Saturday, 12 September 2015

ये है हर साल बढ़ने वाला विश्व का एकमात्र शिवलिंग -

छत्तीसगढ़ की राजधानी से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गरियाबंद जिला. जिला मुख्यालय से 3 किलोमीटर की दूरी पर बसे ग्राम मरौदा के जंगलों में प्राकृतिक शिवलिंग 'भूतेश्वर महादेव' स्थित है. पूरे विश्व में इसकी ख्याति हर वर्ष बढ़ने वाली इसकी ऊंचाई के लिए फैली हुई है. अर्धनारीश्वर इस शिवलिंग को 'भकुर्रा महादेव' भी कहा जाता हैI

भूतेश्वर महादेव के स्थानीय पंडितों और मंदिर समिति के सदस्यों का कहना है कि हर महाशिवरात्रि को इसकी ऊंचाई और मोटाई मापी जाती है. सदस्यों का कहना है कि हर साल यह शिवलिंग एक इंच से पौन इंच तक बढ़ जाती है. भकुर्रा महादेव के संबंध में कहा जाता है कि कभी यहां हाथी पर बैठकर जमींदार अभिषेक किया करते थेI
 भूतेश्वर महादेव के पुजारी केशव सोम का कहना है कि हर वर्ष सावन मास में दूर-दराज से कांवड़िये (भक्त) भूतेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना करने आते हैं. उन्होंने बताया कि हर साल महाशिवरात्रि पर भूतेश्वर महादेव की ऊंचाई नापी जाती हैI

वहीं 25 साल से भूतेश्वर महादेव संचालन समिति से जुड़े मनोहर लाल देवांगन ने बताया कि भूतेश्वर महादेव को भकुर्रा महादेव भी कहते हैं. यह संभवत: विश्व का पहला ऐसा शिवलिंग है, जिसकी ऊंचाई हर साल बढ़ती हैI
आपको बता दें कि इसके सेवा कार्यो का संचालन 17 गांवों की समिति मिलकर करती हैंI

भूतेश्वर महादेव की ऊंचाई का विवरण 1952 में प्रकाशित कल्याण तीर्थाक के पृष्ठ क्रमांक 408 पर मिलता हैI जहां इसकी ऊंचाई 35 फीट और व्यास 150 फीट उल्लेखित हैI

1978 में इसकी ऊंचाई 40 फीट बताई गई. 1987 में 55 फीट और 1994 में फिर से थेडोलाइट मशीन से नाप करने पर 62 फीट और उसका व्यास 290 फीट मिला. वहीं वर्तमान में इस शिवलिंग की ऊंचाई 80 फीट बताई जा रही हैI


छत्तीसगढ़ इतिहास के जानकार डॉ. दीपक शर्मा का कहना है कि शिवलिंग पर कभी छूरा क्षेत्र के जमींदार हाथी पर चढ़कर अभिषेक किया करते थेI

शिवलिंग पर एक हल्की सी दरार भी है जिसे कई लोग इसे अर्धनारीश्वर का स्वरूप भी मानते हैं. मंदिर परिसर में छोटे-छोटे मंदिर बना दिए गए हैंI
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Thursday, 25 June 2015

धर्म : तीन प्रकार के विश्वासी लोग -

मनु स्मृति, पुराण आदि स्मृति ग्रंथों में उन लोगों के बारे में बताया गया है, जो हिन्दू धर्म का ज्ञान नहीं रखते हैं और वे धर्म के बारे में अपनी मनमानी व्याख्या बनाकर समाज में भ्रम फैलाते हैं। ऐसे लोग न तो धर्म में विश्‍वास रखते हैं लेकिन जताते हैं कि विश्‍वास रखते हैं और न ही इन लोगों से राष्ट्रसेवा की कामना की जा सकता है।

इसी तरह वे ईश्वर को लेकर भी गफलत में रहते हैं। उन्हें कभी लगता है कि ईश्वर जैसी कोई शक्ति जरूर है और कभी लगता है कि नहीं है। वे उनका दर्शन खुद ही गढ़ते रहते हैं। ऐसे लोग कभी धर्म या ईश्वर का विरोध करते हैं तो कभी तर्क द्वारा उनका पक्ष भी लेते पाए जाते हैं। ऐसे विकारी और विभ्रम में जीने वाले लोगों के बारे में धर्मशास्त्रों में विस्तार से जानकारी मिलती है और ऐसे लोग मरने के बाद किस तरह की गति को प्राप्त होते हैं, यह ‍भी विस्तार से बताया गया है। आओ हम जानते हैं कुछ इसी टाइप के लोगों के बारे में।

अविश्‍वासी लोग : पहले प्रकार के विश्‍वासी लोग वे होते हैं, जो स्वयं सहित किसी पर भी विश्‍वास नहीं करते हैं। ऐसे लोग जिंदगी के दुखदायी मोड़ पर कभी भी किसी पर भी विश्वास कर बैठते हैं। ऐसे लोग अपनी जवानी में नास्तिक होते हैं। हो सकता है कि वे दिखावे के लिए ऐसे हों। खुद को आधुनिक घोषित करने के लिए ऐसे हों। लेकिन ऐसे लोग खुद पर भी भरोसा नहीं करते और ईश्वर पर भी नहीं। ये लोग मंदिर नहीं जाते। यदि वे कट्टर अविश्‍वासी हैं, तो उम्र के ढलान के अंतिम दौर में उन्हें पता चलता है कि सब कुछ खो दिया, अब ईश्‍वर हमें अपनी शरण में ले लें। ये अधार्मिक होते हैं।

आत्मविश्‍वास : ऐसे बहुत से लोग हैं, जो दूसरों पर नहीं, खुद पर ज्यादा भरोसा करते हैं। ये दूसरे प्रकार के विश्‍वासी लोग हैं। ये नास्तिक भी हो सकते हैं और तथाकथित आस्तिक भी। ये मंदिर जा भी सकते हैं और नहीं भी। इनके विचार बदलते रहते हैं। ये कभी किसी को सत्य मानते हैं, तो कभी अन्य किसी को तर्क द्वारा सत्य सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। ये नास्तिकों के साथ नास्तिक और आस्तिकों के साथ आस्तिक हो सकते हैं। ये लोग मानते हैं कि ईश्‍वर के बगैर भी जीवन की समस्याओं को वे स्वयं सुलझा सकते हैं। ये भी अधार्मिक होते हैं।

विश्‍वासी : अधिकतर लोगों को स्वयं और परमेश्वर पर भरोसा नहीं होता। वे कबूल करते हैं कि उनमें कोई सामर्थ्य या ज्ञान नहीं है, परंतु उनको विश्वास भी नहीं होता कि परमेश्वर उनके लिए कार्य करेगा। वे समझते हैं कि हम तो तुच्छ हैं, जो परमेश्वर होगा तो हमारे लिए कार्य नहीं करेगा। ऐसे विश्वासी भी प्रार्थनारहित जीवन जीते हैं। वे प्रार्थना भी करते हैं तो उनकी प्रार्थना में कोई विश्वास नहीं होता। विश्‍वास है लेकिन खुद को हीन समझते हैं।

दूसरे प्रकार के विश्‍वासी भी होते हैं, जो संपूर्ण रूप से परमेश्वर के होने में विश्वास तो करते ही हैं और वे अपने अच्छे और बुरे सभी कर्मों को परमेश्वर को ही समर्पण कर देते हैं। वे जरा भी भय, अविश्वास और भ्रम की भावना में नहीं जीते हैं। उनका विश्वास होता है कि परमेश्वर से बढ़कर कोई शक्ति नहीं और वह सभी को भरपूर रूप से आशीर्वाद देने वाला है। परमेश्वर कभी किसी का बुरा नहीं करता चाहे कोई कितना ही बुरा क्यों न हो। आदमी को उसके बुरे कर्मों या पापों की सजा तो स्वत: ही प्रकृति दे देती है।

ऐसे विश्‍वासी मानते हैं कि परमेश्वर हमेशा हमारे साथ है। हम जितना विनम्र होंगे वह उतना करीब होगा। हम जितना धार्मिक होंगे, वह हमारे उतना करीब होगा।

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Monday, 8 June 2015

जानिए किस देवता का वाहन क्या है और क्यों है -

हिंदू धर्म में विभिन्न देवताओं का स्वरूप अलग-अलग बताया गया है। हर देवता का स्वरूप उनके आचरण व व्यवहार के अनुरूप ही हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित है। स्वरूप के साथ ही देवताओं के वाहनों में विभिन्नता देखने को मिलती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिकांश देवताओं के वाहन पशु ही हैं।आप भी जानिए किस देवता का वाहन क्या है और क्यों है -
भगवान शंकर का वाहन बैल -
धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शंकर का वाहन बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त कि थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है। 
भगवान श्रीगणेश का वाहन मूषक -
भगवान श्रीगणेश का वाहन है मूषक अर्थात चूहा। चूहे की विशेषता यह है कि यह हर वस्तु को कुतर डालता है। वह यह नही देखता की वस्तु आवश्यक है या अनावश्यक, कीमती है अथवा बेशकीमती। इसी प्रकार कुतर्की भी यह विचार नही करते की यह कार्य शुभ है अथवा अशुभ। अच्छा है या बुरा।
वह हर काम में कुतर्कों द्वारा व्यवधान उत्पन्न करते हैं। श्रीगणेश बुद्धि एवं ज्ञान के देवता हैं तथा कुतर्क मूषक है, जिसे गणेशजी ने अपने नीचे दबा कर अपनी सवारी बना रखा है। यह हमारे लिए भी शिक्षा है कि कुतर्कों को परे कर उनका दमन कर ज्ञान को अपनाएं।
देवी दुर्गा का वाहन शेर -
शास्त्रों में देवी दुर्गा का वाहन सिंह यानी शेर बताया गया है। शेर एक संयुक्त परिवार में रहने वाला प्राणी है। वह अपने परिवार की रक्षा करने के साथ ही सामाजिक रूप से वन में रहता है। वह वन का सबसे शक्तिशाली प्राणी होता है, किंतु अपनी शक्ति को व्यर्थ में व्यय नही करता। आवश्यकता पडऩे पर ही उसका उपयोग करता है।
देवी के वाहन शेर से यह संदेश मिलता है कि घर की मुखिया स्त्री को अपने परिवार को जोड़कर रखना चाहिए तथा व्यर्थ के कार्यों में अपनी बुद्धि को न लगाकर घर को सुखी बनाने के लिए लगातार प्रयास करना चाहिए।
भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ -
भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है। इसे पक्षियों का राजा भी कहते हैं। गरुड़ की विशेषता है कि यह आसमान में बहुत ऊंचाई पर उड़कर भी धरती के छोटे-छोटे जीवों पर नजर रख सकता है। उसमें अपरिमित शक्ति होती है। 
वैसे ही भगवान विष्णु सबका पालन करने वाले तथा प्रत्येक जीव का ध्यान रखने वाले होते हैं। उनकी नजर सदा प्रत्येक जीव पर होती है। उन पर सबकी रक्षा का भार भी है। इसलिए वह परम शक्तिशाली हैं। 
लक्ष्मी का वाहन हाथी एवं उल्लू -
माता लक्ष्मी का एक वाहन सफेद रंग का हाथी है। हाथी परिवार के साथ मिल-जुलकर रहने वाला सामाजिक एवं बुद्धिमान प्राणी है। उनके परिवार में मादाओं को प्राथमिकता दी जाती है तथा सम्मान किया जाता है। हाथी हिंसक प्राणी नही होता। उसी तरह अपने परिवार वालों को एकता के साथ रखने वाला तथा अपने घर की स्त्रियों को आदर एवं सम्मान देने वालों के साथ लक्ष्मी का निवास होता है। 

लक्ष्मी का वाहन उल्लू भी होता है। उल्लू सदा क्रियाशील होता है। वह अपना पेट भरने के लिए लगातार कर्म करता रहता है। अपने कार्य को पूरी तन्मयता के साथ पूरा करता है। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति रात-दिन मेहनत करता है, लक्ष्मी सदा उस पर प्रसन्न होती हैं तथा स्थाई रूप से उसके घर में निवास करती हैं। 

हनुमानजी का आसन पिशाच -
हनुमानजी प्रेत या पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं। इसी को वह अपने वाहन के रूप में भी प्रयोग करते हैं। पिशाच या प्रेत बुराई तथा दूसरों का भय एवं कष्ट देने वाले होते हैं। इसका अर्थ है कि हमें कभी भी बुराई को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। 
सरस्वती का वाहन हंस -
मां सरस्वती का वाहन हंस है। हंस का एक गुण होता है कि उसके सामने दूध एवं पानी मिलाकर रख दें तो वह केवल दूध पी लेता हैं तथा पानी को छोड़ देता है। यानी वह सिर्फ गुण ग्रहण करता है व अवगुण छोड़ देता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। गुण व अवगुण को पहचानना तभी संभव है, जब आप में ज्ञान हो। इसलिए माता सरस्वती का वाहन हंस है।
भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर -
भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय देवताओं के सेनापति कहे जाते हैं। इनका वाहन मोर है। धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिकेय ने असुरों से युद्ध कर देवताओं को विजय दिलाई थी। अर्थात इनका युद्ध कौशल सबसे श्रेष्ठ है। अब यदि इनके वाहन मोर को देखें तो पता चलता है कि इसका मुख्य भोजन सांप है। सांप बहुत खतरनाक प्राणी है। इसलिए इसका शिकार करने के लिए बहुत ही स्फूर्ति और चतुराई की आवश्यकता होती है। इसी गुण के कारण मोर सेनापति कार्तिकेय का वाहन है।
यमराज का वाहन भैंसा -
यमराज भैंसे को अपने वाहन के रूप में प्रयोग करते हैं। भैंसा भी सामाजिक प्राणी होता है। भैंसों के झुंड के सदस्य मिलकर एक-दूसरे की रक्षा करते हैं। उनका रूप भयानक होता है और उनमें शक्ति भी बहुत होती है, लेकिन वे इस शक्ति का दुरुपयोग नहीं करते। इसका अर्थ है कि यदि हम अपने परिवार के साथ मिल-जुलकर रहें तो बड़ी समस्याओं का सामना भी आसानी से कर सकते हैं। अत: यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।
गंगा का वाहन मगर -
धर्म ग्रंथों में माता गंगा का वाहन मगरमच्छ बताया गया है। इससे अभिप्राय है कि हमें जल में रहने वाले हर प्राणी की रक्षा करनी चाहिए। अपने निजी स्वार्थ के लिए इनका शिकार करना उचित नहीं है, क्योंकि जल में रहने वाला हर प्राणी पारिस्थितिक तंत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इनकी अनुपस्थिति में पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ सकता है।

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Sunday, 17 May 2015

शिवपुराण में शिव-शक्ति का संयोग -

शिव पुराण के अनुसार शिव-शक्ति का संयोग ही परमात्मा है। शिव की जो पराशक्ति है उससे चित्‌ शक्ति प्रकट होती है। चित्‌ शक्ति से आनंद शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, आनंद शक्ति से इच्छाशक्ति का उद्भव हुआ है, इच्छाशक्ति से ज्ञानशक्ति और ज्ञानशक्ति से पांचवीं क्रियाशक्ति प्रकट हुई है। इन्हीं से निवृत्ति आदि कलाएं उत्पन्न हुई हैं। 

चित्‌ शक्ति से नाद और आनंदशक्ति से बिंदु का प्राकट्य बताया गया है। इच्छाशक्ति से 'म' कार प्रकट हुआ है। ज्ञानशक्ति से पांचवां स्वर 'उ' कार उत्पन्न हुआ है और क्रियाशक्ति से 'अ' कार की उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार प्रणव (ॐ) की उत्पत्ति हुई है। 

शिव से ईशान उत्पन्न हुए हैं, ईशान से तत्पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ है। तत्पुरुष से अघोर का, अघोर से वामदेव का और वामदेव से सद्योजात का प्राकट्य हुआ है। इस आदि अक्षर प्रणव से ही मूलभूत पांच स्वर और तैंतीस व्यजंन के रूप में अड़तीस अक्षरों का प्रादुर्भाव हुआ है। उत्पत्ति क्रम में ईशान से शांत्यतीताकला उत्पन्न हुई है। ईशान से चित्‌ शक्ति द्वारा मिथुनपंचक की उत्पत्ति होती है। 

अनुग्रह, तिरोभाव, संहार, स्थिति और सृष्टि इन पांच कृत्यों का हेतु होने के कारण उसे पंचक कहते हैं। यह बात तत्वदर्शी ज्ञानी मुनियों ने कह है। वाच्य वाचक के संबंध से उनमें मिथुनत्व की प्राप्ति हुई है। कला वर्णस्वरूप इस पंचक में भूतपंचक की गणना है। आकाशादि के क्रम से इन पांचों मिथुनों की उत्पत्ति हुई है। इनमें पहला मिथुन है आकाश, दूसरा वायु, तीसरा अग्नि, चौथा जल और पांचवां मिथुन पृथ्वी है। 

इनमें आकाश से लेकर पृथ्वी तक के भूतों का जैसा स्वरूप बताया गया है, वह इस प्रकार है - आकाश में एकमात्र शब्द ही गुण है, वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, अग्नि में शब्द, स्पर्श और रूप इन तीन गुणों की प्रधानता है, जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस ये चार गुण माने गए हैं तथा पृथ्वी शब्द, स्पर्श, रूप , रस और गंध इन पांच गुणों से संपन्न है। यही भूतों का व्यापकत्व कहा गया है अर्थात्‌ शब्दादि गुणों द्वारा आकाशदि भूत वायु आदि परवर्ती भूतों में किस प्रकार व्यापक है, यह दिखाया गया है। 

इसके विपरीत गंधादि गुणों के क्रम से वे भूत पूर्ववर्ती भूतों से व्याप्य हैं अर्थात्‌ गंध गुणवाली पृथ्वी जल का और रसगुणवाला जल अग्नि का व्याप्य है, इत्यादि रूप से इनकी व्याप्यता को समझना चाहिए। पांच भूतों (महत्‌ तत्व) का यह विस्तार ही प्रपंच कहलाता है। 


ND
सर्वसमष्टि का जो आत्मा है, उसी का नाम विराट है और पृथ्वी तल से लेकर क्रमशः शिवतत्व तक जो तत्वों का समुदाय है वही ब्रह्मांड है। वह क्रमशः तत्वसमूह में लीन होता हुआ अंततोगत्वा सबके जीवनभूत चैतन्यमय परमेश्वर में ही लय को प्राप्त होता है और सृष्टिकाल में फिर शक्ति द्वारा शिव से निकल कर स्थूल प्रपंच के रूप में प्रलयकालपर्यंत सुखपूर्वक स्थित रहता है। 

अपनी इच्छा से संसार की सृष्टि के लिए उद्यत हुए महेश्वर का जो प्रथम परिस्पंद है, उसे शिवतत्व कहते हैं। यही इच्छाशक्ति तत्व है, क्योंकि संपूर्ण कृत्यों में इसी का अनुवर्तन होता है। ज्ञान और क्रिया, इन दो शक्तियों में जब ज्ञान का आधिक्य हो, तब उसे सदाशिवतत्व समझना चाहिए, जब क्रियाशक्ति का उद्रेक हो तब उसे महेश्वर तत्व जानना चाहिए तथा जब ज्ञान और क्रिया दोनों शक्तियां समान हों तब वहां शुद्ध विद्यात्मक तत्व समझना चाहए। 

जब शिव अपने रूप को माया से निग्रहीत करके संपूर्ण पदार्थों को ग्रहण करने लगता है, तब उसका नाम पुरुष होता है।

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पंच महा यज्ञ -

 
पंच महा यज्ञ
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सभी श्रेस्ठ कर्मो का नाम यज्ञ हे। महा यज्ञ पाँच है -
1ब्रह्मयज्ञ   2 देवयज्ञ   3पितृ यज्ञ    4अतिथि यज्ञ    5बलिवैश्वदेव यज्ञ

ब्रह्म यज्ञ
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ब्रह्मयज्ञ संध्या को कहते है |
प्रातः सूर्योदय से पूर्व तथा सांय सूर्या सस्त के बाद जब आकाश में लालिमा होती है तब एकांत स्थान में बैठ कर ईश्वर का ध्यान करना ही ब्रह्मयज्ञ अथवा संध्या कहलाती है।

देव यज्ञ
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अग्निहोत्र अर्थात हवन को देवयज्ञ कहते है। हम दिन भर अपने शरीर के द्वारा वायु जल और पृथ्वी को प्रदूषित करते रहते है इसके अतिरिक्त आजकल हमारी मशीनों से भी प्रदूषण फैल रहा है जिसके कारण अनेक बीमारिया फैल रही है उस प्रदूषण को रोकना तथा वायु जल और पृथ्वी को पवित्र करना हमारा परम कर्तव्य है। सब प्रकार के प्रदूषण को रोकने का एक ही मुख्य साधन है और वह है हवन।।।।।

हवन में बोले जाने वाले मन्त्रो का भी महत्व है। इसके मानसिक एवं आत्मिक पवित्रता एवं शान्ति की प्राप्ति होती है।

पितृ यज्ञ
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जीवित माता पिता गुरुजनो और अन्य बड़ो की सेवा एवं आज्ञा पालन करना ही पितृ यज्ञ है।


अतिथि यज्ञ
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घर पर आये हुए विद्वान् धर्मात्मा संतमहात्मा का भोजन आदि सत्कार सेवा करके ज्ञान प्राप्ति करना अतिथि यज्ञ है


बलिवैश्वदेव यज्ञ
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पशु पक्षी किट पंतग आदि ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए ही बनाये है।। इन पर दया करना और इन्हें खाना खिलाना बलिवैश्वदेव यज्ञ है।।


ये 5 महा यज्ञ है जो प्रतिदिन हर व्यक्ति को करना चाहिए । भगवान् राम और कृष्ण सुबह शाम दैनिक यज्ञ एवं संध्या करते थे |

🚩🚩🚩कृण्वन्तो विश्वार्यम🌏🌏🌏🚩🚩🚩


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Wednesday, 13 May 2015

क्यों कहते हैं हिंदुत्व को सनातन धर्म?

अक्सर इस सवाल को उठाया ही जाता है कि हिंदू धर्म को सनातन क्यों कहते हैं? क्या है इस सनातन का असली अर्थ? सनतानी रहस्य का चोला आखिर हिंदुत्व व्यवहार को ही क्यों प्राप्त है क्या हिंदू धर्म की कोई उत्पत्ति विषयक व्याख्या हो भी सकती है!

ज्यादातर धार्मिक प्रसंगों की टिप्पणियों के दौरान सनातन का मतलब समझाने को भी कहा जाता है और इसके प्रसंगों को समझने की पुरजोर कोशिश भी की जाती है। किंतु पूर्वाग्रह अक्सर इसका सही जवाब देने से रोक देते हैं। आज हम इसी सवाल को थोड़ा गहराई से समझने की कोशिश करेंगे....

सनातन का शाब्दिक अर्थ तो जगजाहिर है। इसका सामान्य रूप से मतलब होता है ‘जो हमेशा से मौज़ूद रहा है’ यानि जिसकी उत्पत्ति और जन्म से किसी का कोई सरोकार न हो और वह वस्तु या व्यक्ति या सिद्धांत नित्य हो। यानि अजन्मा जैसा धर्म या जीवन पद्धति, जिसके विकास की धारा अनवरत रही हो। आप किसी भी एक ऐसे देवता का नाम नहीं ले सकते, जो हिंदू सनातन परंपरा का जन्मदाता हो। ऐसा कोई शख्स ये दावा नहीं कर सकता कि उसने अपने प्रयत्नों से सनातन धर्म का निर्माण किया हो।

दुनिया के सभी धर्म किसी न किसी व्यक्ति की विचारधारा से उद्भूत हुए हैं। इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, बुद्धिज्म, जैनिज्म, जरथुस्त्रियन, पारसीक आदि धर्मों की मान्यताएं मूलतः किसी न किसी पैगंबर या ईश्वरीय दूतों के संदेशों पर निर्भर करती हैं। अकाट्य रूप से उनसे जुड़े सिद्धांत उस दूत विशेष की क्रियाविधि से प्रभावित होते हैं, उनकी जीवनशैली ही इनके लिए आधारबिंदु का कार्य करती है।

किंतु यही बात सनातन परंपरा पर बिल्कुल भी लागू नहीं होती। ये एक प्रवाहमय विचारधारा, सरल जीवन पद्धति, नैरंतर्य की सरिता के समान विशाल और गहरी है। न आदि न अंत, अविनाशी, उस सर्वशक्तिमान के समान अजेय और निरंतर है......

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Sunday, 10 May 2015

शतायु होना है तो स्मरण करें इन 7 चिरंजीवियों का -

प्राचीन हिंदू इतिहास और पुराणों के अनुसार ऐसे सात व्यक्ति हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। हिंदू धर्म अनुसार इन्हें सात जीवित महामानव कहा जाता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इनका प्रात: स्मरण करने से मनुष्य दीर्घायु और निरोग रहता है।
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु को प्राप्त करता है।
प्राचीन मान्यताओं के आधार पर यदि कोई व्यक्ति हर रोज इन आठ अमर लोगों (अष्ट चिरंजीवी) के नाम भी लेता है तो उसकी उम्र लंबी होती है।
हनुमान जी: -  कलियुग में हनुमानजी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं और हनुमानजी भी इन अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं। 

सीता माता ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। उन्हें वरदान मिला है कि उन्हें ना कभी मौत आएगी और ना ही कभी बुढ़ापा। इस कारण भगवान हनुमान को हमेशा अक्षय शक्ति का स्रोत माना गया है क्योंकि वे चिरयुवा हैं।

कृपाचार्य :- महाभारत के अनुसार कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के कुलगुरु थे। कृपाचार्य गौतम ऋषि पुत्र हैं और इनकी बहन का नाम है कृपी। कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ था। कृपाचार्य, अश्वथामा के मामा हैं। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य ने भी पांडवों के विरुद्ध कौरवों का साथ दिया था।

अश्वथामा:- ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। 

महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।

ऋषि मार्कण्डेय- भगवान शिव के परम भक्त हैं ऋषि मार्कण्डेय। इन्होंने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र सिद्धि के कारण चिरंजीवी बन गए।

विभीषण:- राक्षस राज रावण के छोटे भाई हैं विभीषण। विभीषण श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। जब रावण ने माता सीता हरण किया था, तब विभीषण ने रावण को श्रीराम से शत्रुता न करने के लिए बहुत समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निकाल दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया। तब श्रीराम ने उन्हे अमरत्व का वरदान दिया था। 

राजा बलि:- शास्त्रों के अनुसार राजा बलि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। बलि ने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया था। इसी कारण इन्हें महादानी के रूप में जाना जाता है। राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे। इसी वजह से श्री विष्णु राजा बलि के द्वारपाल भी बन गए थे। नियम से बंधे होने की वजह से राजा बलि को अमरता प्राप्त है। 

ऋषि व्यास:- ऋषि भी अष्ट चिरंजीवी हैँ और इन्होंने चारों वेद (ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद) का सम्पादन किया था। साथ ही, इन्होंने ही सभी 18 पुराणों की रचना भी की थी। महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता की रचना भी वेद व्यास द्वारा ही की गई है। इन्हें वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था। इसी कारण ये कृष्ण द्वैपायन कहलाए।

परशुराम:- भगवान विष्णु के छठें अवतार हैं परशुराम। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका थीं। इनका जन्म हिन्दी पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। इसलिए वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। परशुराम का जन्म समय सतयुग और त्रेता के संधिकाल में माना जाता है। परशुराम का प्रारंभिक नाम राम था। राम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। इन्हें भी अमर होने का वरदान मिला है।

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Saturday, 9 May 2015

हिमालय के 10 रहस्य जानिए -


''हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते॥''- (बृहस्पति आगम)
अर्थात : हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।

'हिमालय' संस्कृत के 'हिम' तथा 'आलय' दो शब्दों से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ 'बर्फ का घर' होता है। हिमालय को भारत का ताज कहा जाता है। हिमालय से ही हिन्दू धर्म है। 'हिन्दू' शब्द की उत्पत्ति का मूल भी हिमालय ही है। वैसे तो हिमालय में हजारों रहस्य छिपे हुए हैं लेकिन यहां प्रस्तुत है प्रमुख 10 रहस्य। दसवें रहस्य पर आज भी वैज्ञानिक शोध जारी है...

पहले हम जान लेते हैं कि हिमालय कितना विशाल- भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर, सियाचिन, उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, असम, अरुणाचल तक हिमालय का विस्तार है। ये सभी राज्य हिमालय की गोद में ही हैं। इसके अलावा उत्तरी पाकिस्तान, उत्तरी अफगानिस्तान, तिब्बत, नेपाल और भूटान देश हिमालय के ही हिस्से हैं।

भारतीय हिमालय के 4 भाग : जम्मू-कश्मीर हिमालय (सिन्धु नदी से सतलुज नदी के बीच का भाग), गढ़वाल-कुमाऊं हिमालय (सतलुज से काली नदी (सरयू) के बीच का भाग), नेपाल हिमालय (सरयू नदी से तीस्ता नदी के बीच का भाग), असम-अरुणाचल हिमालय (तीस्ता नदी से ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक का भाग)
जैन ग्रंथ 'जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति' में हिमवान की जंबूद्वीप के 6 वर्ष पर्वतों में गणना की गई है और इस पर्वतमाला के 'महाहिमवंत' और 'चुल्लहिमवंत' नाम के दो भाग बताए गए हैं। महाहिमवंत पूर्व समुद्र (बंगाल की खाड़ी) तक फैला हुआ है और चुल्लहिमवंत पश्चिम और दक्षिण की ओर वर्षधर पर्वत के नीचे वाले सागर (अरब सागर) तक फैला है। इस ग्रंथ में गंगा और सिन्धु नदियों का उद्गम चुल्लहिमालय में स्थित सरोवरों से माना गया है। महाहिमवंत के 8 और चुल्ल के 11 शिखरों का उल्लेख 'जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति' में है।

हिमालय के पर्वत : हिमालय के बीचोबीच सुमेरू पर्वत है। सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देश में स्थित हैं। इस सुमेरू पर्वत को प्रमुख रूप से बहुत दूर तक फैले 4 पर्वतों ने घेर रखा है। 1. पूर्व में मंदराचल, 2. दक्षिण में गंधमादन, 3. पश्चिम में विपुल और 4. उत्तर में सुपार्श्व। इन पर्वतों की सीमा इलावृत के बाहर तक है।

सुमेरू के पूर्व में शीताम्भ, कुमुद, कुररी, माल्यवान, वैवंक नाम से आदि पर्वत हैं। सुमेरू के दक्षिण में त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि पर्वत हैं। सुमेरू के उत्तर में शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग और कालंज आदि पर्वत हैं।

अन्य पर्वत : माल्यवान तथा गंधमादन पर्वत उत्तर तथा दक्षिण की ओर नीलांचल तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। उन दोनों के बीच कर्णिकाकार मेरू पर्वत स्थित है। मर्यादा पर्वतों के बाहरी भाग में भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष नामक देश सुमेरू के पत्तों के समान हैं। जठर और देवकूट दोनों मर्यादा पर्वत हैं, जो उत्तर और दक्षिण की ओर नील तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। पूर्व तथा पश्चिम की ओर गंधमादन तथा कैलाश पर्वत फैला है। इसी समान सुमेरू के पश्चिम में भी निषध और पारियात्र- दो मर्यादा पर्वत स्थित हैं। उत्तर की ओर निश्रृंग और जारुधि नामक वर्ष पर्वत हैं। ये दोनों पश्चिम तथा पूर्व की ओर समुद्र के गर्भ में स्थित हैं

हिमालय के शिखर : हिमालय के कुछ प्रमुख शिखरों में सबसे महत्वपूर्ण सागरमाथा हिमालय, अन्नपूर्णा, गणेय, लांगतंग, मानसलू, रोलवालिंग, जुगल, गौरीशंकर, कुंभू, धौलागिरी और कंचनजंघा हैं।

हिमालय की कुछ प्रमुख नदियां हैं- सिंधु, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और यांगतेज।

सबसे बेहतर वातावरण : हिमालय की वादियों में रहने वालों को कभी दमा, टीबी, गठिया, संधिवात, कुष्ठ, चर्मरोग, आमवात, अस्थिरोग और नेत्र रोग जैसी बीमारी नहीं होती। हिमालय क्षेत्र के राज्य जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, अरुणाचय आदि क्षेत्रों के लोगों का स्वास्थ्य अन्य प्रांतों के लोगों की अपेक्षा बेहतर होता है।

इसे ध्यान और योग के माध्यम से और बेहतर करके यहां की औसत आयु सीमा बढ़ाई जा सकती है। तिब्बत के लोग निरोगी रहकर कम से कम 100 वर्ष तो जीवित रहते ही हैं।

देव स्थान : प्राचीन काल में हिमालय में ही देवता रहते थे। यहीं पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और यहीं पर नंदनकानन वन में इंद्र का राज्य था। इंद्र के राज्य के पास ही गंधर्वों और यक्षों का भी राज्य था। स्वर्ग की स्थिति दो जगह बताई गई है: पहली हिमालय में और दूसरी कैलाश पर्वत के कई योजन ऊपर।

मुण्डकोपनिषद् के अनुसार सूक्ष्म - शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केंद्र हिमालय की वादियों में उत्तराखंड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं।

अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए वे पृथ्वी पर भी आती हैं।

भौगोलिक दृष्टि से उसे उत्तराखंड से लेकर कैलाश पर्वत तक बिखरा हुआ माना जा सकता है। इसका प्रमाण यह है कि देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, सिद्ध पुरुषों का निवास इसी क्षेत्र में पाया जाता रहा है। इतिहास पुराणों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र को देवभूमि कहा और स्वर्गवत माना जाता रहा है। आध्यात्मिक शोधों के लिए, साधनाओं सूक्ष्म शरीरों को विशिष्ट स्थिति में बनाए रखने के लिए वह विशेष रूप से उपयुक्त है। 

हिमालय के तीर्थ : हिमालय में कुछ हजारों ऐसे स्थान हैं जिनको देवी-देवताओं और तपस्वियों के रहने का स्थान माना गया है, लेकिन मानव आबादी के विस्फोट और तीर्थों के बाजारीकरण के चलते अब हिमालय में सामान्य मानवों की ‍उपस्थिति घातक सिद्ध हो रही है।

हिमालय के कुछ तीर्थ स्थान : कैलाश, मानसरोवर, अमरनाथ, कौसरनाग, वैष्णोदेवी, पशुपतिनाथ, हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, देवप्रयाग, ऋषिकेश तथा अमरनाथ जैसे और भी स्थान हैं, जहां तीर्थ की दृष्टि से जाना उचित है लेकिन इनमें से कुछ जगहों पर अब लोगों ने होटल, लॉज, दुकानें आदि खोल ली हैं जिसके दुष्परिणाम भी उन्हें भुगतने पड़ रहे हैं।

।।हिमश्रृंग एवं प्रमुख स्थल।।
चौखम्बा, संतोपथ, नीलकंठ, सुमेरु पर्वत, कुनाली, त्रिशूल, भारतखूण्टा, नंदादेवी, कामेत, द्रोणागिरी, कैलास मानसरोवर एवं प्रमुख स्थानों में पंचप्रयाग, पंच केदार, पंच बद्री, गंगोत्री, यमुनोत्री, गोमुख, तुंगनाथ, मध्महेश्वर, गोपेश्वर, श्रीनगर, उत्तरकाशी, ऊखीमठ, त्रिजुगीनाराण, जोशीमठ, टिहरी, पौड़ी, हेमकुण्ड, फूलों की घाटी, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, रानीखेत, नैनीताल, मनुस्यारी, वागेस्यारी, वागेश्वर, जागेश्वर, धारचूला, पिथौरागढ़, लोहाघाट, चम्पावत, देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार आदि स्थान हैं। इसी केदारखंड में अलकापुरी तपोवन, गोमुख, ब्रह्मपुरी, नंदनवन, गन्धमादन, वासुकीताल, वसुधारा आदि दर्शनीय देवस्थल हैं।

शास्त्रों के अनुसार इन तीर्थस्थलों में किसी भी प्रकार की मानव आबादी का रहना वर्जित है। यह स्थान सिर्फ तपस्वियों के लिए ही है। हिमालय ने निकलने वाली हजारों नदियों में से कुछ गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और यांगतेज पर बांध बनाए जाने के बाद हिमालय की प्रकृति बिगड़ चुकी है। ये ऐसी नदियां हैं जिनके दम पर हजारों दूसरी नदियां जीवित हैं। सभी की प्रकृति बिगड़ चुकी है। केदारनाथ और कश्मीर में आई भयानक बाढ़ से भी भारतीय यदि सबक नहीं लेते हैं तो एक दिन भारत को हिमालय प्रलय की भूमि में बदल देगा और भारतीयों को छुपने की जगह नहीं मिलेगी। ऐसा एक बार हो चुका है, तब मालवा के पठार के कुछ हिस्से ही जल के प्रलय से अछूते थे, बाकी संपूर्ण भारत डूब चुका था।

मानव की उत्पत्ति हिमालय क्षेत्र में हुई : तमाम शोध के बाद यह ज्ञात हुआ है कि मानव की उत्पत्ति हिमालय में हुई थी। पुराणों के अनुसार विवस्ता नदी के किनारे। विज्ञानियों एवं इतिहासवेत्ताओं के अनुसार हिमालय पर फल, अन्न और शाक आदि सभी खाद्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। स्वभावतः मानव का मूल आहार यही है।

प्रसिद्ध समाज विज्ञानी कालचेंटर के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक रूप से फल और अनाज पर निर्भर करता है अतः हिमालय का क्षेत्र ही मानव की स्वाभाविक जन्मस्थली है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है यहां जीवाश्म का पाया जाना, जो विश्व में अन्य जगहों पर पाए गए दूसरे सभी जीवाश्मों की अपेक्षा कहीं ज्यादा पुराना है।

विज्ञानियों का मानना है कि विश्वभर में मानव की 4 मुख्य जातियां पाई जाती हैं। ये जातियां- 1. श्वेत- काकेशस, 2. पीले- मंगोलियन, 3. काले- नाग्रो, 4. लाल, रेड इंडियन-अमेरिकन। इन चारों के अलावा एक 5वीं जाति हैं, जो भारतीयों की है। इस जाति में उपर्युक्त चारों जातियों का मिश्रण है। ये भारतीय संकर नहीं हैं, अपितु यह इनकी मौलिकता है। इन भारतीयों में उपर्युक्त सभी विशेषताएं पाई जाती हैं। भारत की संरचना एवं बनावट ऐसी है, जहां नित्य छहों ऋतुएं विद्यमान रहती हैं। इसी भूमि में सब रंग-रूप के आदमी निवास करते हैं। ये सारे लक्षण भारतवर्ष में स्थित हिमालय के निवासियों में पाए जाते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि मानव ने हिमालय में जन्म लिया और समूचे देश में अपना विस्तार किया।

सिद्धाश्रम, मठ और गुफाओं का रहस्य : हिमालय में जैन, बौद्ध और हिन्दू संतों के कई प्राचीन मठ और गुफाएं हैं। मान्यता है कि गुफाओं में आज भी कई ऐसे तपस्वी हैं, जो हजारों वर्षों से तपस्या कर रहे हैं। इस संबंध में हिन्दुओं के दसनामी अखाड़े, नाथ संप्रदाय के सिद्धि योगियों के इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है। उनके इतिहास में आज भी यह दर्ज है कि हिमालय में कौन-सा मठ कहां पर है और कितनी गुफाओं में कितने संत विराजमान हैं।

ज्ञानगंज मठ, जोशीमठ, हेमिस मठ आदि। केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ आदि जगहों पर हजारों ऐसी चमत्कारिक गुफाएं हैं, जहां आम मनुष्य नहीं जा पाता है। हिमालय के सिद्धाश्रमों में रहने वाले संन्यासियों की उम्र रुक जाती है। संपूर्ण क्षेत्र का वातावरण ही ऐसा रहता है कि यहां मठों में समय को रोकने वाले महात्मा तपस्या लीन रहते हैं। इसके अलावा अरुणाचल, सिक्किम, असम में भी सैकड़ों तीर्थ हैं।

प्राचीनकाल में यहां अनेक शिक्षण केंद्र भी थे। बद्रीकाश्रम में सरस्वती के तट पर व्यास एवं जैमिन का आश्रम था। यहीं पर महर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों की रचना की। काश्यप एवं अरुंधती का हिमदाश्रय, जगदग्नि का उत्तरकाशी के पास, गर्ग का द्रोणगिरि में, मनु का बद्रीनाथ के पास, अगत्स्य एवं गौतम का मंदाकिनी के तट पर, केदारनाथ मार्ग पर अगस्त्य मुनि का, पाराशर मुनि का यमुनोत्री के पास, परशुराम का उत्तरकाशी, भृगु का केदारकांठ, अत्री एवं अनुसूईया का गोपेश्वर पर विद्यापीठ था। इसी तरह जम्मू और कश्मीर के अनंतनाग, पहलगाम, अमरनाथ, शिवखेड़ी गुफा, सुरिंसर और मानसर झील, श्रीनगर, कौसरनाग आदि ऐसे स्थान हैं, जहां मठ और आश्रम होते थे।

‍जड़ी-बूटियों का भंडार : हनुमानजी हिमालय के एक क्षेत्र से ही संजीवनी का पर्वत उखाड़कर ले गए थे। हिमालय ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां दुनियाभर की जड़ी-बूटियों का भंडार है। हिमालय की वनसंपदा अतुलनीय है।

हिमालय में लाखों जड़ी-बूटियां हैं जिससे व्यक्ति के हर तरह के रोग को दूर ही नहीं किया जा सकता बल्कि उसकी उम्र को दोगुना किया जा सकता है। इसके अलावा ऐसी भी कई चमत्कारिक जड़ी-बूटियां हैं जिनका वर्णन अथर्ववेद, आयुर्वेद और जड़ी-बूटियों के ग्रंथों में मिलता है। सोमवल्ली, संजीवनी बूटी, अरुंधती, ब्रह्मकमल जैसी वनस्पतियां हिमालय के एक विशेष क्षेत्र में पाई जाती हैं।

भारतीय चिकित्सा पद्धति में आदिकाल से ही जड़ी-बूटियों को विशेष महत्व दिया गया है। अनेक प्राकृतिक फूलों, जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों की इस सुरम्य स्थली का महत्व जानना जरूरी है। महर्षि चरक ने अपनी चरक संहिता में उल्लेख किया कि हिमालय दिव्य औषधि भूमि में श्रेष्ठ है। इस हिमालय में अनेक प्रकार की दिव्यौषधियां, 24 प्रकार के सोम एवं अष्टवर्ग की जड़ी-बूटियां विद्यमान हैं।

येति : मान्यता है कि कस्तूरी मृग और येति का निवास हिमालय में ही है। येति या यति एक विशालकाय हिम मानव है जिसे देखे जाने की घटना का जिक्र हिमालय के स्थानीय निवासी करते आए हैं। येति आज भी एक रहस्य है। कोई इसे भूरा भालू कहता है, कोई जंगली मानव तो कोई हिम मानव। कुछ वैज्ञानिक इसे निंडरथल मानव मानते हैं। यह आमतौर पर तिब्बत के हिमालय वाले क्षेत्र में पाया जाता है। विश्वभर में करीब 30 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि हिमालय के बर्फीले इलाकों में हिममानव मौजूद हैं।

कस्तूरी मृग : हिमालय में ऐसे कई जीव-जंतु हैं, जो बहुत ही दुर्लभ है। उनमें से एक दुनिया का सबसे दुर्लभ मृग है कस्तूरी मृग। यह हिरण उत्तर पाकिस्तान, उत्तर भारत, चीन, तिब्बत, साइबेरिया, मंगोलिया में ही पाया जाता है। इस मृग की कस्तूरी बहुत ही सुगंधित और औषधीय गुणों से युक्त होती है। कस्तूरी मृग की कस्तूरी दुनिया में सबसे महंगे पशु उत्पादों में से एक है। यह कस्तूरी उसके शरीर के पिछले हिस्से की ग्रंथि में एक पदार्थ के रूप में होती है।

कस्तूरी चॉकलेटी रंग की होती है, जो एक थैली के अंदर द्रव रूप में पाई जाती है। इसे निकालकर व सुखाकर इस्तेमाल किया जाता है। कस्तूरी मृग से मिलने वाली कस्तूरी की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत अनुमानित 30 लाख रुपए प्रति किलो है जिसके कारण इसका शिकार किया जाता रहा है। आयुर्वेद में कस्तूरी से टीबी, मिर्गी, हृदय संबंधी बीमारियां, आर्थराइटिस जैसी कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल इत्र बनाने में भी किया जाता है। माना जाता है कि यह कस्तूरी कई चमत्कारिक धार्मिक और सांसारिक लाभ देने वाली औषधि है।

हिमालय की रहस्यमय दुनिया : हिमालय क्षेत्र में प्रकृति के सैकड़ों चमत्कार देखने को मिलेंगे। एक ओर जहां सुंदर और अद्भुत झीलें हैं तो दूसरी ओर हजारों फुट ऊंचे हिमखंड। हजारों किलोमीटर क्षेत्र में फैला हिमालय चमत्कारों की खान है। कुछ उदाहण यहां प्रस्तुत हैं-

* हिमालय में मोलेब्का गांव में सेलफोन केवल कुछ ऊंची पहाड़ियों पर ही काम करता है। लोग केवल स्थानीय ऑपरेटर के माध्यम से ही फोन कर सकते हैं, परंतु वहां एक छोटा-सा बस खड़े भर रहने का एक ऐसा स्थान है, जहां खड़े होने पर मोबाइल फोन का नेटवर्क बेहतरीन ढंग से काम करता है।

* इस क्षेत्र में कई प्रयोगों के दौरान पाया गया कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अचानक काम करना बंद कर देते हैं। कई पर्यटकों की इलेक्ट्रॉनिक घड़ियां अचानक बंद हो जाती हैं। कई बार तो घड़ियों के समय में बदलाव की घटनाएं भी सामने आईं। इलाके के रहस्यों में शोध कार्यों के लिए गए वैज्ञानिकों में से कई ने स्वीकार किया कि उनको हर समय लगता था कि कोई उन पर हर समय निगाह रखे हुए है।

* जम्मू-कश्मीर की लेह सीमा में स्थित एक चमत्कारिक पहाड़ी है जिसे लोग मैग्नेटिक हिल कहते हैं। सामान्यतौर पर पहाड़ी के फिसलन पर वाहन को गियर में डालकर खड़ा किया जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो वाहन नीचे की ओर लुढ़ककर खाई में गिर सकता है लेकिन इस मैग्नेटिक हिल पर वाहन को न्यूट्रल करके खड़ा कर दिया जाए तब भी यह नीचे की ओर नहीं जाता, बल्कि ऊपर की ओर ही खींचा चला जाता है। यही तो इस पहाड़ी का चमत्कार है कि वाहन लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से स्वत: ही ऊपर की ओर चढ़ने लगता है।

* नारीलता नामक पौधे भारत में हिमालय क्षेत्र में पाया जाता है। इसका फूल 20 साल में एक बार खिलता है। यह फूल एक निर्वस्त्र स्त्री के आकार का होता है। यह एक बहुत ही आश्चर्यजनक और दुर्लभ घटना है। इसी तरह एक फूल हनुमानजी के मुख के समान होता है। हिमालय में ऐसे कई पेड़-पौधे हैं, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं।

एलियंस रहते हैं हिमालय में?: विश्वभर के वैज्ञानिक मानते हैं कि धरती पर कुछ जगहों पर छुपकर रहते हैं दूसरे ग्रह के लोग। उन जगहों में से एक हिमालय है। भारतीय सेना और वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार नहीं करते लेकिन वे अस्विकार भी नहीं करते हैं।

भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) की यूनिटों ने सन् 2010 में जम्मू और कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में उडऩे वाली अनजान वस्तुओं (यूएफओ) के देखे जाने की खबर दी थी। लेकिन बाद में इस खबर को दबा दिया गया।

पहली घटना :  20 अक्टूबर, 2011, सुबह 4.15 बजे, रात की ड्यूटी कर रहे भारतीय सेना के एक जवान ने तश्तरी के आकार वाला उज्जवल चमकती रोशनी से आच्छादित एक अंतरिक्ष यान सीमा रेखा के नजदीक एक सीमांत बस्ती में उतरते देखा।

दो प्रकाश उत्सर्जक करीब तीन फुट ऊंचे जीव, जिनमें प्रत्येक के छह पैर और चार आंखें थीं, यान के किनारे से एक ट्यूब से उभरे, वो जवान के पास पहुंचे और अंग्रेजी के भारी-भरकम उच्चारण के साथ ज़ोर्ग ग्रह का रास्ता पूछा।

दूसरी घटना : एक अन्य सूचित घटना में, 15 फरवरी दोपहर तकरीबन 2.18 पर, भारत-चीन सीमा से करीब 0.25 किलोमीटर दूर, एक छोटे से क्षेत्र में मैदान से करीब 500 मीटर ऊपर चमकदार सफेद रोशनी नजर आई और आठ भारतीय कमांडो, एक कुत्ते, तीन पहाड़ी बकरियों और एक बर्फीले तेंदुए को भारी बादलों में ले जाने से पहले गायब हो गई। बाद में छह कमांडो को गोवा के एक स्वीमिंग पूल से बचाया गया। दो लापता हैं। बचे हुए लोगों को ये घटना याद नहीं। इस घटना का गवाह एक स्थानीय किसान बना, जो सीमा रेखा के नज़दीक भेड़ चरा रहा था।

तीसरी घटना : 22 जून को शाम 5.42 बजे, एक बड़ा अंडाकार अंतरिक्ष यान उच्च हिमालय में गायब होने से पहले अस्थायी रूप से चीन की तरफ एक सैन्य पड़ाव के ऊपर मंडराता नज़र आया, ऐसा कई प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा। रिपोर्टों में उर्द्धत किया गया कि वो करीब एक बड़े वायुयान के माप का था, जो चमकते चक्रों और पीछे घसीटते कपड़ों से आच्छादित था।

आइटीबीपी की धुंधली तस्वीरों के अध्ययन के बाद भारतीय सैन्य अधिकारियों का मानना है कि ये गोले न तो मानवरहित हवाई उपकरण (यूएवी) हैं और न ही ड्रोन या कोई छोटे उपग्रह हैं। ड्रोन पहचान में आ जाता है और इनका अलग रिकॉर्ड रखा जाता है। यह वह नहीं था। सेना ने 2011 जनवरी से अगस्त के बीच 99 चीनी ड्रोन देखे जाने की रिपोर्ट दी है। इनमें 62 पूर्वी सेक्टर के लद्दाख में देखे गए थे और 37 पूर्वी सेक्टर के अरुणाचल प्रदेश में। इनमें से तीन ड्रोन लद्दाख में चीन से लगी 365 किमी लंबी भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए थे जहां आइटीबीपी की तैनाती है।

पहले भी लद्दाख में ऐसे प्रकाश पुंज देखे गए हैं। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और चीन अधिकृत अक्साइ चिन के बीच 86,000 वर्ग किमी में फैले लद्दाख में सेना की भारी तैनाती है। इस साल लगातार आइटीबीपी के ऐसे प्रकाश पुंज देखे जाने की खबर से सेना की लेह स्थित 14वीं कोर में हलचल मच गई थी।

जो प्रकाश पुंज आंखों से देखे जा सकते थे, वे रडार की जद में नहीं आ सके. इससे यह साबित हुआ कि इन पुंजों में धातु नहीं है. स्पेक्ट्रम एनलाइजर भी इससे निकलने वाली किसी तरंग को नहीं पकड़ सका. इस उड़ती हुई वस्तु की दिशा में सेना ने एक ड्रोन भी छोड़ा, लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ. इसे पहचानने में कोई मदद नहीं मिली. ड्रोन अपनी अधिकतम ऊंचाई तक तो पहुंच गया लेकिन उड़ते हुए प्रकाश पुंज का पता नहीं लगा सका।

भारतीय वायु सेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) पी.वी. नाइक कहते हैं, ‘हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। हमें पता लगाना होगा कि उन्होंने कौन-सी नई तकनीक अपनाई है।

भारतीय वायु सेना ने 2010 में सेना के ऐसी वस्तुओं के देखे जाने के बाद जांच में इन्हें ‘चीनी लालटेन’ करार दिया था। पिछले एक दशक के दौरान लद्दाख में यूएफओ का दिखना बढ़ा है। 2003 के अंत में 14वीं कोर ने इस बारे में सेना मुख्यालय को विस्तृत रिपोर्ट भेजी थी। सियाचिन पर तैनात सैन्य टुकडिय़ों ने भी चीन की तरफ तैरते हुए प्रकाश पुंज देखे हैं, लेकिन ऐसी चीजों के बारे में रिपोर्ट करने पर हंसी उडऩे का खतरा रहता है।

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कहां है चमत्कारिक कल्पवृक्ष, जानिए -

वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है। पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा होती है।

पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के 14 रत्नों में से एक कल्पवृ‍क्ष की भी उत्पत्ति हुई थी। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना 'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में) में कर दी थी। पद्मपुराण के अनुसार पारिजात ही कल्पतरु है।

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच ऐसा कोई वृक्ष था या है? यदि था तो क्या आज भी वो है? यदि है तो वह कैसा दिखता है और उसके क्या फायदे हैं?

ओलिएसी कुल के इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम ओलिया कस्पीडाटा है। यह यूरोप के फ्रांस व इटली में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। यह दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जाता है। भारत में इसका वानस्पतिक नाम बंबोकेसी है। इसको फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने 1775 में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अडनसोनिया टेटा रखा गया। इसे बाओबाब भी कहते हैं।

वृक्षों और जड़ी-बूटियों के जानकारों के मुताबिक यह एक बेहद मोटे तने वाला फलदायी वृक्ष है जिसकी टहनी लंबी होती है और पत्ते भी लंबे होते हैं। दरअसल, यह वृक्ष पीपल के वृक्ष की तरह फैलता है और इसके पत्ते कुछ-कुछ आम के पत्तों की तरह होते हैं। इसका फल नारियल की तरह होता है, जो वृक्ष की पतली टहनी के सहारे नीचे लटकता रहता है। इसका तना देखने में बरगद के वृक्ष जैसा दिखाई देता है। इसका फूल कमल के फूल में रखी किसी छोटी- सी गेंद में निकले असंख्य रुओं की तरह होता है।

पीपल की तरह ही कम पानी में यह वृक्ष फलता-फूलता हैं। सदाबहार रहने वाले इस कल्पवृक्ष की पत्तियां बिरले ही गिरती हैं, हालांकि इसे पतझड़ी वृक्ष भी कहा गया है।

यह वृक्ष लगभग 70 फुट ऊंचा होता है और इसके तने का व्यास 35 फुट तक हो सकता है। 150 फुट तक इसके तने का घेरा नापा गया है। इस वृक्ष की औसत जीवन अवधि 2500-3000 साल है। कार्बन डेटिंग के जरिए सबसे पुराने फर्स्ट टाइमर की उम्र 6,000 साल आंकी गई है।


औषध गुणों के कारण कल्पवृक्ष की पूजा की जाती है। भारत में रांची, अल्मोड़ा, काशी, नर्मदा किनारे, कर्नाटक आदि कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर ही यह वृक्ष पाया जाता है। पद्मपुराण के अनुसार परिजात ही कल्पवृक्ष है। यह वृक्ष उत्तरप्रदेश के बाराबंकी के बोरोलिया में आज भी विद्यमान है। कार्बन डेटिंग से वैज्ञानिकों ने इसकी उम्र 5,000 वर्ष से भी अधिक की बताई है।

समाचारों के अनुसार ग्वालियर के पास कोलारस में भी एक कल्पवृक्ष है जिसकी आयु 2,000 वर्ष से अधिक की बताई जाती है। ऐसा ही एक वृक्ष राजस्थान में अजमेर के पास मांगलियावास में है और दूसरा पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा के आश्रम में मौजूद है।

यह एक परोपकारी मेडिस्नल-प्लांट है अर्थात दवा देने वाला वृक्ष है। इसमें संतरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन 'सी' होता है। गाय के दूध से दोगुना कैल्शियम होता है और इसके अलावा सभी तरह के विटामिन पाए जाते हैं।

इसकी पत्ती को धो-धाकर सूखी या पानी में उबालकर खाया जा सकता है। पेड़ की छाल, फल और फूल का उपयोग औषधि तैयार करने के लिए किया जाता है। 

सेहत के लिए : इस वृक्ष की 3 से 5 पत्तियों का सेवन करने से हमारे दैनिक पोषण की जरूरत पूरी हो जाती है। शरीर को जितने भी तरह के सप्लीमेंट की जरूरत होती है इसकी 5 पत्तियों से उसकी पूर्ति हो जाती है। इसकी पत्तियां उम्र बढ़ाने में सहायक होती हैं, क्योंकि इसके पत्ते एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं। यह कब्ज और एसिडिटी में सबसे कारगर है। इसके पत्तों में एलर्जी, दमा, मलेरिया को समाप्त करने की शक्ति है। गुर्दे के रोगियों के लिए भी इसकी पत्तियों व फूलों का रस लाभदायक सिद्ध हुआ है।

इसके बीजों का तेल हृदय रोगियों के लिए लाभकारी होता है। इसके तेल में एचडीएल (हाईडेंसिटी कोलेस्ट्रॉल) होता है। इसके फलों में भरपूर रेशा (फाइबर) होता है। मानव जीवन के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व इसमें मौजूद रहते हैं। पुष्टिकर तत्वों से भरपूर इसकी पत्तियों से शरबत बनाया जाता है और इसके फल से मिठाइयां भी बनाई जाती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार हमारे शरीर में आवश्यक 8 अमीनो एसिड में से 6 इस वृक्ष में पाए जाते हैं।

पर्यावरण के लिए : यह वृक्ष जहां भी बहुतायत में पाया जाता है, वहां सूखा नहीं पड़ता। यह रोगाणुओं का डटकर मुकाबला करता है। इस वृक्ष की खासियत यह है कि कीट-पतंगों को यह अपने पास फटकने नहीं देता और दूर-दूर तक वायु के प्रदूषण को समाप्त कर देता है। इस मामले में इसमें तुलसी जैसे गुण हैं।

पानी के भंडारण के लिए इसे काम में लिया जा सकता है, क्योंकि यह अंदर से (वयस्क पेड़) खोखला हो जाता है, लेकिन मजबूत रहता है जिसमें 1 लाख लीटर से ज्यादा पानी की स्टोरिंग केपेसिटी होती है। इसकी छाल से रंगरेज की रंजक (डाई) भी बनाई जा सकती है। चीजों को सान्द्र (Solid) बनाने के लिए भी इस वृक्ष का इस्तेमाल किया जाता है।

पत्तों का उपयोग : हमारे दैनिक आहार में प्रतिदिन कल्पवृक्ष के पत्ते मिलाएं 20 प्रतिशत और सब्जी (पालक या मैथी) रखें 80 प्रतिशत। आप इसका इस्तेमाल धनिए या सलाद की तरह भी कर सकते हैं। इसके 5 से 10 पत्तों को मैश करके परांठे में भरा जा सकता है।

फल का उपयोग : कल्पवृक्ष का फल आम, नारियल और बिल्ला का जोड़ है अर्थात यह कच्चा रहने पर आम और बिल्व तथा पकने पर नारियल जैसा दिखाई देता है लेकिन यह पूर्णत: जब सूख जाता है तो सूखे खजूर जैसा नजर आता है।

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