृह और गुफा संख्या 4 विहार हैं। यहां स्थित 37 अठपहलू स्तंभों में से 12 बचे हैं, तथा शेष ये स्तूप विनष्ट हो गए हैं।  इसका निर्माण सम्भवतः द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में होने का अनुमान है।

वाणावर (बराबर) : प्राचीन मगध साम्राज्‍य के गौरवमयी विरासत प्रतीक स्‍वरूप है वाणावर जिला। वाणावर पहाड़ी समूह में प्रमुख रूप से वाणावर एवं नागार्जुनी पहाड़ियां सम्मिलित है। वैसे तो इस पहाड़ी समूह में मूर्त्ति शिल्‍प, भित्ति चित्र एवं ललित कला के नायाब नमूने मिलते हैं, पर उस पहाड़ी समूह का सर्वप्रमुख आकर्षण यहां की गुफाएं है। माना जाता है कि ग्रेनाइट की शैलों में आज से लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पहले ये गुफाएं बनाई गई थी।

इन गुफाओं को भारतीय वास्‍तुकला की उन गरिमामयी परम्‍परा में स्थान प्राप्त है, जिसमें उदयगिरि, खंडगिरि, अजंता एवं एलोरा की गुफाओं को रखा गया है। इन गुफाओं में उत्‍कीर्ण अभिलेखों से पता चलता है कि मौर्य शासक अशोक महान एवं उनके पोते दशरथ ने इन गुफाओं को अजीवक संप्रदाय के संतों को दान में दिया था।

वाणावर पहाड़ी के उतुंग शिखर पर स्थित बाबा सिद्धेश्‍वर नाथ का मंदिर भी ऐतिहासिक है। ऐसा कहा जाता है कि महाभारत कालीन वाणासुर ने इसकी स्‍थापना की थी । वापी गुफा में अंकित एक अभिलेख से इस मंदिर के 7वीं-8वीं शताब्‍दी के होने का उल्‍लेख मिलता है।

उदयगिरि की गुफाएं : उदयगिरि मध्यप्रदेश के विदिशा से वैसनगर होते हुए पहुंचा जा सकता है। नदी से यह पहाड़ी लगभग 1 मील की दूरी पर है। यह प्राचीन स्थल भिलसा से चार मील दूर बेतवा तथा बेश नदियों के बीच स्थित है।

पहाड़ी के पूरब की तरफ पत्थरों को काटकर अद्भुत गुफाएं बनाई गई हैं। उदयगिरि को पहले नीचैगिरि के नाम से जाना जाता था। कालिदास ने भी इसे इसी नाम से संबोधित किया है। 10 वीं शताब्दी में जब विदिशा धार के परमारों के हाथ में आ गया, तो राजा भोज के पौत्र उदयादित्य ने अपने नाम से इस स्थान का नाम उदयगिरि रख दिया।

उदयगिरि में कुल 20 गुफाएं हैं। इनमें से कुछ गुफाएं 4वीं-5वीं सदी से संबद्ध है। गुफा संख्या 1 तथा 20 को जैन गुफा माना जाता है। बाकी शिव गुफा, वराह गुफा, वैष्णव गुफा आदि गुफाओं के नाम से विख्‍यात है। इन गुफाओं का संवरक्षण करना जरूरी है।

उदयगिरि और खंडगिरि गुफाएं : उदयगिरि और खंडगिरि ओडीशा में भुवनेश्वर के पास स्थित दो पहाड़ियां हैं। इन पहाड़ियों में आंशिक रूप से प्राकृतिक व आंशिक रूप से कृत्रिम गुफाएं हैं जो पुरातात्विक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व की हैं। भुवनेश्वर से 8 किमी दूर स्थित इन दो पहाड़ियों का वातावरण काफी निर्मल है। उदयगिरि और खंडगिरि में कभी प्रसिद्ध जैन मठ हुआ करते थे। इन मठों को पहाड़ी की चोटी पर चट्टानों को काट कर बनाया गया था।

इन्हीं मठों को आज गुफा के रूप में देख सकते हैं। ये मठ काफी प्रचीन थे और इसका निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में किया गया था। इन में से कुछ गुफाओं में नक्काशी भी की गई है। यहां एक दो तल्ला गुफा भी है जिसे रानी गुंफा के नाम से जाना जाता है। इस गुफा को ढेरों नक्काशियों से सजाया गया है। यहां एक और बड़ी गुफा है, जिसे हाथी गुंफा के नाम से जाना जाता है। उदयगिरि में जहां 18 गुफाएं हैं, वहीं खंडगिरि में 15 गुफाएं हैं।

खंडगिरि : पहली और दूसरी गुफाएं तातोवा गुम्फा 1 और 2 कहलाती हैं, जो प्रवेश स्थल पर रक्षकों और दो बैलों तथा सिंहों से सुसज्जित है। प्रवेश तोरण पर तोते की आकृतियां हैं। गुफा संख्या 3 अनंत गुफा कहलाती है, जहां स्त्रियों, हाथियों, खिलाड़ियों और पुष्प उठाए हंसों की मूर्तियां हैं। गुफा संख्या 4 तेन्तुली गुम्फा है। गुफा संख्या 5 खंडगिरि गुम्फा दो मंजिली है, जो सामान्य तरीके से काटी गई हैं। गुफा संख्या 12, 13 और 14 के कोई नाम नहीं है। गुफा संख्या 6 से गुफा संख्या 11 के नाम हैं- ध्यान गुम्फा, नयामुनि गुम्फा, बाराभुजा गुम्फा, त्रिशूल गुम्फा, अम्बिका गुम्फा और ललतेंदुकेसरी गुम्फा। गुफा सख्या 11 की पिछली दीवार पर जैन तीर्थंकरों, महावीर और पार्श्वनाथ की नक्काशी वाली उभरी हुई मूर्तियां हैं। गुफा संख्या 14 एक साधारण कक्ष है, जिसे एकादशी गुम्फा के नाम से जाना जाता है।

उदयगिरी की गुफा : ओडीशा की राजधानी भुवनेश्वर की उदयगिरी पहाड़ियों में स्थित यह गुफा भी विश्व प्रसिद्ध है। इस गुफा के साथ ही यहां पर कई रहस्यमयी और अद्भुत गुफाएं भी हैं। इन्हीं में से एक है टाइगर केव। दरअसल इस गुफा का प्रवेश द्वार शेर के मुख की तरह बना हुआ है, इसी वजह से इसे टाइगर केव या शेर गुफा कहा जाता है। उदयगिरी की पहाड़ियों को सूर्योदय पर्वत भी माना जाता है और यहां से सूर्योदय का नजारा बेहद खास होता है।

बादामी गुफा : गुफा के अन्दर कई मंदिर होने से आकर्षक और भव्य दिखती है यह गुफा। कर्नाटक में स्थित बादामी गुफा के अन्दर कई मंदिर हैं। इतिहासकारों के अनुसार बादामी गुफा पांचवीं सदी की है।

दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे ।

Friday, 1 May 2015

सिर्फ एक श्राप से यह किला बन गया खंडहर -


झारखंड वैसे तो आपने अब तक कई किलों के बारे में सुना और देखा होगा, लेकिन आज हम जिस किले की बात करने जा रहे हैं वह राजधानी रांची से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर। यह रांची-पतरातू मार्ग के पिठौरिया गांव में 2 शताब्दी पुराना राजा जगतपाल सिंह का किला है। किसी जमाने में 100 कमरों वाला विशाल महल अब खंडहर में तब्दील हो चुका है।
इसके खंडहर में तब्दील का कारण इस किले पर हर साल बिजली गिरना है। आश्चर्यजनक रूप से इस किले पर दशकों से हर साल बिजली गिरती आ रही है, जिससे की हर साल इसका कुछ न कुछ हिस्सा टूट कर गिर जाता है। दशकों से ऐसा होते रहने के कारण यह किला अब बिलकुल खंडहर हो चुका है।
आप मानें या ना मानें लेकिन गांव वालों के अनुसार इस किले पर हर साल बिजली एक क्रांतिकारी द्वारा राजा जगतपाल सिंह को दिए गए श्राप के कारण गिरती है। वैसे तो बिजली गिरना एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन एक ही जगह पर दशकों से लगातार बिजली गिरना जरूर आश्चर्य की बात है।
इतिहासकारों के अनुसार पिठौरिया प्रारंभ से ही मुंडा और नागवंशी राजाओं का प्रमुख केंद्र रहा है। यह इलाका 1831-32 में हुए कौल विद्रोह के कारण इतिहास में अंकित है। पिठौरिया का राजा जगतपाल सिंह ने चहुमुखा विकास किया। उसे व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनाया। वो क्षेत्र की जनता में काफी लोकप्रिय थे, लेकिन उनकी कुछ गलतियों ने उनका नाम इतिहास में खलनायकों और गद्दारों की सूची में शामिल करवा दिया।

 क्या थी राजा की पहली गलती : सबसे पहली गलती तो उन्होंने 1831 के विद्रोह के समय की। 1831 में सिंदराय और बिंदराय के नेतृत्व में आदिवासियों ने आंदोलन किया था, लेकिन यहां की भौगोलिक परस्तिथियों से अंजान अंग्रेज विद्रोह को दबा नहीं पा रह थे। इसलिए अंग्रेज अधिकारी विलकिंगसन ने राजा जगतपाल सिंह के पास सहायता का संदेश भिजवाया, जिसे जगतपाल सिंह ने स्वीकार करते हुए अंग्रेजों मदद की। उनकी इस मदद के बदले तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम वैंटिक ने उन्हें 313 रुपए प्रतिमाह आजीवन पेंशन दी। दूसरा और सबसे बड़ा गुनाह उन्होंने 1857 की क्रांति में किया।

राजा से नाराज से क्रांतिकारी : 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों को रोकने के लिए उन्होंने पिठौरिया घाटी की घेराबंदी की थी, ताकि क्रांतिकारी अपने मकसद में सफल न हो सके। इतना ही नहीं वे क्रांतिकारियों की हर गतिविधियों की जानकारी अंग्रेज तक पहुंचाते थे। राजा के प्रति नाराजगी इस कदर व्याप्त थी उस समय क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ नाथ शाहदेव उन्हें सबक सिखाने पिठौरिया पहुंचे और उन पर आक्रमण किया।
बाद में वे गिरफ्तार हो गए और जगतपाल सिंह की गवाही के कारण उन्हें 16 अप्रैल 1858 को रांची जिला स्कूल के सामने कदंब के वृक्ष पर फांसी पर लटका दिया गया। जानकार बताते हैं कि उनकी ही गवाही पर कई अन्य क्रांतिकारियों को भी फांसी पर लटकाने का काम किया गया।

 क्या था श्राप : लोगों की मान्यता है कि विश्वनाथ शाहदेव ने जगतपाल सिंह को अंग्रेजों का साथ देने और देश के साथ गद्दारी करने पर यह श्राप दिया कि आने वाले समय में जगतपाल सिंह का कोई नामलेवा नहीं रहेगा और उसके किले पर हर साल उस समय तक वज्रपात होता रहेगा, जब तक यह किला पूरी तरह बर्बाद नहीं हो जाता। तब से हर साल पिठोरिया स्थित जगतपाल के किले पर वज्रपात हो रहा है। इस कारण यह किला खंडहर में तब्दील हो चुका है।

क्या कहते हैं वैज्ञानिक : वैज्ञानिक इस किले पर बिजली गिरने के दूसरे ही कारण बताते हैं। उनके मुताबिक यहां मौजूद ऊंचे पेड़ और पहाड़ों में मौजूद लौह अयस्कों की प्रचुरता दोनों मिलकर आसमानी बिजली को आकर्षित करने का एक बहुत ही सुगम माध्यम उपलब्ध कराती है। जिस कारण बारिश के दिनों में यहां अक्सर वज्रपात होता रहता है, लेकिन लोगों का सवाल यह है कि यह किला जब दशकों तक आबाद रहा। तब क्यों नहीं बिजलियां गिरीं, जबकि उस वक्त आज से ज्यादा पेड़ और लौह अयस्क था।

दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे।

Tuesday, 28 April 2015

क्या आप जानते हैं कि......हमारे प्राचीन महादेश का नाम “भारतवर्ष” कैसे पड़ा....?????

क्या आप जानते हैं कि हमारे प्राचीन महादेश का नाम “भारतवर्ष” कैसे पड़ा....?????
साथ ही क्या आप जानते हैं कि  हमारे प्राचीन हमारे महादेश का नाम "जम्बूदीप" था....?????
परन्तु..... क्या आप सच में जानते हैं जानते हैं कि..... हमारे महादेश को ""जम्बूदीप"" क्यों कहा जाता है ... और, इसका मतलब क्या होता है .....??????

दरअसल..... हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि ...... भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा.........????
क्योंकि.... एक सामान्य जनधारणा है कि ........महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र ......... भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा...... परन्तु इसका साक्ष्य उपलब्ध नहीं है...!
लेकिन........ वहीँ हमारे पुराण इससे अलग कुछ अलग बात...... पूरे साक्ष्य के साथ प्रस्तुत करता है......। आश्चर्यजनक रूप से......... इस ओर कभी हमारा ध्यान नही गया..........जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर........ अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था....।
परन्तु , क्या आपने कभी इस बात को सोचा है कि...... जब आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि........ प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात .......महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था....।
लेकिन ये सात महाद्वीप किसने और क्यों तथा कब बनाए गये.... इस पर कभी, किसी ने कुछ भी नहीं कहा ....।
अथवा .....दूसरे शब्दों में कह सकता हूँ कि...... जान बूझकर .... इस से सम्बंधित अनुसंधान की दिशा मोड़ दी गयी......।
परन्तु ... हमारा ""जम्बूदीप नाम "" खुद में ही सारी कहानी कह जाता है ..... जिसका अर्थ होता है ..... समग्र द्वीप .
इसीलिए.... हमारे प्राचीनतम धर्म ग्रंथों तथा... विभिन्न अवतारों में.... सिर्फ "जम्बूद्वीप" का ही उल्लेख है.... क्योंकि.... उस समय सिर्फ एक ही द्वीप था...

साथ ही हमारा वायु पुराण ........ इस से सम्बंधित पूरी बात एवं उसका साक्ष्य हमारे सामने पेश करता है.....।
वायु पुराण के अनुसार........ त्रेता युग के प्रारंभ में ....... स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने........ इस भरत खंड को बसाया था.....।
चूँकि महाराज प्रियव्रत को अपना कोई पुत्र नही था......... इसलिए , उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था....... जिसका लड़का नाभि था.....!
नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम........ ऋषभ था..... और, इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे ...... तथा .. इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम...... "भारतवर्ष" पड़ा....।
उस समय के राजा प्रियव्रत ने ....... अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को......... संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों के अलग-अलग राजा नियुक्त किया था....।

राजा का अर्थ उस समय........ धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक से लिया जाता था.......।
इस तरह ......राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक .....अग्नीन्ध्र को बनाया था।

इसके बाद ....... राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया..... और, वही " भारतवर्ष" कहलाया.........।
ध्यान रखें कि..... भारतवर्ष का अर्थ है....... राजा भरत का क्षेत्र...... और इन्ही राजा भरत के पुत्र का नाम ......सुमति था....।


इस विषय में हमारा वायु पुराण कहता है....

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

मैं अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए..... रोजमर्रा के कामों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा कि.....
हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं ....... तो, उसमें सबसे पहले पंडित जी.... संकल्प करवाते हैं...।
हालाँकि..... हम सभी उस संकल्प मंत्र को बहुत हल्के में लेते हैं... और, उसे पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मात्र ...... मानकर छोड़ देते हैं......।
परन्तु.... यदि आप संकल्प के उस मंत्र को ध्यान से सुनेंगे तो.....उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है......।संकल्प मंत्र में यह स्पष्ट उल्लेख आता है कि........ -जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….।
संकल्प के ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं..... क्योंकि, इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है.....।
इस जम्बू द्वीप में....... भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात..... ‘भारतवर्ष’ स्थित है......जो कि आर्याव्रत कहलाता है....।
इस संकल्प के छोटे से मंत्र के द्वारा....... हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं......।
परन्तु ....अब एक बड़ा प्रश्न आता है कि ...... जब सच्चाई ऐसी है तो..... फिर शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत से.... इस देश का नाम क्यों जोड़ा जाता है....?
इस सम्बन्ध में ज्यादा कुछ कहने के स्थान पर सिर्फ इतना ही कहना उचित होगा कि ...... शकुंतला, दुष्यंत के पुत्र भरत से ......इस देश के नाम की उत्पत्ति का प्रकरण जोडऩा ....... शायद नामों के समानता का परिणाम हो सकता है.... अथवा , हम हिन्दुओं में अपने धार्मिक ग्रंथों के प्रति उदासीनता के कारण ऐसा हो गया होगा... ।
परन्तु..... जब हमारे पास ... वायु पुराण और मन्त्रों के रूप में लाखों साल पुराने साक्ष्य मौजूद है .........और, आज का आधुनिक विज्ञान भी यह मान रहा है कि..... धरती पर मनुष्य का आगमन करोड़ों साल पूर्व हो चुका था, तो हम पांच हजार साल पुरानी किसी कहानी पर क्यों विश्वास करें....?????
सिर्फ इतना ही नहीं...... हमारे संकल्प मंत्र में.... पंडित जी हमें सृष्टि सम्वत के विषय में भी बताते हैं कि........ अभी एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरहवां वर्ष चल रहा है......।
फिर यह बात तो खुद में ही हास्यास्पद है कि.... एक तरफ तो हम बात ........एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरह पुरानी करते हैं ......... परन्तु, अपना इतिहास पश्चिम के लेखकों की कलम से केवल पांच हजार साल पुराना पढ़ते और मानते हैं....!
आप खुद ही सोचें कि....यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और क्या है........?????
इसीलिए ...... जब इतिहास के लिए हमारे पास एक से एक बढ़कर साक्षी हो और प्रमाण ..... पूर्ण तर्क के साथ उपलब्ध हों ..........तो फिर , उन साक्षियों, प्रमाणों और तर्कों केआधार पर अपना अतीत अपने आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी बनती है.........।
हमारे देश के बारे में .........वायु पुराण का ये श्लोक उल्लेखित है.....—-हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:.....।।
यहाँ हमारा वायु पुराण साफ साफ कह रहा है कि ......... हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है.....।
इसीलिए हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि......हमने शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत के साथ अपने देश के नाम की उत्पत्ति को जोड़कर अपने इतिहास को पश्चिमी इतिहासकारों की दृष्टि से पांच हजार साल के अंतराल में समेटने का प्रयास किया है....।
ऐसा इसीलिए होता है कि..... आज भी हम गुलामी भरी मानसिकता से आजादी नहीं पा सके हैं ..... और, यदि किसी पश्चिमी इतिहास कार को हम अपने बोलने में या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो यह हमारे लिये शान की बात समझी जाती है........... परन्तु, यदि हम अपने विषय में अपने ही किसी लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ दें..... तो, रूढि़वादिता का प्रमाण माना जाता है । और.....यह सोच सिरे से ही गलत है....।
इसे आप ठीक से ऐसे समझें कि.... राजस्थान के इतिहास के लिए सबसे प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड का इतिहास माना जाता है.....।
परन्तु.... आश्चर्य जनक रूप से .......हमने यह नही सोचा कि..... एक विदेशी व्यक्ति इतने पुराने समय में भारत में ......आकर साल, डेढ़ साल रहे और यहां का इतिहास तैयार कर दे, यह कैसे संभव है.....?
विशेषत: तब....... जबकि उसके आने के समय यहां यातायात के अधिक साधन नही थे.... और , वह राजस्थानी भाषा से भी परिचित नही था....।
फिर उसने ऐसी परिस्थिति में .......सिर्फ इतना काम किया कि ........जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध में इतिहास संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं ....उन सबको संहिताबद्घ कर दिया...।इसके बाद राजकीय संरक्षण में करनल टाड की पुस्तक को प्रमाणिक माना जाने लगा.......और, यह धारणा बलवती हो गयीं कि.... राजस्थान के इतिहास पर कर्नल टाड का एकाधिकार है...।
और.... ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं....... इसीलिए.... अपने देश के इतिहास के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करना हमारा ध्येय होना चाहिए....।
क्योंकि..... इतिहास मरे गिरे लोगों का लेखाजोखा नही है...... जैसा कि इसके विषय में माना जाता है........ बल्कि, इतिहास अतीत के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे न्यायशील और धर्मशील राजाओं के कृत्यों का वर्णन करता है.....।
इसीलिए हिन्दुओं जागो..... और , अपने गौरवशाली इतिहास को पहचानो.....!

हम गौरवशाली हिन्दू सनातन धर्म का हिस्सा हैं.... और, हमें गर्व होना चाहिए कि .... हम हिन्दू हैं...!

दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे।

Sunday, 19 April 2015

इन इस्लामिक देशोँ की जानने का प्रयास करते है....


दुनिया मेँ 53 इस्लामिक देश हैँ. जिनकी कुल आबादी 162 करोड़ हैँ । आइये, इन इस्लामिक देशोँ की जानने का प्रयास करते है....

1. कई इस्लामिक देश इतने छोटे हैँ कि उनसे ज्यादा बड़ा तो हमारा गोवा राज्य होगा.....

2. ज्यादातर इस्लामिक देश भुखमरी से जूझ रहेँ हैँ....

3. पाकिस्तान के अलावा कोई मुस्लिम देश परमाणुंसंपन्न नहीँ है....

4. इन 53 इस्लामिक देशोँ की सारी सेनाओँ को जोड़लिया जाये तो लगभग 19.62 लाख सैनिक है.जबकि भारत के पास 16.82 लाख आर्मी और 11.31लाख रिजर्व सैनिक है.....

5. किसी इस्लामिक देश के पास विमान वाहकयुद्धपोत नहीँ है. भारत के पास 5 युद्धपोत है....

6. किसी इस्लामिक देश के पास Anti Balastic Missile नहीँ हैँ. चीन, जर्मनी के बाद भारतदुनिया का तीसरा देश है जिसके पास मिसाईल्सको हवा मेँ नष्ट करने की शक्ति है....

7. किसी इस्लामिक देश के पास 1200 Km सेज्यादा की मारक शक्ति वाली मिसाईल नहीँ हैँ.भारत के पास 7000 Km तक दुश्मनोँ को मारनेवाली पृथ्वी-5 मिसाईल है....

8. किसी इस्लामिक देश के पास सुपर सोनिकमिसाईल नहीँ है. भारत के पास ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाईल है. ये शक्ति सिर्फ अमेरिका,जर्मनी, चीन और रूस के पास है.....दुनिया मेँ कुल आतंकवादियोँ की संख्या 2.13 लाख है I

CIA के अनुसार मान लिया कि सारे इस्लामिक देशआतंकवादियोँ के साथ मिलकर भारत के साथ युद्धकरते हैँ तो भी भारतीय सेना मात्र 14 दिनोँ मेँ सारे इस्लामिक देशोँ मेँ तिरंगा फैराने की हिम्मत रखती हैँ......
हमेँ विदेशियोँ से ज्यादा दिक्कत नहीँ है. जरूरत हैआस्तिन के साँपोँ का मुंह कुचलने की और हमें विश्वास हैकि वर्तमान भारत सरकार जल्दी कर देँगी.....

जय हिंद, जय भारत. !!

दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे।